Sunday, July 19, 2026
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आलोक शुक्ला की कविता – बुरी लड़कियाँ

लड़कों की तरह
सिगरेट-शराब पीने वाली लड़कियां
माँ -बहन की गलिया देने वाली लड़कियां
मज़े के लिए इधर- उधर मुंह मारने वाली लड़कियां
बिंदास जीने वाली लड़कियां
नहीं होती एक परफेक्ट बहू, बहन या बेटी
या कोई नहीं चाहता कि उनकी
बहू, बहन या बेटी हो ऐसी
जैसे होते हैं लड़के….
यही सब करते हुए नहीं होते लड़के बुरे
पर लड़कियां होती हैं बुरी, बेहद बुरी
लेकिन किसी की भी बहन या बेटी नहीं होती बुरी
तो फिर कहाँ से आती हैं ये बुरी लड़कियां ?
शायद उसी समाज की आँखों से
जो हर बिंदास लड़की को
अपने डर और ढोंग के आईने में देखता है।
जहाँ लड़की की हँसी भी बन जाती है सवाल
उसकी दोस्ती तय करती है चरित्र का पैमाना
उसके सपने कहे जाते हैं बग़ावत
वही समाज, लड़कों की गलती को
‘शरारत’ कहकर टाल देता है और
लड़कियों की साँसों तक पर बिठा देता है पहरा
तो असल में कहीं नहीं होती बुरी लड़कियाँ
बुरी तो बस होती है सोच
और वो सोच…इस समाज की आँखों में पलती है।
2
बुरी लडकियों …
है उम्र की ये एक अवस्था महज़
जी लो अपनी ज़िंदगी
फिर लौट आना घर अपने
न जाना इतनी दूर माँ-बाप की प्यारी लड़कियों
भाई की दुलारी लड़कियों
कि फिर वापिस लौटना हो जाए मुश्किल
क्योंकि वापिस लौटना बड़ा मुश्किल होता है सदा
चाहे वो लड़का हो या तुम लड़कियां..
आलोक शुक्ला
आलोक शुक्ला एक सुप्रसिद्ध नाटककार, निर्देशक और अभिनेता हैं। 1986 में मध्य प्रदेश के रीवा से रंगमंचीय यात्रा प्रारंभ करते हुए, आलोक शुक्ला ने लगभग 40 नाटकों के 500 से अधिक मंचन किए हैं, एक दर्जन से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है, 15 रंगमंचीय नाटकों और 6 रेडियो नाटक लिखे हैं तथा छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके प्रकाशित तीन नाटक संग्रहख़्वाबों के सात रंग (2021), पंचरंग (2024) और अजीब दास्तान और एक अन्य नाटक (2025), के साथ ही एक रंगकर्मी की यात्रा (2022), अफ़सोस की ख़बर (2024) और बघेलखंड के लोकनाट्य छाहुर पर शोधपरक पुस्तक   (2025) शामिल हैं। उन्होंने हबीब तनवीर, अमोल पालेकर, बासु चटर्जी, अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ ख़ान जैसे दिग्गजों के साथ काम किया है।
फिल्मों में वे पहेली, डरना ज़रूरी है और लोकप्रिय धारावाहिक क्योंकि सास भी कभी बहू थी, सी.आई.डी. और आहट में नज़र आए। उन्होंने अनेक टीवी चैनलों के लिए कार्यक्रम लिखे और निर्देशित किए हैं तथा मुंबई के नानावटी कॉलेज में विज़िटिंग फैकल्टी भी रहे हैं।
जून 2020 में गिलियनबैरे सिंड्रोम (GBS) से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने अपनी रंगमंचीय सक्रियता जारी रखी और जनवरी 2024 में नई दिल्ली के एलटीजी ऑडिटोरियम में अपने ही लिखे और निर्देशित नाटक उसके साथ का मंचन कियाजो संभवतः दुनिया में जीबीएस से पीड़ित किसी व्यक्ति का पहला ज्ञात रंगमंचीय प्रदर्शन है। हाल के वर्षों में उन्होंने पूरे देश में कई प्रस्तुतियाँ कीं और रंगमंच कार्यशालाएँ संचालित कीं।
उनके सम्मानों में भारतीय लेखन सम्मान (2025), इंडिया नेटबुक्स नाट्य रत्न पुरस्कार (2022 2024), सीनियर फेलोशिप अवॉर्ड (संस्कृति मंत्रालय, 2018) तथा अभिनय, लेखन और निर्देशन के लिए कई अन्य पुरस्कार शामिल हैं।
आलोक शुक्ला
आलोक शुक्ला
टीवी मीडिया में कई वरिष्ठ पदों पर रहे. अपनी रंग यात्रा में पुरे भारत के साथ यूरोप (जर्मनी) के कई शहरों में शोज किये, ट्रेवल शो बनाये और डरना जरूरी है व पहेली फिल्म के साथ कई लघु फ़िल्मों और धारावाहिकों मे काम किया. संस्कृति मंत्रालय ने 2018 में लोक रंगकर्म पर सीनियर फेलोशिप अवार्ड से सम्मनित. संपर्क - 9999468641
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