Sunday, July 21, 2024
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संपादकीय – प्रेस स्वतंत्रता दिवस के तीन दिन बाद पत्रकार गिरफ़्तार

फोटो साभार : The Indian Express

अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता के नारे लगाने वाले तमाम चेहरे और दूसरे अन्य चैनल भी भावना किशोर, मृत्युंजय और परमिंदर सिंह की गिरफ़्तारी पर मुंह में दही जमा कर बैठे रहे। सुधीर चौधरी और आनंद रंगनाथन जैसे कुछ एक नामों ने भावना किशोर के पक्ष में आवाज़ उठाई; मगर समग्र रूप से पत्रकारिता जगत निरपेक्ष ही दिखाई दिया। कभी अर्णव गोस्वामी को जेल ले जाया गया था आज भावना किशोर को… कल किसी की भी बारी हो सकती है।

विश्व भर में प्रेस-स्वतन्त्रता दिवस 2 मई को मनाया जाता है और भारत की पंजाब सरकार ने उसके तीसरे ही दिन टाइम्स नाऊ नवभारत की पत्रकार भावना किशोर को अभद्र तरीके से न केवल गिरफ़्तार कर लिया, बल्कि उस पर अनर्गल धाराएं लगा कर उसे जेल भी भेज दिया। कार में सवार भावना के साथी कैमरामैन मृत्युंजय और ड्राइवर परमिंदर सिंह को भी जेल की सलाखों की पीछे धकेल दिया गया। 
पंजाब की लुधियाना पुलिस ने टाइम्स नाऊ नवभारत की पत्रकार भावना किशोर को हिरासत में लेने के कुछ समय बाद एक प्रेस नोट रिलीज किया। इस नोट में बताया गया है कि लुधियाना पुलिस ने शुक्रवार (5 अप्रैल 2023) को 3 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनके ऊपर तेज़ स्पीड में गाड़ी चलाकर एक महिला को टक्कर मारने और अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने का आरोप है। इन तीनों की पहचान भावना कुमारी, मृत्युंजय कुमार और ड्राइवर परमिंदर सिंह के तौर पर हुई है।
इस केस को पुलिस ने आईपीसी की धारा 279, 337 और 427 के तहत दर्ज किया है। इसके अलावा एससी-एसटी एक्ट की धारा 3,4 के तहत डिवीज़न नंबर 3 पुलिस थाने में दर्ज किया गया है। हम समझते हैं कि पुरवाई के पाठकों को इन धाराओं के विषय में कुछ जानकारी देना आवश्यक है। 
IPC की धारा 279 सड़क दुर्घटना से संबंधित है। इस धारा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी वाहन को एक सार्वजनिक मार्ग पर किसी भी तरह की जल्दबाजी या लापरवाही से चलाता है, जिससे किसी व्यक्ति के जीवन को कोई संकट पैदा हो सकता है; तब उस ड्राइवर पर रैश ड्राइविंग का चार्ज लग सकता है। इसमें दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को 6 महीने की जेल हो सकती है। इसके अलावा, 1000 रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। मगर यह धारा टैक्सी या कार में बैठे यात्री पर नहीं लगाई जा सकती।
जहां धारा 279 सड़क दुर्घटना से जुड़ी है वहीं भारतीय दंड संहिता की धारा 337 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी को उतावलेपन या उपेक्षा पूर्वक ऐसे किसी कार्य द्वारा, जिससे मानव जीवन या किसी की व्यक्तिगत सुरक्षा को ख़तरा हो, चोट पहुँचाना का काम करता है, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दंड जो पाँच सौ रुपए तक हो सकता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 427 उस आरोपी पर लगाई जाती है, अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के साथ कुचेष्टा करता हैं या फिर किसी व्यक्ति को पचास रुपए या फिर इससे अधिक धन राशि का हानि या नुकसान पहुंचाता हैं; और ऐसा करने पर वह व्यक्ति न्यायालय द्वारा दोषी पाया जाता हैं, तो उस व्यक्ति को यानी अपराधी को कड़ा दंड देने का प्रावधान है।
पंजाब पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता गगन ने कहा कि वो मोहल्ला क्लिनिक के उद्घाटन समारोह में जा रही थीं कि तभी एक इनोवा कार ने तेजी में आकर उन्हें टक्कर मार दी, जिसके कारण उनके हाथ में चोट लग गई और उनका सैमसंग का फ़ोन भी नीचे गिरकर टूट गया। शिकायतकर्ता के अनुसार, इस घटना के बाद गाड़ी से दो लोग (मृत्युंजय कुमार और भावना कुमारी) उतरे और झगड़ा करने लगे। इस दौरान अपमानजनक भाषा का प्रयोग भी किया गया।
