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राकेश शंकर भारती द्वारा राजीव तनेजा के उपन्यास ‘काग भुसंड’ की समीक्षा

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राकेश शंकर भारती द्वारा राजीव तनेजा के उपन्यास 'काग भुसंड' की समीक्षा 3
कल रात मैंने शिवना प्रकाशन से प्रकाशित व्यंग्य उपन्यास “काग भुसंड” पढ़कर पूरा किया है। इस उपन्यास के लेखक हैं राजीव तनेजा जी। तनेजा जी लेखक होने के अलावा एक सधे हुए पाठक भी हैं, जो हर दिन कोई न कोई किताब पढ़ते रहते हैं और फेसबुक पर लंबी समीक्षा भी डालते हैं। मैं तनेजा जी को अपवाद ही मानूँगा, जो लेखक बिरादरी से होते हुए भी हर रोज़ दूसरे लेखक मित्रों की किताब पढ़ लेते हैं। आजकल जहाँ एक और ढेर सारे लेखक हर रोज़ कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होते रहते हैं, जिन्होंने जीवन में कभी गिनकर पाँच उपन्यास नहीं पढ़े होंगे, फेसबुक पर जुड़ते हैं और फिर सिर्फ़ अपनी किताब दूसरों से पढ़वाने के फ़िराक में रहते हैं।
ऐसे सिलिब्रिटी लेखक भी फेसबुक कुकुरमुत्ते की तरह टहल रहे हैं, जिन्हें कोई मतलब नहीं है कि हमें अपने समकालीन लेखक मित्रों की भी कुछ गिनी-चुनी रचनाएँ भी पढ़नी चाहिए या नहीं, वहाँ मुझे राजीव तनेजा जी जैसे गंभीर लेखक और पाठक को देखकर बहुत ख़ुशी होती है। आज उन्हीं के उपन्यास पर चर्चा करते हैं।   
उपन्यास का कवर पेज देखते ही पता चलता है कि कवर पेज पर एक काला कौवा पैनी नज़र से किताब की तरफ़ देख रहा है, या यूँ कहें कि नवोदित लेखकों या फिर भोले-भाले बुज़ुर्ग लेखकों की तरफ़ अपनी काली, लालची, धूर्त आँखों से देख रहा है, जो उस काले कौवे से किताब छपवाना चाहते हैं। आजकल सभी मित्रों को लेखक बनने की धुन सवार है, ख़ुद मुझे भी। हम सभी काले कौवे की चाल में फँसते चले जाते हैं।
यही काला कौवा अर्थात काग भुसंड इस उपन्यास का थीम है। राजीव जी ने व्यंग्य के अंदाज़ में बहुत ही कलाकारी के साथ दिखाया है कि कैसे नये-नवेले प्रकाशक, जिसका ढंग का ऑफिस तक नहीं है, एक स्टाफ़ तक नहीं है, प्रकाशन का बिज़नेस प्लान तक नहीं है, हम जैसे नये, युवा यहाँ तक कि बुज़ुर्ग लेखकों को भी अपनी चाल में फँसाते हैं और फिर लेखकों का इमोशनल अत्याचार करते हैं।
लेखकों से पैसे ऐंठने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। ऐसे प्रकाशकों के पास किताब बेचने का कोई प्लान नहीं होता, कोई नेटवर्किंग नहीं होती। उनका कारोबार आपसे पैसे ऐंठने तक सीमित है। आप रद्दी भी दो, कूड़ा भी दो, पैसे मिलने पर आपको प्रतियाँ छापकर दे देंगे। वहाँ से किताब छपने पर भी किताब का कोई भविष्य नहीं है। यह तो कुछ पल का मोह-माया है, मित्रों। उपन्यास की भाषा आसान और साफ़-सुथरी होने की वजह से मैं दो बैठकी में उपन्यास पूरा पढ़ गया।
अब हम गहराई से उपन्यास के कथानक और संवाद पर ही सीधे चलते हैं। जहाँ इस उपन्यास में राजीव जी ने ख़ुद को एक पात्र बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ दुबे जी को एक ठग, धूर्त प्रकाशक के रूप में दिखाया है (ये दुबे जी कई धूर्त प्रकाशकों का मिला-जुला स्वरूप है), जो कैसे प्रकाशन के नाम पर गोरख धंधा चलाता है।
