संपादकीय : कृषि बिल और किसान आंदोलन 3

बेचारा कोरोना एक कोने में खड़ा हैरान है कि मैं कैसे देश में फंस गया हूं। यहां का इन्सान दिल्ली और मुंबई की हालत देखने के बावजूद मुझ से डरता नहीं और मज़े में चुनाव की रैलियां करता है और राजधानी का घेराव।  मैंने अपने बहुत से मित्रों से बात की। कुछ आँखें बन्द कर के किसानों के पक्ष में बोल रहे हैं और कुछ पूरी तरह से सरकार की ओर हैं। मगर मज़ेदार स्थिति यह है कि उनमें से किसी को भी नहीं पता कि भाजपा सरकार की नयी कृषि नीति क्या है और किसानों को किस बात पर आपत्ति है। 

भारत सरकार ने हाल ही में आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020 लोकसभा में पारित किये और उन पर राष्ट्रपति की मोहर भी लग गयी। 
बिल के पारित होने के बाद पंजाब के अकाली दल ने एन.डी.ए. से रिश्ता तोड़ लिया। और समिरत कौर बादल ने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने इसे नाटक करार दिया। उन्होंने प्रकाश सिंह बादल के सम्मान वापसी (पद्म विभूषण) को भी नाटक का हिस्सा ही बताया। कैप्टन का कहना है कि जब यह बिल बनाया गया तो अकाली दल इस समिति का हिस्सा था तो अब यह नाटक क्यों किया जा रहा है। 
उत्तर भारत का किसान (विशेष तौर पर पंजाब) का किसान नये कृषि बिल के विरोध में खड़ा हो गया और उसने दिल्ली को घेरे में ले लिया। आहिस्ता आहिस्ता उसके साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का किसान भी जुड़ गया और दिल्ली को चारों तरफ़ से घेर लिया गया। अब दिल्ली के भीतर न तो कोई जा सकता है और न ही आ सकता है।
एक अजीब सी स्थिति यह भी है कि कनाडा का राष्ट्रपति ट्रूडो भी भारत के किसानों के पक्ष में खड़ा हो गया है जबकि कनाडा और अमरीका के पंजाब किसानों के समर्थन में हुए जुलूसों में खालिस्तान के नारे भी लगते दिखाई दे रहे हैं। भारत सरकार ने कनाडा सरकार के पास अपनी आपत्ति दर्ज करवाई है। राष्ट्रपति ट्रूडो ने आज फिर अपना समर्थन दोहराया। 
ब्रिटेन की लेबर पार्टी के बहुत से सांसदों ने भी पंजाब के किसानों के पक्ष में वक्तव्य दिये हैं। आज कुल 36 लेबर पार्टी सांसदों ने भारत सरकार के विरुद्ध और किसानों के पक्ष में बयान जारी किया है।  
बेचारा कोरोना एक कोने में खड़ा हैरान है कि मैं कैसे देश में फंस गया हूं। यहां का इन्सान दिल्ली और मुंबई की हालत देखने के बावजूद मुझ से डरता नहीं और मज़े में चुनाव की रैलियां करता है और राजधानी का घेराव। 
मैंने अपने बहुत से मित्रों से बात की। कुछ आँखें बन्द कर के किसानों के पक्ष में बोल रहे हैं और कुछ पूरी तरह से सरकार की ओर हैं। मगर मज़ेदार स्थिति यह है कि उनमें से किसी को भी नहीं पता कि भाजपा सरकार की नयी कृषि नीति क्या है और किसानों को किस बात पर आपत्ति है। 
कुछ ऐसे वीडियो भी व्हट्सएप पर वायरल हो रहे हैं जिनमें आम आदमी पार्टी की टोपी पहले लोग शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें नारे लगाने के लिये बुलाया गया मगर दो से अढ़ाई हज़ार रुपये देने की बात थी मगर पैसों की पेमेण्ट नहीं हो रही।
एक बात और – दक्षिण भारत का किसान जो कुछ साल पहले नंग-धड़ंग जंतर मंतर परा आ पहुंचा था, और चूहे खाता दिखाई दे रहा था, वो इस घेराव में शामिल नहीं है। शायद सरकार को भी उससे कोई डर नहीं लगा था क्योंकि उसकी शक्ल किसी वोट-बैंक से मिलती जुलती नहीं दिखाई दे रही थी। इसलिये मान लिया गया था कि वो सरकार की हानि नहीं कर सकता।  
मुझे लगता है कि हमें समझना होगा कि आख़िर सरकार ने अपनी नयी कृषि नीति में क्या कुछ कहा है और किसानों को किस बात की आपत्ति है।
आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 का मुख्य उद्देश्य आवश्यक वस्तुओं की जमाख़ोरी रोकने और उसकी कीमतों को नियंत्रित रखना है। लेकिन केन्द्र सरकार के नए कानून में अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज़, आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटाने का प्रावधान है। केंद्र सरकार का दावा है कि ऐसा करने से बाजार में स्पर्धा बढ़ेगी और किसानों को उनकी फ़सल का उचित मूल्य मिल सकेगा।
किसानों को इस पर सीधा-सीधा एतराज़ है कि इस बिल से किसानों को नहीं बल्कि पूंजीपतियों या कॉर्पोरेट घरानों को ही फ़ायदा होगा। नए बिल के अनुसार सरकार सिर्फ़ अति-असाधारण परिस्थितियों जैसे अकाल, युद्ध में ही वस्तुओं की सप्लाई पर नियंत्रण लगाएंगी।
सरकार का कहना है कि इस नए कानून के अनुसार अब किसान फ़सल उगाने से पहले ही व्यापारी से समझौता कर सकते हैं। इस समझौते में फ़सल की कीमत और उसकी गुणवत्ता जैसी बातों को शामिल किया जा सकेगा। इसके तहत व्यापारी को फसल की डिलीवरी के समय ही दो तिहाई राशि का भुगतान करना होगा और बाक़ी का पैसा 30 दिन के अंदर करना होगा। साथ ही खेत से फ़सल उठाने की ज़िम्मेदारी भी व्यापारी की होगी।
किसान इसके विरोध में कह रहे हैं कि सरकार ने भले ही फ़सल का भंडारण करने की अनुमति दे दी हो, लेकिन किसानों के पास फ़सल का भंडारण करने की व्यवस्था ही नहीं है जबकि व्यापारियों के पास फ़सल का भंडारण करने की व्यवस्था होती है। ऐसे में फ़सल की कीमत तय करने का अधिकार बड़े व्यापारियों या कंपनियों के पास आ जाएगा और किसानों की भूमिका ना के बराबर हो जाएगी।
  1. किसानों की केंद्र सरकार से पहली मांग है कि वह कृषि क्षेत्र में सुधार के नाम पर लाए गए तीनों बिलों को रद्द कर दे और उनकी जगह नए कानून लाए। नए कानून लाने से पहले सरकार किसानों से बात करें और उनकी मांगों को नए बिल में शामिल करे।
  2. किसानों की दूसरी मांग है कि केंद्र सरकार एक विधेयक लेकर आए, जिसके जरिए किसानों को लिखित में आश्वासन दिया जाए कि MSP और कन्वेंशनल फूड ग्रेन ​खरीद सिस्टम खत्म नहीं होगा।
  3. केंद्र सरकार द्वारा के कृषि बिल के अलावा किसान बिजली बिल 2020 को लेकर भी विरोध प्रदर्शन कर रहे है। केंद्र सरकार बिजली कानून 2003 की जगह बिजली (संशोधित) बिल 2020 लेकर आई है। किसान संगठन इसका भी विरोध कर रहे हैं। किसानों का आरोप है कि सरकार इस बिल के जरिए केंद्र सरकार बिजली वितरण प्रणाली का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है। ऐसा करने से किसानों को बिजली पर मिल रही सब्सिडी और फ्री बिजली की सुविधा खत्म हो जाएगी। साथ ही बिजली का निजीकरण होने से महंगी बिजली मिलने की संभावना भी बनी रहेगी।
  4. किसानों एक मांग यह भी है कि पंजाब में पराली जलाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए किसानों को रिहा किया जाए। दरअसल एक प्रावधान के अनुसार पराली जलाने पर किसान को पांच साल तक की जेल और एक करोड़ रुपए का जुर्माना हो सकता है।
अब तक किसानों और सरकार के बीच पाँच मीटिंग हो चुकी हैं। वामपन्थी दल के लोग भी आन्दोलन के साथ जुड़ गये हैं। मगर दक्षिण के किसान को इन घेरावों में कोई रुचि दिखाई नहीं देती। मुझे उम्मीद है कि पुरवाई के पाठकों को किसान आंदोलन की कुछ जानकारी इस संपादकीय के माध्यम से अवश्य मिलेगी। 
पुरवाई पत्रिका चाहती है कि अगली मीटिंग में सरकार और किसानों के बीच की समझौता हो पाए ताकि कोरोना काल में जीवन  एक बार फिर पटरी पर चलने लगे। 
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

3 टिप्पणी

  1. सम्पादकीय से कृषि बिल ,या कृषिनीति की विस्तृत जानकारी
    देने के लिए धन्यवाद । ईश्वर किसानों को सदबुद्धि प्रदान करें कि वे कृषि को व्यवसाय मानकर करें और ख़ुद को औद्योगिक घराने
    में शामिल करें ,बिजली का बिल माफ करने की राजनीति से ऊपर उठे ।
    प्रभा मिश्रा

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