Thursday, April 16, 2026
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लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : *बीरन की राखी* (भाग – 4)

प्राननाथ,

चरन स्पर्श।

सावन में बारिस धीमी हो गई थी। बरसता तो रहा, पर तमीज से बरसा। कभी खुल जाता था, तो कभी बरस जाता था। इससे वैसी दिक्कत नहीं रही, जैसी शुरुआत में थी। फिर दिक्कत की तो ये है कि महसूस किया जाए, तो हर मौसम में कुछ न कुछ परेशानी होती है। चिन्ता की ज्यादा बात नहीं है।

एक बात से बहुत दुखी हूँ, सावन निकल गया, मुझे मायके से कोई लिबाने नहीं आया। अगर कोई आ जाता, तो रक्षाबन्धन का त्योहार न मना आती? संग की सब बिटियाँ आई होंगी। आज समझ में आया कि मेरा कोई नहीं है। सारे रिश्ते झूठे हैं। माँ थी, तब तक एहसास नहीं हुआ। माँ के जाने के बाद सब खतम-सा हो गया। ठीक ही कहा गया है कि माई तक मायका, पिया तक ससुराल होती है। माँ के गुजरने के बाद मायका भी पराया हो गया।

माँ थी, तब सावन की बात अलग थी। हरियाली के कपड़े पहने प्रकृति थिरकती सी लगती थी। बारिश में भीगती, तो माँ खूब डाँटती थी। माँ की डाँट को कौन सुनता था। उनका चिल्लाना और हमारा सुनना बराबर था। पन्द्रह दिन पहले से ही नीम पर झूला पड़ जाता। सहेलियों के साथ मैं खूब झूला झूलती थी। माँ मेंहदी की हरी पत्तियाँ तोड़ लाती थी और उसे सिलबट्टा से पीसकर मेरे हाथों में रचा देती। मैं इठलाती हुई मेंहदी रचे हाथों को सबको दिखाती थी।

मुहल्ला भर की औरतें अथाई में इकट्ठी होकर सावन गीत गाती थी। इस महीने में खूब बादल छाए रहते थे। कभी-कभी बादल खुल जाते, तो छिटकी चाँदनी में गीतों का स्वर और मधुर हो जाता था। माँ का एक गीत मेरे दिल को बहुत भाता था। वे गाती भी अच्छा थीं। माँ जब इस दुनिया में नहीं है, तब वह गीत और शिद्दत से याद आता है। माँ भाव-विभोर होकर गाती-

माई… मोरे बिर…न लै… बउआ-ऽ प… ठवइ-ऽ-ये
का… हे खें मइया-ऽ ऽ तैने ज… ल… म दए-उते
का…हे…खें लि… खे है पर… देस
माई…मोरे…

 

गाते-गाते माँ की आँखें गीली हो जाती थीं। शायद उन्हें मेरी याद आ जाती होगी। ‘बिरन लिबउआ’-बेटी माँ से कहती है कि माँ राखी के दिन भाई को मुझे लिबाने के लिए भेजना। मेरा कोई भाई नहीं, माँ किसे कहती? यही सोचकर माँ की आँखें भर आती होंगी। मैं पगली उन आँसुओं का रहस्य न समझ पाती थी या इन बातों पर ध्यान न जाता। उस समय तो आँखों में न जाने कितने सपने उमड़ते-घुमड़ते। आज बीत रही है, तो एक-एक शब्द का अर्थ खुल रहा है। ऐसा लगता है जैसे इस गीत की रचना हम जैसों के लिए ही की गई हो।

माँ भी… मेरे लिए क्या-क्या करती थी। एक खप्पर में कजली बो देती थी और विधि-विधान से उन्हें दूध और पानी से सींचती थी। सब लड़कियों के साथ मैं भी नए कपड़ों में कजली सिर पर रखे तालाब में विसर्जन के लिए चल देती। हँसती-गाती लड़कियाँ उन्हें तालाब में सिरा आती। खुटी कजलियाँ एक-दूसरे को बाँटते। बहुत आनन्द आता था। नत्थू के गले में जो काला धागा होता था, उसी में मैं कुछ कजली गूँथ देती। वह खुश हो जाता। नत्थू तुतलाकर कहता, “बुआ, एक औल बना दे।” मैं दोबारा गूँथ देती। वह खुश होकर अपनी माँ को दिखा आता। बचपन में नत्थू मरघिल्ला-सा था, अब तो गबडू जवान हो गया है।