फेसबुक पर किस तरह से अपना माया जाल फैलाकर मेरे जैसे भोले-भाले युवा लेखक की रचना धोखे से लेकर हमारे अरमान पर पानी फेर देता है। फिर हम पछताते हैं और अपनी आँखों से वेदना के आँसू बहाते हैं कि क्यों और कैसे मैं इस तरह के धूर्त प्रकाशक के जाल में फँस गया। इसीलिए युवा और भोले-भाले बुज़ुर्ग लेखकों को यह उपन्यास पढ़ने की सख्त ज़रूरत है। एक बार जब बिल्ली का मुँह गर्म दूध में पड़ने पर जल जाता है तो बिल्ली आजीवन फूँक-फूँककर दूध पीती है।
चूँकि मेरा मुँह भी गर्म दूध पीने से अभी हाल-फ़िलहाल कुछ महीने पहले ही जल गया है, इसीलिए मैं भी अब आजीवन फूँक-फूँककर आराम से तसल्ली के साथ दूध पिऊँगा। उपन्यास में यह भी दिखाया गया है कि किस तरह नये प्रकाशक लेखिका के फेसबुक में घुसकर, इनबॉक्स में संदेश भेजकर, फिर असली दुनिया में मिलकर लेखिका से अंतरंग संबंध बनाने की कोशिश करता है और बाद में प्रकाशक मार भी खाता है। यह उपन्यास बेशक़ प्रकाशन की दुनिया की असली बदबू उजागर करता है। यह सचमुच एक पठनीय उपन्यास है। 
प्रकाशक किताब के प्रकाशन के नाम पर अपना सिल्वर, गोल्डन, डायमंड पैकेज वगैरह चलाते हैं और लेखक को मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाते हैं। किताब के प्रमोशन के नाम पर किस तरह से लेखकों को चूना लगाते हैं। लेखक बेचारे को भी जेब में पैसे काटते हैं और उन्हें लगता है कि मैं एक रात में स्टार लेखक बन जाऊँगा, फिर देश में हर जगह मेरी पूछ होगी, मुझे पुरस्कार मिलने लगेगा। वैसे तो आज के दौर में हिंदी में पुरस्कार पाना कोई बड़ी बात नहीं है।
वैसे भी यशप्राप्ति की भूख से ज़्यादा तीव्र कुछ भी भूख नहीं है। मैं भी तो पिछले दस सालों से इसी के लिए तड़प रहा हूँ। यहीं ऐसे नवोदित प्रकाशक हमारे साथ इमोशनल बलात्कार करते हैं, जो बेचारे ख़ुद से 50 किताब बेचने की औक़ात तक नहीं रखते हैं और कवि और लेखक मित्रों से एक मुश्त पैसे ऐंठ लेते हैं और आपकी किताब डिमांड ऑन ऑर्डर पर डाल देते हैं। फिर आप एक लेखक होने के साथ-साथ प्रकाशक के किताब विक्रेता भी हो जाते हैं और अपने मित्रों को महंगी किताब ख़रीदने के लिए ज़ोर देते हैं।
आख़िरकार कुछ महीनों में आप भी हिम्मत हार देते हैं कि चलो भाई अब किताब बेचवाकर भी कुछ नहीं होना। क्योंकि कब तक आपकी मित्र आपकी किताब ख़रीदते रहेंगे। आपकी किताब में कंटेंट होगा तो ख़ुद लोग प्रकाशक से पता करके किताब ख़रीद लेंगे। कई महीने गुज़र गये और किताब तो कुछ रिज़ल्ट दे ही नहीं रही। डिमांड ऑन ऑर्डर तो बहुत बड़ा छलावा है।
यहाँ आप जब तक प्रचार करेंगे, तब तक आपकी किताब बिकती रहेगी। फिर तो आप आगे की अपनी लेखनी छोड़कर आजीवन अपनी एक किताब अपने मित्रों से बेचवाते रहें। ऐसे कई धूर्त प्रकाशक अपने देश में फेसबुक से, बुज़ुर्ग लेखकों के माध्यम से, कुछ बड़े लेखकों से रॉयल्टी के चेक की पोस्ट फेसबुक पर डलवाकर, विज्ञापन के माध्यम से भोले-भाले लेखकों की जेब ढीला करवाके बड़े लेखक बनाने के हसीन सपने दिखाते हैं। आपको ख़ुद तय करना है कि आपको उल्लू बनना चाहिए या नहीं। जब आप इतना जानते हुए भी उल्लू बन रहे हैं तो इसमें प्रकाशक की कोई गलती नहीं है।
उपन्यास – काग भुसंड
शिवना पेपरबैक्स, शिहोर
मूल्य – 150
पृष्ठ-96
लेखक – राजीव तनेजा
समीक्षक – राकेश शंकर भारती
द्नेप्रोपेत्रोव्स्क, यूक्रेन
कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त आदि विधाओं पर लेखन। अबतक तीन किताबें प्रकाशित। संपर्क - rsbharti.jnu@gmail.com

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