डॉ रूबी भूषण की ग़ज़लें
हाल गुर्बत दिखाती भी कैसे
शहजादी फकीर जैसी थी
उठ रहा था सभी के घर से धुआं
हर्फ मिटने लगे हैँ अब सारे
वह रहा था मसर्रतों में मगन
जिसको चाहा है जान से ज़्यादा
हौसलों से तेरे बढ़ी हूं मैं
जब कोई ख़्वाब जाग जाता है
माना सच्चा बहुत है वो लेकिन
दिल के रिश्ते से आगे बढ़कर वो
देख कर आरजू भरा चेहरा
वक़्त की किस लिए करें परवाह
तुमको मालूम है मेरे दिल को
जो कभी सामने नहीं आता
ढल रही है ये शाम हौले से
लग न जाए नज़र ताल्लुक़ पर
चांद तारों को देखकर वो भी
इश्क ने रोज़ आंखों आंखों में
क्या हुआ साक़िया जो बदला है
छू लिया उसने जब रग-ए-जां को
शेर उसको ज़रा सुनाओ तो
बारिशें जब नहीं है जीवन में
तूने नजरें उठाईं जब मुझ पर
हाल किसको सुनाऊं ग़ुरबत का
इतने बदले हैं क्यों बड़े होकर
तोड़कर दिल ग़रीब लोगों का
जो पड़ोसी के घर में साया दे
लिख नहीं सकती है हूं उनको
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बहुत सुन्दर ग़ज़लें मैम
हार्दिक बधाई