आपने बताया था कि हर जगह रक्षाबन्धन सावन की पूनों (पूर्णिमा) को मनाया जाता है। अपने यहाँ यह त्योहार एक दिन बाद होता है। उसी दिन कजली विसर्जित होती है। इसका इतिहास महोबा के चन्देल राजा परमाल से जुड़ा हुआ है। राजा चन्देल ने अपने दो सामन्तों वीर आल्हा ऊदल को माहिल के कहने से देश निकाला दे दिया था। कूटनीति का माहिर माहिल परमाल का साला था। इसी से लोक आख्यानों में उरई का माहिल ‘मामा’ नाम से विख्यात हो गया। वह परमाल के राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता था। कारण था, राजा परमाल ने महोबा पर आक्रमण करके उस पर कब्जा करके उसकी बहन मल्हना से जबर्दस्ती ब्याह रचा लिया था। इतना ही नहीं, उसकी दो अन्य बहनों का ब्याह देशराज और बच्छराज के साथ करा दिया था। ये बनाफर जाति के थे, जिन्हें राज समाज में हीन माना गया था। आल्हा ऊदल देशराज के पुत्र थे। माहिल को यह सहन न हुआ। जैन धर्म में दीक्षित माहिल युद्ध से दूर रहता था किन्तु अपनी कूटनीति से वह राजाओं को आपस में लड़वाता रहता था। वह महोबा को किसी बड़े युद्ध में झोंकना चाहता था लेकिन आल्हा ऊदल के रहते ऐसा संभव नहीं था। अपनी तिकड़म से वह परमाल को यह समझाने में सफल हो गया था कि आल्हा ऊदल उसके बेटे बह्मा को मारकर महोबा पर अधिकार करना चाहते हैं।

महोबा से निकाले जाने पर आल्हा ऊदल ने कन्नौज के राजा जयचंद के यहाँ शरण ली। इसी का फायदा उठाकर दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान की सेना ने महोबा को चारों ओर से घेर लिया। इस युद्ध का नेतृत्व पृथ्वीराज का सेनापति चामुण्डराय कर रहा था। चामुण्डराय ने परमाल के सामने शर्त रखी थी कि अपनी बेटी चन्द्रावलि का डोला उसे सौंप दे, नहीं तो मार-काट के लिए तैयार रहे। क्षत्रिय डोला कैसे दे सकते थे? महोबा के वीर तो कन्नौज में थे, युद्ध कौन रोक सकता है? आल्हा-ऊदल के शौर्य एवं पराक्रम की कमी महोबा को खलने लगी थी। हताश-निराश परमाल ने रानी मल्हना से सलाह-मशविरा किया। रानी के कहने पर उन्होंने चामुण्डराय से विचार करने का समय माँग लिया। कुछ समय के लिए युद्ध टल गया था, तब तक मल्हना ने हरकारे को एक कटार तथा बहन चन्द्रावलि ने राखी देकर अपनी रक्षा के लिए उनसे मदद माँगी। मल्हना आल्हा और ऊदल को बेटा मानती थी। गुप्त रास्ते से हरकारा कन्नौज की ओर बढ़ गया।

बहन की राखी से उनका हृदय पिघल गया। आल्हा ने जयचंद की सेना की सहायता से चामुण्डराय पर धावा बोल दिया। चामुण्डराय के पैर उखड़ गए और महोबा लुटने से बच गया। बहन चन्द्रावलि ने भाइयों के आने पर कजली कीरत ताल में विसर्जित कर दी। वह दिन पूर्णिमा के एक दिन बाद का था। तभी से बासी कजली विसर्जित करने की परम्परा चली आ रही है।

