Saturday, May 18, 2024
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तारकेश्वरी ‘सुधि’ की कुछ कह-मुकरियां

1
जैसी हूँ वैसी बतलाए।
सत्य बोलना उसे सुहाए।
मेरा मुझको करता अर्पण।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्पण।
2
मुझको बाँहो में ले लेती।
मीठे प्यारे सपने देती।
वह सुख से भर देती अँखियाँ।
क्या प्रिय, सजनी? ना प्रिय, निंदिया।
3
मेरे चारों और डोलता।
जाने क्या क्या शब्द बोलता।
बड़े गूढ़ हैं सारे अक्षर।
क्या सखी, प्रेमी? ना सखि, मच्छर।
4
जब-जब मेरा तन-मन हारा।
दिया सदा ही मुझे सहारा।
उसके बिना न आए  निंदिया।
क्या सखि, साजन? ना सखि,तकिया।
5
रात गए वह घर में आता।
सुबह सदा ही जल्दी जाता।
दिन में जाने किधर बसेरा।
क्या सखि, साजन? नहीं,अँधेरा।
6
सब सुविधाएँ उस पर निर्भर।
उसके बिन हो जीवन दूभर।
और न दूजा  उसके जैसा।
क्या सखि,साजन?ना सखि, पैसा।
7
कभी इधर वह उधर घूमता।
बार-बार ये गाल चूमता।
मिलता चैन न उसे एक पल।
क्या सखि, साजन? ना सखि, कुंतल।
तारकेश्वरी सुधि
तारकेश्वरी सुधि
सुधियों की देहरी पर (दोहा संग्रह)। अनेक साझा संकलनों में दोहे,गीत,ग़ज़ल,कुंडलिया,लघुकथा प्रकाशित । विभिन्न दैनिक व मासिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन. सम्प्रति- शिक्षिका और स्वतंत्र लेखन. सम्पर्क - इन्द्रा कोलोनी,वार्ड न० 1, जोबनेर ,जयपुर ईमेल- truyadv44@gmail.com
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