आम आदमी पार्टी का गठन गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ था। इसकी स्थापना गांधी जी के जन्मदिन पर 2 अक्टूबर 2012 को हुई। औपचारिक रूप से पार्टी की शुरुआत 26 नवंबर 2012 को हुई। अन्ना के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले अरविंद केजरीवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, शाजिया इल्मी, आशुतोष गुप्ता और कुमार विश्वास जैसे लोग इसके संस्थापकों में शामिल थे। वर्तमान स्थिति यह है कि अरविंद केजरीवाल के अलावा बाकी सभी संस्थापक सदस्य अब आम आदमी पार्टी से दूरी बना चुके हैं। तमाम संस्थापक सदस्यों को महसूस हुआ कि केजरीवाल के दो चेहरे हैं… एक जनता के सामने और एक असली। उनके सभी पुराने साथियों को एक ही शिकायत रही कि बंदा पूरा तानाशाह है और ईमानदार तो बिल्कुल नहीं।
7 जून 2013 को अरविंद केजरीवाल ने अपने शपथ-पत्र की यह प्रति, तमाम नई दिल्ली विधान सभा क्षेत्रों में अपने चुनाव से पहले बाँटी! यह शपथ-पत्र 10 रुपये के स्टैंप पेपर पर टाइप किया गया था। इसमें अरविंद केजरीवाल ने कहा है:- मैं जीतने के बाद निम्न बातों का पालन करूँगा:- 1) मैं लालबत्ती की गाड़ी नहीं लूंगा। 2) मैं अपने लिए, अन्य आवश्यक सुरक्षा नहीं लूंगा। सुरक्षा बल, नेताओं की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि आम आदमी की सुरक्षा के लिए होना चाहिए। नेता को आम आदमी से ज़्यादा सुरक्षा नहीं होनी चाहिए। 3) मैं बड़ा बंगला नहीं लूंगा आम आदमी की तरह सामान्य घर में रहूंगा….. 
मगर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और अरविंद केजरीवाल में एक कला की महारथ समान रूप से भरी है – यू-टर्न! दोनों को अपनी बात से फिर जाने की आदत है। जो-जो बात कहते हैं कुछ ही दिनों में उससे ठीक उलटा आचरण करते हैं। 
दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री थे चौधरी ब्रह्म प्रकाश (कांग्रेस) (17 मार्च 1952 से 12 फ़रवरी 1955) उसके बाद निहाल सिंह (कांग्रेस), मदन लाल खुराना (भाजपा), साहिब सिंह वर्मा (भाजपा) एवं सुषमा स्वराज (भाजपा) तक के मुख्यमंत्री अपना-अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। सुषमा स्वराज तो केवल 52 दिनों के लिये ही मुख्यमंत्री रहीं। इसके बाद शीला दीक्षित करीब 15 वर्ष 25 दिनों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। इन सब मुख्यमंत्रियों में एक बात समान थी कि शीला जी से पहले के मुख्यमंत्री तो अपने घर से ही सचिवालय तक आते-जाते रहे। जबकि शीला दीक्षित पहले मथुरा रोड और फिर दूसरे निवास में रहीं भी तो कोई ऊल-जलूल पैसा अपने निवास के रख-रखाव या मरम्मत पर नहीं ख़र्च किया। अरविंद केजरीवाल पहली बार 49 दिन के लिये  मुख्यमंत्री बने। फिर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लग गया। दोबारा चुनाव होने पर 14 फ़रवरी 2015 से आज तक अरविंद केजरीवाल ही दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं।
जिस तरह आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों के साथ अरिवंद केजरीवाल की नहीं पटी। ठीक वैसे ही दिल्ली का राज्यपाल चाहे कोई भी क्यों न हो, केजरीवाल का उनके साथ 36 का आंकड़ा ही बना रहता। 
जब टाइम्स नाऊ नवभारत ने केजरीवाल के शीशमहल के राज़ उजागर किये और बताया कि किस तरह मरम्मत का बजट पास करवा कर पूरा नया महल तैयार किया गया और उस महल में विएटनाम से मार्बल, इटली से टाइल्स, महंगे पर्दे, टॉयलेट सीट और किचन का सामान लगवाए। 28 पेड़ काट डाले। और पुराने निवास को गिराकर वहां घास उगवा कर लॉन बनवा लिया। 