प्राननाथ, इस मौके पर भाई का अभाव खटकता है। नत्थू की आशा थी कि वह आएगा, पर वह नहीं आया। वैसे बुआ-बुआ करता रहता है लेकिन त्योहार में उसे मेरा ध्यान न आया। राखी ही बंधवा जाता, तो तसल्ली हो जाती। मैंने भी गुस्सा में उसे राखी न भेजी। रोते-गाते मैंने यहीं सावन मनाया। नत्थू से नाराज हूँ। चिट्ठी लिखकर उसे खूब खरी-खोटी सुनाऊँगी। अगली बार से अपने-आप आने लगेगा।

अब तो आपका ही सहारा है। पति के साथ पत्नी अपने सारे अभावों को भूल जाती है। लेकिन कुछ अभाव ऐसे होते हैं, जो समय आने पर कसक उठते हैं। ये कसक जीवन को और शिद्दत से जीने को प्रेरित करते हैं। तुम आ जाओ सो ये सारी सालन दूर हो जाएगी।

 

आपकी ही

रमकल्लो

 

जीवन परिचय

नाम – लखनलाल पाल
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित।
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 285001
ई-मेल – [email protected]

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9 टिप्पणी

  1. काश, कि अपने मायके की यह ऐतिहासिक
    गाथा रमकल्लो अपने पति की बांहों के तकिए पर सिर रख कर उसे सुना पाती!!
    “लेगइ बैरन सहर पिया को, राम करे कि ऐसी नौकरी छूटे!!”

    • इस रमकल्लो जैसे पात्र के साथ आपकी सहानुभूति इतनी जुड़ गई है कि आप चाहती हैं कि रमकल्लो सुखी रहे। उसका पति उसके साथ हो तो वह खुश रहेगी। आपकी यह टिप्पणी रमकल्लो के प्रति सहृदयता को दिखाती है। सरोजिनी पाण्डेय जी आपका बहुत-बहुत आभार

