Sunday, May 3, 2026
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“इरफ़ान तुम बहुत याद आते हो…!”

यूं तो आज हर शख्स बेचैन है, परेशान है। लेकिन ज़िंदगियां तब भी चलती रहती है, किसी के बिना और किसी के लिए कभी रुकती नहीं। ज़िंदगी के इसी उतार चढ़ाव के बीच कुछ ऐसे लोग होते हैं जो दूर होते हुए भी मन के कैनवास में अपना एक छोटा सा घर बनाए हुए होते हैं । मन के किसी कोने में छुपे बैठे होते हैं। आज पूरा देश एक अदृश्य शत्रु से लड़ रहा है। इसके बरक्स फिर भी हमारे जीवन में कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनकी कमी कभी पूरी नहीं हो पाती, या यूं कहें कि उस खाली पड़े हिस्से को कोई भर नहीं पाता…!
ऐसे ही एक कोहिनूर को खोया था हमने पिछले साल 29 अप्रैल को। यूं तो वे हर दिल अज़ीज़ थे, हैं और रहेंगे…! कोई न कोई ऐसा सिने कलाकार होता है, जो आपके दिलों दिमाग में एक अपनी खास  जगह बना जाते हैं, अपने अभिनय से आपके जीवन में एक अलग छाप छोड़ जाते हैं। यह छाप होता है उनके अंदाज़ का, अदाकारी का, तेवर का और अभिनय में परिपक्वता का…! अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों दिमाग पर काबिज़ होने का माद्दा बहुत कम कलाकार ही रख पाते हैं। बीते वर्ष जब इरफान खान और ऋषि कपूर जैसे दिग्गज कलाकारों की मृत्यु हुई , तब भी देश इस कोरोना रूपी महामारी से जूझ रहा था, देश आज एक साल बाद भी दुगुने कष्ट के साथ जूझ रहा है…! आज स्थिति पिछले वर्ष से भी अधिक भयावह और क्रूर है। लोग एक – एक सांस के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अपनों को खो रहे हैं, अपनों से बिछड़ रहे हैं, अपनों के लिए तरस रहे हैं…! बस प्रार्थना है कि जो कष्ट में हैं, पीड़ा में हैं, उन्हें ईश्वर शक्ति दे, शांति दे , धैर्य दे…! इस महाविनाश के चपेट में हर दूसरा आदमी आ चुका है। मैं भी आई , मेरे साथ साए की तरह रहनेवाले मेरी ज़िंदगी को भी आज पूरे 10 दिनों से अस्पताल में बिताने पड़ रहे हैं और भी न जाने कितने लोग इस बीमारी की चपेट में जी रहे हैं…!
इरफ़ान खान मुझे कई कारणों से भुलाए नहीं भूलते। एक तो उनका बेबाकपन, दूसरे उनके अभिनय में ईमानदारी, तीसरे चरित्र में निडरता, निर्भय होकर हर बात को , हर पक्ष को रख देना। यह गुण किसी – किसी में होता है, हर किसी में नहीं। इसी बेबाकी के कारण ही उन्हें कई बार अपनों से भी नाराज़गी सहनी पड़ी। वैसे भी कलाकार का उद्देश्य समाज में प्रेम बांटना होता है, सौहार्द बांटना होता है, जाति और धर्म से बहुत ऊपर की चीज़ होती है इनकी सोच। ये किसी खास जातिगत सांचें में ढलकर नहीं रहते। इरफ़ान का अध्यात्म ही उनका धर्म था, सभी के प्रति एक समान दृष्टि अपनाना भी उनका एक धर्म था। जो सच है उसे कहना भी उनका एक धर्म था , एक अनोखा अंदाज़ था। सच कहने की हिम्मत भी कहां होती है हर किसी में, लेकिन इरफान ये हिम्मत करते हैं। यही एक सच्चे कलाकार की पहचान है, खूबी है, ईमानदारी है।
वैसे तो मैंने इरफ़ान खान की अमूमन हर फिल्म देखी है। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद और ज़्यादा देखी। जब वे जीवित थे, मैं उनपर फिल्माया गया एक गाना अक्सर देखती और सुनती थी–
” मैंने दिल से कहा, ढूंढ लाना खुशी, ना समझ लाया गम , तो ये गम ही सही…!”