यह माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल टाइम्स नाऊ नवभारत की इस मुहिम से ख़ासे नाराज़ हो गये। समझ ही नहीं पा रहे थे कि टाइम्स नाऊ नवभारत से बदला कैसे लिया जाए। अचानक कार के साथ-साथ  दिमाग़ की लाल-बत्ती भी जल गयी। ऐसा हो सकता है कि उन्हें याद आया कि पंजाब का मुख्यमंत्री तो उनकी अपनी पार्टी का ही है, जो कि उनकी हर बात ‘मान’ ही लेगा। बस मुहल्ला क्लिनिक की लाँच पर टाइम्स नाऊ की पत्रकार भावना किशोर को बुलाया और षड़यंत्र करते हुए फंसा भी लिया। 
बिना नेम-बैज के पुरुष पुलिस अधिकारी ने भावना को कार में बिठा कर लगभग अगवा करते हुए गिरफ़्तार किया। रात को बिना किसी महिला अधिकारी के भावना को पहले थाने और फिर जेल ले जाया गया। ज़ाहिर है कि टाइम्स नाऊ की टीम ने पूरे भारत में शोर मचा दिया। मृत्युंजय ने गुहार लगाई कि उसके पुत्र का ट्यूमर का आपरेशन है। मगर ‘मान’ कहां मानने वाले थे। 
टाइम्स नाऊ ने अपने शो में भी आरोप लगाया कि ऑपरेशन शीशमहल के बाद उनके पत्रकारों से बदसलूकी की जा रही है। पहले उन्हें पीटा गया, उनके रास्ते रोके गए और अब एक पत्रकार को बीच रास्ते में हिरासत में ले लिया गया। चैनल ने बताया कि भावना को लुधियाना पुलिस ने हिरासत में लिया है। एक एफआईआर हुई है। उनपर बेवजह एस.सी. /एस.टी. एक्ट लगा दिया गया है।
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने पंजाब पुलिस के डीजीपी से इसमें व्यक्तिगत हस्तक्षेप करने और मामले की जांच कराने को कहा है। आयोग ने इस केस से जुड़ी एफ़.आई.आर. की कॉपी और इस मामले में अब तक की गई कार्रवाई से जुड़ी रिपोर्ट चार दिन में आयोग को भेजने के निर्देश दिए हैं।
9 मई को टाइम्स नाउ की ग्रुप एडिटर नविका कुमार और एंकर सुशांत सिन्हा के साथ बातचीत में हिरासत के दौरान पंजाब पुलिस की प्रताड़ना का जिक्र करते हुए भावना किशोर फूट-फूटकर रो पड़ीं।
भावना ने बताया कि हिरासत के दौरान उनसे दरवाजा खोलकर वॉशरूम जाने को कहा गया। उनकी जाति को लेकर सवाल पूछा गया। उन्होंने बताया, “पुलिस अधिकारी ने कहा रात के एक बजे आपका मेडिकल होगा। आपको मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना है। मुझे कानून के इतना दांव-पेंच नहीं पता थे। मेरी तबीयत खराब हो रही थी। घबराहट हो रही थी। जो उन्होंने दिया मैंने खाया। ड्राइवर और कैमरामैन ने भी थोड़ा सा खाया। मैं बहुत पानी पी रही थी, क्योंकि मैं नर्वस महसूस कर रहा थी। जब मैं वॉशरूम गई तो मेरे साथ 2-3 महिला कॉन्स्टेबल भी थीं। पुलिस स्टेशन में बिजली या पानी नहीं था।”
भावना किशोर ने यह भी बताया कि उन्हें नहीं बताया गया था कि वह गिरफ्तार हो चुकीं हैं। इसलिए वह एक पुलिस अफसर से बार-बार विनती कर रहीं थीं कि उन्हें घर जाने दिया जाए। इस पर पुलिस अफसर ने कहा, “भावना मैं हाथ जोड़कर तुमसे माफ़ी माँगता हूँ। तुमने अब तक बहुत हिम्मत दिखाई है। मेरी दो बेटियाँ हैं। मैं घर जाकर उनसे क्या बोलूँगा मुझे यह नहीं पता। लेकिन मुझे पता है कि मैं अपनी ड्यूटी के साथ ईमानदारी नहीं कर रहा हूँ। भावना तुमने जो खबर चलाई है उसे हटाओ बात करके। ये सरकार है, तुम इससे कभी जीत नहीं पाओगी।”
अब तो सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल के हाथ और मज़बूत कर दिये हैं। अब वे अफ़सरों की नियुक्ति में भी मनमानी बरत सकते हैं। पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता का शोर मचाने वाली पार्टी और उसके मुखिया किस तरह पत्रकारों का दमन करने वाले है, यह तो भविष्य ही बताएगा।
मगर दुख एक बात का है। अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता के नारे लगाने वाले तमाम चेहरे और दूसरे अन्य चैनल भी भावना किशोर, मृत्युंजय और परमिंदर सिंह की गिरफ़्तारी पर मुंह में दही जमा कर बैठे रहे। सुधीर चौधरी और आनंद रंगनाथन जैसे कुछ एक नामों ने भावना किशोर के पक्ष में आवाज़ उठाई; मगर समग्र रूप से पत्रकारिता जगत निरपेक्ष ही दिखाई दिया। कभी अर्णव गोस्वामी को जेल ले जाया गया था आज भावना किशोर को… कल किसी की भी बारी हो सकती है।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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32 टिप्पणी