  2. *तुम आ जाओ*…
    स्त्री संवेदनाओं का अथाह सागर होती है, जिसके अंतःकरण में अनेक लहरें उठतीं-गिरतीं रहतीं हैं। कभी सुख की लहर उठकर दूर तक खिंची चली जाती है, तो कभी उस सुख की लहर को लाँघकर दुःख की लहर उससे भी लंबी हो जाती है। सुख-दु:ख के बीच एक सेतु बँधता है- आशा का सेतु, विश्वास का सेतु जिस पर प्रेम भरे पाँव सरपट दौड़ने लगते हैं। तमाम दुश्वारियों को धता बताते हुए।
    अंतरराष्ट्रीय पत्रिका *पुरवाई* में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार डॉ० लखन लाल पाल की *रमकल्लो की पाती* की श्रंखला की यह चौथी पाती पिछली तीन पातियों से मुझे कुछ अलग लगती है। मुझे इस चौथी पाती में रमकल्लो के भीतर बैठी एक सहज स्त्री के दर्शन होते हैं, जो अपनी मनोव्यथाओं, मनोदशाओं को बड़ी सहजता से व्यक्त करने में सफल हुई प्रतीत होती है।
    जिस देशकाल परिस्थितियों में रमकल्लो अपने परदेसी पति को पातियाँ लिखती है, वह देशकाल आज के आधुनिक युग से एकदम अलग है। जहाँ दूर बैठे व्यक्ति से संवाद करने के लिए केवल चिट्ठी- पाती ही माध्यम हुआ करती थी। फोन, मोबाइल इत्यादि की सुविधाएँ तब न के बराबर थीं। रमकल्लो का पति कामधंधे के लिए शहर में रह रहा है और इधर गांव में उसकी पत्नी रमकल्लो प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और आर्थिक आँधियों से अकेले लड़ती हुई, जूझती हुई, संघर्ष करती हुई, हँसती हुई, बतियाती हुई, उनसे तालमेल बनाती हुई, अपनी अस्मिता और स्वाभिमान को बरकरार रखते हुए जी रही है।
    स्त्री विवाहित हो या अविवाहित जब वह प्रेम में होती है तब उसकी मनोदशा शेष से अलग होती है। यह प्रेम चाहे पति से हो या किसी प्रेमी से हो। प्रेमी को तब इस तरह की मनोदशाओं से गुजरना ही पड़ता है…
    फिर विरह तो एक ऐसी अनकही पीड़ा है, अकथ व्यथाकथा है, उसे कितना ही कहा जाए उसमें कुछ न कुछ अनकहा रह ही जाता है। रमकल्लो बरसात में भींगने के बाद भी भींगी नहीं है, सुखी है। उसकी यह अतृप्ति उसके मन के भीतर भीतर सुलग रही है। मन में अगन लगी हुई है। यह अगन दैहिक मिलन के सुख के लिए कतई नहीं है। यह अगन अपनी अदम्य लालसाओं को अपने प्रियतम के संग समसार करने की अगन है। जिसमें में सात्विक प्रेम की असंख्य अभीप्साएँ विगलित हैं जो आत्मीय संबंधों के बौराए वसंत की सृष्टि करतीं हैं। रमकल्लो की इस प्रेम अगन में पारिवारिक संबंधों की उत्कटता के सौरभ समीरण की सिहरन भी है…
    सावन तो उमड़-घुमड़कर आ गया है लेकिन मायके से कोई उसे रक्षाबंधन पर लिवाने नहीं आया। रमकल्लो बेहद उदास है। उसकी यह उदासी उसे स्मृतियों में अपने मायके ले जाती है। बेटी के लिए मायका किसी स्वर्ग सुख से कम नहीं होता है। रमकल्लो को मायके की वह चौखट, वह देहरी, वह बखरी, वह चौंतरा और वह सभी कुछ यादों में लोबान की तरह महक रहा है, जिसमें उसने अपना निर्दोष बचपन गुजारा, वे संगी-सहेलियाँ हैं जिनके साथ हरियल नीम की गछनारी डाल पर सावन का झूला झूलती थी। अपने सीमित पेंग बढ़ाकर असीम आकाश को छूने की कोशिशें करती थी। चौखटे में खड़ा पीपल का पेड़ और ब्रह्मदेव का थान याद आता होगा, जिस पर कोई पैर नहीं लगाता था, बल्कि श्रद्धा से माथा नबाता था। रमकल्लो के अंतर्मन वह कुआं भी घूमता होगा है जहाँ पनिहारिनों के संग वो भी गगरी भरने जाती थी। पनिहारिनों की चुहल भरे स्वरों के आनंदगंधी गीतों की बोले उसके होठों पर ठठाकर रह गए होंगे।
    रमकल्लो को इस बार मायके कोई लेने नहीं आया तो वह माँ की यादों से चिपट कर भीतर-भीतर रोती है- माँ ! माँ!!
    माँ ! कोई एक शब्द भर नहीं है। माँ तो सृष्टि का महाकाव्य है। माँ संबोधन के एक शब्द मात्र में वात्सल्य का असीम सागर समाहित है।
    … माँ नहीं रहे तो मायका नहीं रहता और पति ना रहे तो ससुराल नहीं रहती…
    रमकल्लो की इस पाती में इस तरह की लोकोक्तियों का भरपूर प्रयोग है। यह लोक ही तो है जो हमें तमाम अंधेरों से दूर रखे रहता है, बुराइयों से बरजता है। इसी लोक के आलोक में ही तो रमकल्लो उजास ढूँढती है और उसी उजास में उसे तमाम सालनों की प्राणपीड़ाओं से मुक्त होने की कारगर औषधि मिल जाती है….
    “….तुम आ जाओ सो ये सारी सालन दूर हो जाएगी….।”