कितनी कशिश है इन पंक्तियों में, कितनी वेदना है , कितनी पीड़ा है। उनकी मृत्यु के बाद मैं अक्सर उनके निज के जीवन में भोगे हुए कष्ट को उक्त पंक्तियों से जोड़ देती थी और पहले से भी दुगुने गहरे दुख के साथ मैं इरफ़ान के कष्ट को खुद से जोड़कर देखने , समझने की कोशिश किया करती थी, आज भी करती हूं। मानों ये बोल इरफ़ान के निज के जीवन से ही संबंधित हों। उनके अभिनय में जो गंभीरता और एक अलग ठसक देखने को मिलती है , उसका असर बहुत लंबे समय तक बने रहने में सक्षम है। हर वो फ़िल्म अपनी एक अलग छाप छोड़ने में कामयाब रही है। चाहे ‘लंच बॉक्स’ हो या ‘पान सिंह तोमर’, ’मदारी’ हो या फिर ’अंग्रेज़ी मीडियम ’ गुलज़ार के ‘क़िरदार’ हों या फिर ‘करीब करीब सिंगल’ , ‘रोग’ हो या फिर ‘पीकू ’ ,‘ लाइफ ऑफ पाई’ हो या फिर ‘हिन्दी मीडियम ’ ,‘डी डे’ हो या फ़िर ‘ मक़बूल ’। हर किरदार को जिस खूबसूरती के साथ इरफ़ान निभा जाते हैं वह अद्भुत है। सत्य घटना पर आधारित फ़िल्म ‘पान सिंह तोमर’ का एक– एक संवाद दर्शकों को भीतर तक गुदगुदाने के साथ– साथ संवेदना के उस धरातल तक भी ले जाती है जहां भूख क्या होती है, यह यथार्थ समाज के समक्ष ला सके। गरीब के लिए सबसे ज़रूरी और बुनियादी ज़रूरत है रोटी…और उसके लिए वह कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार है। भूख के असल मायने क्या हैं इसे समझने के लिए पान सिंह की यह भूमिका इरफ़ान ने बखूबी निभाया है। यह कितनी त्रासद स्थिति है कि पान सिंह तोमर स्पोर्ट्स में जाना चाहते हैं वह भी सिर्फ़ इसलिए ताकि उसे अच्छा और भरपेट भोजन मिल सके…!
पेट की आग दुनिया की सबसे बड़ी आग होती है…! गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं…! गरीबी और अशिक्षा के कारण उसके साथ जो छल और अन्याय होता है यह कहीं न कहीं हमारे सिस्टम में मौजूद है। सिस्टम की खामियों को उजागर करती है यह फिल्म । यह सिस्टम ही है जिसने एक होनहार एथलीट को बागी बनने पर विवश किया…! पीकू और लंच बॉक्स तथा मकबूल जैसी फिल्म को भला कौन भुला सकता है! लंच बॉक्स के बारे में मैंने कुछ माह पूर्व एक समीक्षा लिखी थी, जिसे रश्मि रावत मैम ने और बाकी लोगों ने भी काफ़ी सराहा था। शायद उस समीक्षा का ही वह असर था कि इरफ़ान सर की पत्नी सुतापा सिकंदर ने मुझे एफबी पर सर्च किया था। वह दिन मेरे लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। सुतापा मैम इरफ़ान सर हमेशा हमारे दिल में रहेंगे। वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उन्होंने अपने अभिनय से हमारे दिलों दिमाग में अपनी अमिट छाप छोड़ने में सफलता प्राप्त की है। इरफ़ान आप जहां भी हैं, आप मेरी भावना को, आपसे जुड़े हर शख्स की भावना को महसूस कर पा रहे होंगे, ये मेरा विश्वास है।  वी लव यू sir… आप अपने अभिनय के माध्यम से हमेशा हमारे दिल में रहेंगे…! मदारी फिर लौटेगा, सबको हंसाएगा… अभी उसका खेला खत्म कहां हुआ है…!
– डॉ.चैताली सिन्हा 
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी),
शहीद भगत सिंह (सांध्य) महाविद्यालय, शेख सराय, फेज – ll
दिल्ली विश्वविद्यालय: 110017
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