  1. Your Editorial of today presents important details of the background of Bhavana Kishore’ s arrest by the Punjab police on flimsy grounds while the real reason was her exposure of Arvind Kejriwal’ s expenditure on the CM ‘S residence.
    And you have also reminded your readers how during Anna Hazare’s fast days Arvind Kejriwal spoke differently.
    Very well written Editorial.
    Congratulations n regards
    Deepak Sharma

  2. संपादकीय सुंदर शोधपूर्ण व विचारणीय है। समसामयिक ज्वलंत मुदको अपनी संपादकीय में निर्भीकता पूर्वक उठाना आपकी विशेषता है।
    पत्रकारों को बदले की भावना से डराने धमकाने सताने अथवा दबाने के लिए गिरफ्तार करके अपमानित करना प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है।
    दिल्ली में मुख्यमंत्री निवास को शीशमहल का रुप देना कोई अपराध चोरी या भ्रष्टाचार नहीं है। जनता का पैसा जनता के प्रतिनिधि के लिए खर्च हो रहा है। दिल्ली का मुख्यमंत्री निवास भव्य होना हीं चाहिए। यदि संभव हो सके तो अमेरिका के ह्वाइट हाउस से भी भव्य। शीशमहल अरविंद केजरीवाल का नीजी महल नहीं है और न हीं दिल्ली की कुर्सी पर उसका आजीवन अधिकार है। मुंबई की तरह कल कोई आटो रिक्शा चालक दिल्ली का मुख्यमंत्री बनता है तो कल शीशमहल का सुख वह आटो रिक्शा चालक भोगेगा अरविन्द या उसका परिवार नहीं। केजरीवाल परिवार को वहाँ से निकलना होगा। इसलिए शीशमहल पर खर्चा की चर्चा को मैं अनावश्यक मानता हूँ।
    हाँ पत्रकारों का अपमान गलत है। दिल्ली जंतर-मंतर पर इसी तरह साक्षी जोशी नामक एक महिला पत्रकार की पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा रात मे गिरफ्तारी और अपमान हुआ। उसके कपड़े फाड़ दिये गये। बहुत से पत्रकारों पर सीधी कारवाई नहीं हुई मगर अपरोक्ष कारवाई के तहद उन्हें उनकी नोकरी से हटवा दिया गया। इस तरह की घटनाएँ निंदनीय है।
    संभव है कुछ हद तक पत्रकार भी दोषी हों। स्वच्छ पत्रकारिता भारत से समाप्त हो गई है। पत्रकारिता समर्थन और विरोधी दो वर्गों में विभाजित होकर अराजक हो गई है।
    समर्पितों का काम सिर्फ गुणगानऔर विरोधियों का काम सिर्फ विरोध रह गया है। आमलोगों को दिनभर टीवी अखबार रेडियो आॅनललाइन की खाक छानने के बाद भी वह समाचार जानने सुनने को नहीं मिलता जो अस्सी के दशक में आधे घंटे के समाचार बुलेटिन मे मिलता था। समाचार और सच्ची पत्रकारिता भारत से या तो लुप्त है या लुप्तप्राय है।
    संबंधित मंत्रालय पत्रकारिता के मानक मानदंड तय करने के बजाय मौन है तमाशबीन है।
    पत्रकारिता के उचित मानदंड तय होंने चाहिए ताकि प्रेस की स्वच्छ कार्यशैली तथा आजादी दोनों कायम रहे।

