टोरंटो में रात के 10:00 थे बाहर बर्फ पड़ रही थी।
बर्लिन में सुबह के 4:00 थे। खिड़की से सूरज की पहली किरण आ रही थी।
फोन की घंटी बजी स्क्रीन पर लिखा था वेंट कॉल।
माधव ने फोन उठाया:” शुरू करें?”
साक्षी :”शुरू!”
यह उनका बिसवां रविवार था 1 साल से हर रविवार को 10:00 बजे एक घंटा कोई काम की बात नहीं सिर्फ” वेंट कॉल”
माधव: आज पहले मैं। ऑफिस में प्रमोशन मेरा होना था बास ने एक नए लड़के को दे दिया कारण? “तुम्हारा फेस टाइम कम है तुम इंडिया वाले हो”।
उसके बाद 3 घंटे वॉशरूम में बैठा रहा रोया नहीं क्योंकि ऑफिस था घर आकर भी नहीं रोया, क्योंकि तुम थकी होगी आज बस घुट रहा था।
एकदम खामोशी छा गई।
साक्षी: मैं सुन रही हूं यह बहुत गलत हुआ आप बेस्ट हैं।
साक्षी: अब मेरी बारी। आज मम्मी का फोन आया। बोली, बेटी होली पर आ जाओ।
मैंने हंसकर टाल दिया “मां काम बहुत है!” फोन रखते ही 20 मिनट तक बाथरुम में बैठकर रोई, रंग ,गुजिया मां के हाथ का खाना सब याद आ गया यहां सब कहते हैं, “तुम विदेश में हो मजे करो कोई नहीं पूछता घर की याद आती है क्या?”
माधव की आंखों में भी आंसू आ गये।
माधव: यार साक्षी, हम क्यों कर रहे हैं यह सब?
साक्षी: पता नहीं! कभी लगता है पैसे के लिए! कभी लगता है सपनों के लिए! पर, सबसे बड़ा कारण पता है?
माधव: क्या?
साक्षी: ताकि 5 साल बाद हमारा एक घर हो और उस घर में हम दोनों साथ में होली खेले बिना किसी “वेंट कॉल” के!
फिर दोनों जोर-जोर से हंसने लगे।
माधव :वादा?
साक्षी: पक्का वादा। डोगरी में बोलूं? “अस्से दोवें इकट्ठे रौहनै इन, बस होर थोड़ा सब्र”
माधव :सब्र! ठीक है!
साक्षी: चलो अब वेंट खत्म। अब 5 मिनट खुशी वाली बात।
माधव : मैंने आज राजमा बनाए बिल्कुल वैसे जैसे तुम बनाती हो।
साक्षी : झूठे। फोटो भेजो।
माधव:भेज दी। और तुम?
साक्षी: मैंने आज ऑफिस में सब लोगों को “जम्मू वाले राजमा” खिलाया। सब बोले’ बेस्ट’ बोला” मेरे पति बनाते हैं!”
दोनों चुप हो गए पर इस बार वाली चुप्पी सुकून वाली थी।
माधव :चलो सो जाओ सुबह मीटिंग है!
साक्षी तुम भी। और हां…
माधव: हां?
साक्षी: अगले रविवार तक संभाल के रहना हम एक टीम हैं याद रखना!
बाहर बर्फ रुक गई और अंदर दो दिलों को थोड़ी राहत मिल गई क्योंकि दुनिया में सबसे बड़ा इलाज सुन लिया जाना है। और उनका इलाज था रविवार 10:00 बजे “वेंट कॉल”!

बढ़िया लघु कथा।संवाद हीनता और घटते रिश्ते नाते ,,,और बस भौतिकता फ़क़त भौतिकता को उकेरती उम्दा रचना ।
हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।
बहुत बहुत आभार जी
समाज में पनपती नशे की लत की सच्चाई को उजागर करती सुंदर लघुकथा॥ बधाई
वेंट कॉल आज भौतिकता के पीछे भागते युवाओं की सच्ची दास्तान है।
डॉ मुक्ता जी आपकी लघुकथा तलब की प्रतिक्रिया गलती से इसमें प्रकाशित हो गई है।
जी नमस्कार, धन्यवाद बहुत बहुत आप ने दोनो लघु कथाएं पड़ी और प्रतिक्रिया दी आपका बहुत-बहुत आभार।
मुक्ति शर्मा जी की ‘वेंट काॅल’ लघुकथा आधुनिक जीवन की विषम परिस्थितियों को लेकर रची गई है। आज का युवा सपनों के पीछे बेतहाशा भाग रहा है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी के पड़ाव में तनाव है,खीझ है और बढ़ते कदमों को रोकने वाली निर्बंध बेड़ियां हैं।
ऑफिस का तनाव और भेदभाव वाली मानसिकता ने युवा पीढ़ी को कई तरह की समस्याओं में उलझा दिया है। ऐसी जटिल समस्याएं जिसके समाधान की कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती है।
साक्षी इसी समस्या से ग्रसित आधुनिक युवती है। तनाव की स्थिति में वह मन की भड़ास पुरुष साथी से वेंट काॅल पर निकालती है।
भौतिकता के पीछे भागते युवाओं का यह स्याह पक्ष इस लघुकथा में अच्छे से व्यक्त कर दिया गया है।
जी नमस्कार, बहुत बहुत धन्यवाद जी
मुक्ति जी!
