Wednesday, February 11, 2026
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डॉ रूबी भूषण की ग़ज़लें

ग़ज़ल – 1
हाल गुर्बत दिखाती भी कैसे
घर का पर्दा उठाती भी कैसे
शहजादी फकीर जैसी थी
रस्मे उल्फत निभाती भी कैसे
उठ रहा था सभी के घर से धुआं
अपना घर मैं सजाती भी कैसे
हर्फ मिटने लगे हैँ अब सारे
ऐसे में नग़्मे गाती भी कैसे
वह रहा था मसर्रतों में मगन
दर्दे दिल अब सुनाती भी कैसे
जिसको चाहा है जान से ज़्यादा
हाल उसका बताती भी कैसे
हौसलों से तेरे बढ़ी हूं मैं
जश्न ख़ुद का मनाती भी कैसे
ग़ज़ल – 2
जब कोई ख़्वाब जाग जाता है
एक ही चेहरा जगमगाता है
माना सच्चा बहुत है वो लेकिन
अपना वादा कहां निभाता है
दिल के रिश्ते से आगे बढ़कर वो
मेरी रग-रग में क्यों समाता है
देख कर आरजू भरा चेहरा
आईना भी ये मुसकुराता है
वक़्त की किस लिए करें परवाह
वक़्त तो सब को आज़माता है
तुमको मालूम है मेरे दिल को
गुज़रा मौसम बहुत सताता है
जो कभी सामने नहीं आता
वो ज़रा ख़्वाब क्यों दिखाता है
ग़ज़ल – 3
ढल रही है ये शाम हौले से
अब न छलकाओ जाम हौले से
लग न जाए नज़र ताल्लुक़ पर
लब पर आया है नाम हौले से
चांद तारों को देखकर वो भी
भेजता है पयाम हौले से
इश्क ने रोज़ आंखों आंखों में
कर लिया है सलाम हौले से
क्या हुआ साक़िया जो बदला है
मयकदे का निज़ाम हौले से
छू लिया उसने जब रग-ए-जां को
दिल हुआ है ग़ुलाम हौले से
शेर उसको ज़रा सुनाओ तो
वह करेगा कलाम हौले से
ग़ज़ल – 4
बारिशें जब नहीं है जीवन में
आग कोई लगा दे सावन में
तूने नजरें उठाईं जब मुझ पर
छा गई है बहार गुलशन में
हाल किसको सुनाऊं ग़ुरबत का
चार तिनके हैं बस नशे-मन में
इतने बदले हैं क्यों बड़े होकर
कितने अच्छे थे आप बचपन में
तोड़कर दिल ग़रीब लोगों का
दाग़ मत डालो अपने दामन में
जो पड़ोसी के घर में साया दे
पेड़ ऐसा लगाओ आंगन में
लिख नहीं सकती है हूं उनको
जो ख़्यालात उतरे हैं मन में

डॉ रूबी भूषण
(पटना, भारत)
Mobile – +91 99319 18723
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