    • आप अभी तक मन से ब्रिटिश हैं। भारत का राष्ट्रपति भवन, विश्व के भव्यतम भवनों में है। व्हाइट हाउस से भी बड़ा। अंग्रेजों ने अपना दबदबा बनाने के लिए, भारतीय संसाधनों और श्रम का शोषण करके बड़े-बड़े भवन, गवर्नर हाउस, DM के आवास भी बनाये । यह तरीके थे अंग्रेजों के अपना वर्चस्व दिखाने और भारत की जनता को हीन दिखाने, आतंकित करने के । फिर आप समर्थन कर रहे हैं भव्य मुख्यमंत्री आवास का???? क्या आपको वास्तव में विश्वास है कि ऑटो चालक पंजाब का मुख्यमंत्री है, शपथ ले कर झूठ बोलने वाले पर श्रद्धा है, या ये बात जनता को बतायी गयी है?
      नेता जन प्रतिनिधि हैं। उनको जनता के समान रहना चाहिए। करदाताओं का पैसा, जनता के जीवन स्तर को सुधारने में खर्च किया जाना चाहिए, ना कि मुख्यमंत्री होने का जलवा दिखाने में।
      तेजेन्द्र जी ने आरम्भ में केजरीवाल की प्रतिज्ञा का ज़िक्र किया है, जो आपके दृष्टिकोण से बिल्कुल विपरित है।
      अंध भक्ति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि, अन्याय और अनुचित का समर्थन किया जाय।
      आप जागरूक व्यक्ति हैं, एक चीज़ है, “सिटीजन जर्नलिस्ट”, कोई भी समान्य व्यक्ति, पत्रकारिता कर सकता है, सोशल मीडिया के ज़माने में अपनी आवाज उठा सकता है। आप स्वयं यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं। ‘स्वतन्त्र, सतर्क, निर्भीक पत्रकारिता के ध्वज-वाहक’ हो सकते हैं। क्रांति एक व्यक्ति से शुरू होती है… आपको हार्दिक शुभकामनायें

      • यहां हम शैली जी की बात से पूर्णतः सहमत हैं । शासक कितना भी बड़ा क्यों न हो, भले ही चिरकाल के लिए भी न हो,जनता की गाढ़ी कमाई इस तरह से लुटाने का उसे कोई अधिकार नहीं । शीशमहल तो बस एक बानगी है, वो जो मुफ़्त का बिजली पानी देकर ख़ुद के लिए वोट ख़रीद रहे हैं, उसके दुष्परिणाम भी भविष्य में देखने अभी बाकी हैं ।
        जहां जनता के पैसे और सत्ता की ताक़त का दुरपयोग हो रहा है, आवाज़ उठाना बनता है ।