    डॉ० रामशंकर भारती
    6 अप्रैल 2025

    • भारती जी आपने रमकल्लो की विरह वेदना के रेशे रेशे को खोलकर रख दिया है। उसके मन के भीतर क्या-क्या उमड़-घुमड़ रहा होगा उसको आपने निकाल लिया है। रमकल्लो से जुड़ने पर लोग उसके सुख-दुख के भागीदार बन जाते हैं। आपकी भागीदारी इस पाती में दिखाई दे रही है।
      पाती अगर प्रभावित कर रही है जैसा कि आपकी इस प्रतिक्रिया से स्पष्ट हो रहा है तो यह लेखन की सफलता है। रमकल्लो के लिए आप लोगों का यह प्यार देखकर मन खुश हो जाता है। भारती जी बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  3. सर्व प्रथम रचनाकार को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं!
    रामकल्लो की पाती का यह चौथा हिस्सा अपने आप में स्वतंत्र और संपूर्ण है. इसकी वजह है इसमें आल्हा-उदल की कहानी का जुड़ जाना. बुन्देलखण्ड के इन महानायकों को जोड़ने से यह पाती और भी पठनीय बन गई है.
    इस रचना में विरह के दो पक्ष उजागर हुए है भाई और पति का विरह. काव्य शास्त्र प्रेमियों की विरह को प्रधान मानता है किन्तु हमारी दृष्टि से विरह के अनेक पक्ष हैं जैसे ईश्वर का विरह, माता पिता का विरह, मातृभूमि विरह, मित्र विरह आदि.
    सही अर्थों में यह पाती विरह को उद्वेलित और उद्घाटित करती है और याद आती हैं यह पंक्तियां –
    हर याद एक कफ़न है
    रुह के लिबास में दफ़न है
    मत छूना इसे
    हर कोई तो मंसूर की रुह नहीं
    तारीख किसी किसी की लिखी जाती है

    • सर आपकी प्रतिक्रिया में विरह का जो विराट रूप प्रकट हुआ है वह वाकई में मनन करने योग्य है। आपकी दृष्टि के पक्ष को इस प्रतिक्रिया के माध्यम से जाना। इससे सहमत हुआ जा सकता है कि विरह केवल पति और प्रेमी भर के लिए नहीं है, वरन् भाई, माता-पिता, मित्र और मातृभूमि के प्रति उतना ही लगाव होता है। जब हम दूर देश में बस जाते हैं तो मातृभूमि के लिए भी तड़प ऐसे ही होती है।
      रमकल्लो की इस पाती के लिए आपके द्वारा की गई इतनी सटीक और विस्तृत समीक्षा से अभिभूत हूं। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार सर

  4. सर जी!
    अबकी बार की पाती तो बहुत ही मार्मिक लगी।
    सावन का महीना बेटियों के लिए विशेष होता है। आजकल समय और स्थितियों के हिसाब से रक्षाबंधन हो जाया करते हैं। भाई फोन कर देता है और बहनें खुद ही राखी पर आ जाया करती हैं ।मान लो कभी ऐसी स्थिति न बन पाए और बहनों की खबर आए तो फिर भाई लोग चले जाते हैं।
    नहीं जाने -आने की स्थिति में राखी पोस्ट हो जाती है। पर पहले यह नियम था और गाँव में आज भी इस तरह के नियम हैं कि राखी पर भाई लेने आता है, बात मान सम्मान वाली रहती है कि शादी के बाद बिना बुलाए कहीं नहीं जाना है। अगर बहन की जाने की स्थिति न हो तो , लेने न भी आए तो भाई राखी बँधवाने आ जाता है।
    रमकल्लो का दुख महसूस हुआ।
    एक संपूर्ण परिवार के लिए बेटा और बेटी दोनों ही महत्वपूर्ण है। हमारा धर्म हर रिश्ते को अहमियत देता है।
    हम पाँच बहनों के बीच में एक ही भाई था ,सबसे छोटा और पहली बार अपने हाथ से राखी हमने उसे शादी के बाद ही बाँधी थी तब वह 7 साल का था उसके बाद फिर कई साल तक राखी में मायके जाना नहीं हुआ। तो रमकल्लो की पीड़ा हमको पूरी तरह से महसूस हुई।
    पेड़ों पर डले हुए झूलों में झूलने पर जो आनंद आता है उसका कोई मुकाबला नहीं। हवा में उड़ते हुए से महसूस होता है। और झूलते हुए हैं राजस्थान के लोकगीतों का तो अपना ही आनंद है ।
    पिक्चर का एक बहुत पुराना गाना हमें याद है जो बचपन में झूला झूलते हुए गाते थे

