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हरदीप सबरवाल की पाँच कविताएँ

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1- किस्सा
तमाम वायदों के पीछे छुपा था छल,
जैसे तमाम लुभावनी मुस्कुराहटों के पीछे से निकलती है कुटिलता,
किस्सा तो यूं भी है लेकिन,
ना तो छल इस तरह पहली बार आया,
ना ही कुटिलता,
अफसोस बस इसी बात का रहा,
कि छले गए लोगों ने इसे नियति मान लिया,
और छलने वाले ने मौका……
2- संबल
स्पर्श, कितना ही स्नेहिल हो पर
रह ही जाता है कुछ ना कुछ अनछुआ,
अच्छे से अच्छा वक्ता भी जब अभिव्यक्त करता है,
कुछ तो है, जो रह जाता अव्यक्त,
नजर कितनी भी पारखी क्यों ना रही हो,
नजरअंदाज हो ही जाता है कोई विशिष्ट गुण फिर भी,
और फिर कसक सी रह जाती है,
उस अनछुए रह गए स्पर्श की,
अव्यक्त रह गए शब्द की,
और एक अदद पारखी नज़र की,
और असल में ये कोई लालच या लालसा नहीं,
ये तो संबल है जीवन का,
जो जीवन को और बेहतर जीने का
जज़्बा देता है……..
3- बहरे
जिस दिन निष्पक्ष कलम ने खुदकुशी की,
अपनी अपनी जीत समझ
सभी पक्षों के खेमों में दावतें चली,
कान फाड़ू नगाड़े बजाए गए,
पर इस शोर से, सभी पक्ष हो गए बहरे,
अब उन्हें अपनी आवाज के सिवाय,
आखिर, निर्लज्जता की कोई सीमा भी नहीं होती…
4- आसान
सोचता हूं,
ईमानदार हो जाऊं अपने शब्दों को लेकर,
और खड़े कर लूं अपने इर्द गिर्द,
ढेरों ढेर शत्रु,
ईमानदार होना, वो भी शब्दों के साथ,
इतना आसान तो नहीं,
जितना सहज और आसान होता है
एक ईमानदार कविता लिखना……
5- तमाशा
मौलिकता की मौत पर,
नहीं फटी धरती
ना आई सागर में सुनामी,
ना ही गिरे पहाड़ धड़धड़ाते हुए,
सिर्फ शब्दों ने,
जान बूझ कर साध ली खामोशी,
कि चलन में है तमाशा
और तमाशा तो चलता है सिर्फ शब्दों के हेर फेर से,
चाहे वो थके हो या हारे,
या हुए हो चोरी,
तमाशा चलने दो..

1 टिप्पणी

  1. हरदीप सबरवाल जी की यह कविताएं भी लाजवाब हैं। इनकी कविताएं सच के साथ पूरी शिद्दत के साथ जुड़ती ही नहीं, जूझती भी हैं।

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