      • आपने मुझे मन से ब्रिटिश कहा क्षमा चाहता हूँ मुझे आपका तात्पर्य समझ नहीं आया।
        भारत का राष्ट्रपति भवन स्वतंत्र भारत सरकार की कृति नहीं है।
        बात शीशमहल की फिजूलखर्ची पर चल रही थी। तो जानना जरूरी यह है कि मकान के सजावट पर कितना खर्च करने की जरूरत या अनुमति थी और कितना ज्यादा खर्च हो गया। भगोड़े उद्यमी जितना लेकर फरार हो गए उतना हीं। उससे कम या उससे ज्यादा?
        आज का भारत आज से तीस वर्ष पहले के भारत जैसा गरीब नहीं है। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि सिर्फ दिल्ली हीं क्यों? समुचे भारत में जर्जर दयनीय एवं गरीबी के प्रतीक सरकारी भवनों की जगह विश्व स्तरीय साफ सुथरे सर्वसुविधा संपन्न सरकारी इमारतों का निर्माण हो। मैं चाहता हूँ अमेरिका इंग्लैंड से लौटे हुए भारतीयों को यहाँ आकर अंग्रेज बनने का मोका न मिले। आन देश से तुलना करके किसी को देश की दुर्व्यवस्था पर हँसने का अवसर न मिले। उसे आभास हो कि हमारा भारत दुनिया से दो हाथ आगे है परंतु पीछे नहीं। आज की व्यवस्था में यह सब संभव है। निःसंदेह व्यवहारिक एवं नितांत आवश्यक भी है।
        मेरे कहने न कहने चाहने अथवा नहीं चाहने से भले हीं कुछ नहीं होगा।
        परंतु अपने देश की समृद्धि की चाह रखना मेरा नैतिक व संवैधानिक दोनों अधिकार है।
        आॅटो चालक मुख्यमंत्री मैंने महाराष्ट्र के लिए कहा था। आपने न जाने पंजाब का कैसे और कहाँ पढ लिया। आज देश में फिजूलखर्ची की अपनी-अपनी परिभाषा है।
        मेरी नजर में 10 लाख का सूट फिजूलखर्ची नहीं है। प्रमं जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति को इतना विशेषाधिकार होना चाहिएकिवह अपनी पसंद के कपड़े पहन सके। परंतु इस देश ने इतना हल्ला मचाया कि प्रमं को वह सूट नीलाम करवाना पड़ा।
        इसी तरह मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने पसंद से अपना निवास सजाए। परंतु इस देश के कुछ लोगों को बड़ा रंज है कि उसनें पक्के मकान में न रहने का प्रतिज्ञा किया था तो अब वह पक्के मकान में क्यों रहता है। पर्णकुटी में क्यों नहीं रहता।
        झूठे वादे प्रतिज्ञाओं पर यदि भारतीय  राजनीति में इतना हीं सख्त लगाम होता तो केजरीवाल यमुना किनारे की झुग्गियों में रह रहा होता। देश में सौ स्मार्ट सिटी पाँच साल पहले तैयार होता। बुलेट-ट्रेन में अबतक दस प्रतिशत भारतीय सैर कर चुके होते। युवाओं को 2014 से अब तक कम से कम 17 करोड़ नई नौकरियाँ मिल गई होती। झूठे वादों पर प्रतिबंध होता तो भारत से गरीबी पचास वर्ष पहले समाप्त हो गई होती। बचे खुचे बेघरों को 2022 तक जहाँ झुग्गी वहीं मकान मिल गया होता। मगर ऐसा कुछ भी नही हुआ।

        संपादक और लेखक के विचारों से पाठकों का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। रचनाओं पर प्रतिक्रिया का विकल्प इसलिए होता है कि पाठक अपनी प्रतिक्रिया रख सके। असहमतियों पर तार्किक चर्चा होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि आँख बंद अपनी हो और दुसरों को कहा जाए कि तुम चुप रहो तुम अंधे हो।

  3. वाकई ये बेहद खतरनाक बात है, मेरी मृत्युंजय से बात भी हुई , वो पुराना कलीग है, स्थिति वाकई बेहद डरावनी थी। मेरे एफबी फ्रेंड में बहुत से पत्रकार हैं लेकिन एक अकेला मै था जिसने इस पर सवाल उठाए या अपने पोर्टल पर डाला, शुक्रिया कि आपने इस पर लिखा, आज पत्रकार सवाल उठाना भूल गए हैं जो सबसे अहम और ज़रूरी होता है एक पत्रकार के लिए। केजरीवाल जी तो राजनीति का बेहद घिनौना चेहरा है, पता नहीं इस देश की जनता कब समझेगी?