    *ठंडी ठंडी हवा खाने राजा गया गाँव में,
    जाते-जाते मुई छुई
    चुभ गई पाँव में
    राजा ने वजीर भेजा रानी दौड़ी आई
    राजा की सवारी को काली घोड़ी लाई।
    आगे आगे बैठा राजा पीछे बैठी रानी।
    रानी ने सुनाई आके
    मुन्ने को कहानी।

    इसके अलावा और भी राजस्थानी लोकगीत थे पर याद नहीं।
    पहले तो घरों की बाड़ में लोग ज्यादातर मेहंदी के पौधे ही लगते थे। और त्योहार पर इसी हरी मेहंदी को तोड़कर और पीसकर हाथ में रचाते थे। पीसने वाले के हाथ तो वैसे ही रच जाते ।
    झूले के लोकगीत ने मन को द्रवित किया। ऐसे ही वैवाहिक उत्सव में जब भाई भात लेकर आता है तो गीत द्रवित करते हैं अगर भाई न हो।
    वैसे यह बात सही है की माँ के रहने से ही मायका रहता है किंतु भाई भाभी अच्छे हो तो मायका बाद में भी बना रहता है।
    इस बार की पाती ने आल्हा ऊदल के ऐतिहासिक सत्य से भी परिचय करवाया। हालांकि राजस्थान में रहते हुए आल्हा उदल को हमने पढ़ा है।
    लेकिन एक लंबा समय हो गया था, पूरी कहानी को पढ़कर सब याद आ गया।
    भाई बनाने का प्रचलन भी बुरा नहीं। कई लोग इस रिश्ते को सगे भाई बहनों से ज्यादा निभा जाते हैं।
    हमारे छोटे दामाद चार भाई हैं और उनकी कोई सगी बहन नहीं थी। अग्रवाल परिवार की एक लड़की ने चारों को भाई बनाया था। हमने देखा कि वे लोग कैसे रिश्ता निभाते हैं क्या कोई सगा भाई- बहन भी ऐसा रिश्ता निभाता होगा। और रिश्ता दोनों ही ओर से निभाया जाता है। लेकिन आज भी दुनिया में अच्छे लोग हैं जो संबंधों का निर्वाह खून के रिश्तों से भी ज्यादा करते हैं-आल्हा ऊदल की कहानी से यह बात लिखने का मन बन गया।
    राखी के दूसरे दिन भुजरिया तो इस क्षेत्र में भी मनाई जाती हैं। हमारे यहाँ भी। राखी से पूर्व पंचमी के दिन से दीवार पर नवमी बनाना शुरू करते हैं और अष्टमी तक पूरी हो जाती है। एक कहावत है “नवमी के नौ मायके, गली-गली ससुराल।”
    ऐसा कहा जाता है कि विष्णु जी के सो जाने के बाद देवीजी मायके आती हैं तो दीवाल पर उनका हर रूप बनाते हैं रस्सी कूदते हुए,चपेटे खेलते हुए, झूला झूलते हुए। मायके में जो-जो लड़कियाँ करती हैं, लगभग वह सब, इसमें भुजरिया भी बनती हैं ऊपर चाँद सूरज भी बनते हैं, साक्षी स्वरूप नौ खंड में नौ देवी का स्वरूप पुतली के रूप में, पहले तो गेरू और पीली मिट्टी से होता था आजकल रंग से बना लेते हैं लाल पीला और हरा। नवमी के दिन उनकी पूजा होती है और भुजालियों के दोनों की पूजा करके उसी दिन भुजलियाँ बोई जाती हैं। उन्हें ढक कर रखते हैं ताकि हवा ना लगे और वो पीली पीली हों।
    राखी की पूर्णिमा को सुबह दोबारा नवमी के सामने उन्हें रखते हैं तब तक काफी बड़ी हो जाती हैं। पूर्णिमा के दिन नवमी में ही ऊपर की ओर श्रवण कुमार की पुतली बनाई जाती है। और श्रवण कुमार की पूजा होती है।
    और भुजालियों को भी राखी बाँधी जाती है। उन्हें देवी का स्वरूप ही मानते हैं।
    फिर राखी के दूसरे दिन दोबारा से उनकी पूजा होती है भुजरियों को एक कपड़े के झूले में या नई साड़ी में झूला झुलाया जाता है। यहाँ नर्मदा जी हैं इसलिए शाम के समय नर्मदा जी में ले जाकर सिरा देते हैं थोड़ी सी भुजलियें खूट लेते हैं (तोड़कर निकाल लेते हैं)
    पहले भगवान को चढ़ाते हैं। कुशल मंगल की कामना से। फिर सभी भुजरिया एक दूसरे को देते हैं। छोटे बच्चों को बड़े लोग पैसे देते हैं और बड़ों के चरण स्पर्श किये जाते हैं बराबरी वाले एक दूसरे को देखकर कई मिलते हैं मेहरबानी बनाएँ रखें टाइप।
    यह भी होली मिलन जैसा ही उत्सव है। सावन से जुड़ा है हालांकि भुजलिया तो भादों के एकम के दिन होती है। जैसे होली फागुन की पूर्णिमा को जलती है लेकिन खेलते हैं चैत्र के एकम के दिन।
    इस बार की पाती बहुत यादगार और मार्मिक भी लगी। सावन और फागुन दोनों ही भाई बहनों से जुड़े त्योहार है हुए होली के दूसरे दिन भाई दूज रहती है! बेटी फागुन में भी मायके जाती है और सावन में भी मायके जाती है। आजकल तो ज्यादातर सावन में ही लड़कियों का आना होता है। भाई दूज पर भाई बहन के घर जाता है टीका लगवाने।
    यह पाती तो सावन के महीने में लगनी चाहिये थी ।आपने चैत के
    महीने में सावन की याद दिला दी
    संपादकीय की तरह अब आपकी पाती का भी इंतजार रहता है।
    आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