आपकी लघु कथा को पढ़ने के पहले *वेंट कॉल* के अर्थ तलाशा।
पता चला — फोन पर ऐसी बातचीत जिसमें व्यक्ति बिना किसी निर्णय या आलोचना के अपनी भावनाएँ साझा करे और दूसरा व्यक्ति केवल सहानुभूति से उसे सुने।
इस अर्थ को जानने के बाद पूरी लघु कथा पढ़ते ही समझ में आ गई।
लघुकथा जैसी छोटी सी विधा के अंतर्गत आधुनिक प्रवासी जीवन की आपाधापी में दांपत्य प्रेम और भावनात्मक सहारे की अत्यंत संवेदनशील अभिव्यक्ति है यह लघुकथा।
माधव और साक्षी, जो दो अलग-अलग देशों—टोरंटो और बर्लिन—में रहकर अपने भविष्य के सपनों के लिए संघर्ष कर रहे हैं,दोनों के बीच भौगोलिक दूरी के बावजूद हर रविवार होने वाली “वेंट कॉल” उनके रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।
लघुकथा का केंद्रीय भाव विदेश में रहने वाले लोगों के जीवन से जुड़ा है कि विदेश में रहने का अर्थ केवल सुख-सुविधाओं से भरा जीवन ही नहीं नहीं होता,बल्कि उन्हें परिवार से दूरी, अकेलापन,भावनात्मक खालीपन व नौकरी में भेदभाव जैसी स्थितियों से भी गुजरना पड़ता है।
माधव के साथ कार्यस्थल पर हुआ भेदभाव और साक्षी का होली पर घर की याद में रो पड़ना संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
इस लघुकथा का प्रभावशाली पक्ष यह है कि दोनों एक-दूसरे की समस्याओं का समाधान देने की कोशिश नहीं करते, बल्कि केवल धैर्यपूर्वक सुनते हैं।
यही सुनना उनके लिए सबसे बड़ा उपचार बन जाता है। “हम एक टीम हैं” और “सबसे बड़ा इलाज सुन लिया जाना है।”
लघुकथा का मूल संदेश रिश्तों की मजबूती एक-दूसरे का भावनात्मक सहारा बनने से है।
संवाद प्रधान इस लघुकथा में कहीं भी कृत्रिमता नजर नहीं आती।
एक-एक संवाद नपा- तुला। एक भी शब्द अतिरिक्त नहीं।
टोरंटो की बर्फ, बर्लिन की सुबह, होली की यादें और जम्मू के राजमा जैसे छोटे-छोटे कथ्य कथा को जीवंत और विश्वसनीय बनाते हैं।
रिश्तों में आते भावनात्मक विघटन को देखते हुए यह लघुकथा मानो संदेश देती है कि दूरी के बावजूद; विश्वास, धैर्य और संवाद के माध्यम से जीवन की कठिनाइयों को सहजता से पार किया जा सकता है। समस्या के लिये समाधान देने की अपेक्षा उसे पूरी संवेदना के साथ सुन लेना है ।
“वेंट कॉल” केवल एक साप्ताहिक फोन कॉल नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और भावनात्मक संबल का प्रतीक है।
जो प्रसंग हमें बेहद तकलीफदेह और करुण लगा-
*माधव: आज पहले मैं।ऑफिस में प्रमोशन मेरा होना था बॉस ने एक नए लड़के को दे दिया कारण?*
*”तुम्हारा फेस टाइम कम है तुम इंडिया वाले हो”।*
*उसके बाद 3 घंटे वॉशरूम में बैठा रहा रोया नहीं क्योंकि ऑफिस था घर आकर भी नहीं रोया, क्योंकि तुम थकी होगी आज बस घुट रहा था।*
*एकदम खामोशी छा गई।*
दूसरा प्रसंग जो मर्मस्पर्शी लगा-
*माधव: यार साक्षी, हम क्यों कर रहे हैं यह सब?*
*साक्षी: पता नहीं! कभी लगता है पैसे के लिए! कभी लगता है सपनों के लिए! पर, सबसे बड़ा कारण पता है?*
*माधव: क्या?*
*साक्षी: ताकि 5 साल बाद हमारा एक घर हो और उस घर में हम दोनों साथ में होली खेले बिना किसी “वेंट कॉल” के!*
*फिर दोनों जोर-जोर से हंसने लगे।*
*माधव :वादा?*
एक लाजवाब लघु कथा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई मुक्ति जी पढ़कर आनंद आ गया।
अपने तरीके की यह पहली लघुकथा हमने पढ़ी।
इस लघुकथा के लिए तो पुरवाई के संपादक मंडल का तहेदिल से शुक्रिया।
बहुत बहुत धन्यवाद जी सुंदर टिप्पणी के लिए।