    • आप स्थिति को और भी बेहतर समझ सकते हैं आलोक। गंभीरता से विचार करना होगा।

  4. सियासत की तानाशाही का सही आकलन है
    मैं और मेरा हित ही कुछ राजनैतिक दलों का मुख्य उद्देश्य हो गया है।
    फिर सुबह होगी कहने में डर लगता है ।

    Dr Prabha mishra

  5. बहुत सार्थक संपादकीय । आज अत्यंत शोचनीय व चिंतापूर्ण स्थितियों में पत्रकारिता मानो अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष में लगी हुई है। पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करना समस्त समाज के विकास को रोकना है अतः इस पर सभी बात चर्चा करनी ही चाहिए। यह इंतजार करते हैं कि अभी हम सुरक्षित हैं लेकिन भूल जाते हैं कल को हमारा भी नंबर आ सकता है।

  6. आपके निर्भीक संपादकीय पढ़ कर भी लोग पत्रकारिता पर प्रश्न उठाते हैं, लेकिन मुझे आशा की किरण दिखती है। अभी सम्पूर्ण अंधकार नहीं हुआ है।
    बहुत सी धाराओं का ज्ञान देता अच्छा सम्पादकीय।
    धन्यवाद

  7. इस पूरे घटनाक्रम के पीछे का कारण आज पता चला । “यूं टर्न” लेने का (दुर्) गुण उस व्यक्ति के दुष्चरित्र की पहचान है ।उसके किसी भी वक्तव्य पर, किसी वादे पर विश्वास नहीं किया जा सकता; ऐसे में उसे पूरे प्रदेश की सत्ता मिल जाये तो इससे दुखद क्या होगा । छिछलापन यह कि बदला लेने की प्रवृत्ति के चलते किसी भी सीमा तक गिरने से भी ग़ुरेज़ नहीं ।
    दूसरे न्यूज़ चैनल्स ने इसे कवर भी नहीं किया , सम्भवतः आपसी प्रतिस्पर्धा कारण हो ! आज समय ऐसा है कि पत्रकारों में निष्पक्षता और एकजुटता का अभाव दुष्परिणामों का कारक हो सकता है ।
    यह संपादकीय eye opener है । काश इससे लोग कुछ सीख लें !
    तमाम जानकारियों के लिए धन्यवाद और प्रभावशाली आलेख के लिए साधुवाद!

  8. समय गवाह है जब जब जनता को जरूरत से ज्यादा दबाया गया है तब तक क्रांति हुई है और सत्ता पलटी है। अब उसी क्रांति की शुरुआत है।
    आप बहुत सारगर्भित तरीके से जानकारियां देते हैं। आपको संपादकीय के लिए बहुत-बहुत साधुवाद।

  9. पर्दे के पीछे का सत्य उजागर करते, एक निर्भीक संपादकीय के लिए साधुवाद,
    यह घटना इतनी ‘नगण्य’ मानी गई कि इसके बारे में बहुत कम जानकारी जनता को मिल पायी।
    आपने तो लगाई गई धाराओं की विस्तृत जानकारी देकर हम जैसे अज्ञानियों का बड़ा उपकार किया है।
    केजरीवाला जी के तो कहने ही क्या,! मुफ्त बिजली देकर बिजली कंपनियों और सरकार को घाटे की तरफ ढकेल दिया ,भोली -भाली जनता को शराब के घूंट पिला कर बेहोश कर दिया और अपने लिए आलीशान महल की तैयारी कर ली ।करोड़ों के विज्ञापन देकर मीडिया और कुछ चैनलों को भी रिश्वत देदी। फिर तो कहना ही क्या ,दसों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में। जिसके कथन की कोई विश्वसनीयता ही ना हो वह शीशमहल‌ तो क्या “हीरक महल” भी अपने लिए बनवाए तो आप क्या कर सकते हैं! इसी को कहते हैं हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और ,,या फिर मुंह में राम बगल में छुरी या बगुला भगत ,
    जेल में बंद कुछ धर्मगुरुओं और श्री केजरीवाल में मुझे तो कोई अंतर नहीं लगता।