    • नीलिमा करैया जी, आप जब समीक्षा लिखती हैं तो आप उस समय का पूरा परिदृश्य साकार कर देती हैं। यद्यपि एक ही तीज त्यौहारों के रिवाज विभिन्न क्षेत्रों में थोड़े से भिन्न होते हैं लेकिन मूल एक ही है। सावन में राखी, कजली, झूला यह त्यौहार का मूल है। जो सब जगह एक सा ही है।
      पाती में रमकल्लो जब सावन की बात करती है तो उसके सावन का रिवाज बुंदेलखंडी है। आपने राजस्थान तथा अन्य जगहों के रिवाजों से भी रूबरू करवा दिया है। यह क्षेत्र की खाली जानकारी भर नहीं है वरन् ज्ञानवर्धक भी है। संपूर्ण भारत की संस्कृति से परिचित होना पुरवाई परिवार में संभव हो जाती है।
      आप रमकल्लो से अपना जुड़ाव महसूस करती हैं यह मेरे लिए बड़ी बात है। बढ़िया समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत आभार

  5. रमकल्लो को सावन में मायके की याद आ रही है सब विवाहिताऐं इस ऋतु में मायके जाना चाहती हैं पुरानी सखियों से मिलना राखी का त्योहार मनाना चाहती हैं पर रमकल्लो मन मसोस कर रह जाती है क्योंकि भाई नहीं है और माँ भी नहीं और मायके तो माँ के साथ ही होता है। मुझे भी सावन में बन्दिनी फ़िल्म का गीत बहुत याद आता है
    ” ‘ अब की बरस भेज भैय्या को बाबुल सावन में लीजो बुलाय।” एक और गीत जिसमें बेटी बादल से कहती है कि तुम मेरे मायके में जाकर बरसना और बाबुल मैय्या से कहना
    कि मुझे ले जाएँ । और तो और रमकल्लो ने राखी की कहानी बता कर इतिहास का एक पन्ना भी पढ़वा दिया।

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