  10. ‘ये सरकार है इससे तुम नहीं जीत पाओगी ‘ ये पंक्तियाँ समाज में व्याप्त अराजकता को आईने में दिखाती है . बहुत ही सारगर्भित सम्पादकीय के लिए हार्दिक बधाई

  11. ‘प्रेस स्वतंत्रता के तीन दिन बाद पत्रकार गिरफ्तार’ शीर्षक आज की सरकारों के प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर करारा प्रहार है। सरकारें कुछ भी करती रहें किन्तु कोई भी मुंह न खोले। यह वहीं अरविन्द केजरीवाल हैं जिन्होंने कांग्रेस की सफल सी. एम. शीला दीक्षित पर टैक्स पेयर का पैसा हड़प करने का आरोप लगाया था, उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर, दिल्ली की सत्ता प्राप्त कर, एक नई तरीके के राजनीति करने की बात की थी तब लगा था कि ये सच में ईमानदारी से शासन करेंगे क्योंकि ये अन्ना हजारे के आंदोलन की उपज थे।

    जब टाइम्स नाऊ नवभारत ने केजरीवाल के शीशमहल के राज़ उजागर किये तो उसकी महिला पत्रकार तथा अन्य लोगों पर जिस तरह आरोप लगाकर, विभिन्न धाराओं के तहत उन्हें न केवल गिरफ्तार किया वरन प्रताड़ित भी किया गया। पुलिस ऑफिसर का कथन उनकी तथा उनकी सरकार की राजनीति के घिनौने स्वरुप को पेश करता है।

    विभिन्न धाराओं के बारे में जानकारी देते हुए, अरविंद केजरीवाल की चाल, चरित्र और मंशा को बताने के साथ सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संदर्भित करने वाले बेहतरीन संपादकीय के लिए साधुवाद।

  12. This is indeed a very sad state of affairs.But the public that is so easily lured by freebies and subsidies is responsible for this.The masses must be enlightened enough to elect the right kind of leaders.For that they have to rise above the petty baits being thrown by the unscrupulous politicians to trap them.

  13. पत्रकारिता का गला खराब हो गया है. पत्रकारिता को रतौंधी हो गई है. पत्रकारिता ना किसी मंदिर का कलश है और नहीं पत्रकार उस मंदिर में स्थापित देवता, जिसके कल्पित वरदान या अभिशाप से स्वर्ग नरक बना करते हैं. टीवी चैनल वाले पत्रकारिता क्या है नहीं जानते. सनसनी वाली खबरों से समाज का कोई हित नहीं होता. इन पत्रकारों को आम आदमी पार्टी की सरकार ने मैनेज नहीं किया तो वे लाइन से बाहर चले गए.

  14. There is a big competition among media houses. कौन आवाज़ उठाये।

    होता है, चलता है, भारत है – यह लोगों ने ‘मान’ लिया है। मुफ़्त की रेवड़ी मिलती रहे बस।

  15. तेजेन्द्र जी! आपको इतने निर्भीक संपादकीय के लिए अशेष साधुवाद।
    हम सब जानते, समझते हैं कि टी.वी पर चिल्लाकर बोलना कितनी ही बार सत्य को दबाना ही होता है।
    जितनी जल्दी यू टर्न लिए जाते हैं, उन्हें सब देख समझकर भी उनको स्वीकार करते हैं
    ऐसे लोगों के बारे में क्या बात की जाए!
    किसी भी घटना से जुड़ी और भी घटनाएँ होती ही हैं। स्वाभाविक है उस पर बात होना। इस पर क्यों चर्चा नहीं होनी चाहिए? सब भारतीय यही चाहेंगे कि अपना देश हर देश से सब चीज़ों में बेहतर हो लेकिन क्या इस प्रकार से? फिलहाल तो जनता के पैसे से एक बंदा इतने वर्षों से ऐश कर रहा है।जब कोई दूसरा आएगा तब की बात तब!
    आपने धाराओं के बारे में स्पष्टीकरण करके भी अच्छी चर्चा की है।
    सच है, कुछ कहा नहीं जा सकता कब, क्या, क्यों, घटित हो? स्थिति वास्तव में बहुत चिंताजनक है।
    सार्थक संपादकीय के लिए धन्यवाद

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