Saturday, September 19, 2026
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स्त्री-जीवन की  विडंबनाओं की कहानियाँ-काली बकसिया

कृति  -काली बकसिया, लेखिका-आभा श्रीवास्तव,  पृष्ठ संख्या  -152, मूल्य – 150/-        प्रकाशक –   हिंद युग्म ब्लू, नोयडा, समीक्षक -डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
‘काली बकसिया’ चर्चित कहानी लेखिका आभा श्रीवास्तव की सोलह ऐसी कहानियों का संग्रह जिनके केंद्र में मध्यवर्गीय परिवार के स्त्री-जीवन की विसंगतियाँ, विडंबनाएँ और वेदनाएँ हैं।  आभा श्रीवास्तव कहानी कला की कुशल शिल्पकार हैं, वे प्रत्येक कहानी के ताने-बाने को को इतने मनोयोग से बुनती हैं कि पाठक  एक बार कहानी शुरू करने के बाद पूरी पढ़े बिना नहीं छोड़ सकता। उनकी प्रत्येक कहानी में एक कथा रस आद्योपांत विद्यमान रहता है जो सहृदय पाठक को एक अलग भावजगत में ले जाता है और कहानी के अंत तक आते-आते पाठक एक संवेदना से भीगता हुआ स्तब्ध रह जाता है। ‘काली बकसिया’ की सम्पूर्ण  कहानियाँ  अतीत -मोह की कहानियाँ  हैं। प्रत्येक कहानी में एक ‘नॉस्टेलजिक अटैचमेंट’ है। इन कहानियों में वर्तमान से अधिक अतीत महत्वपूर्ण है। अतीत वर्तमान को संक्रमित कर रहा है, पात्र वर्तमान से अधिक अतीत की यात्रा करते  है। किस्सागोई और आत्मपरक शैली के साथ चलने वाली हर कहानी ‘फ्लैश बैक’ में लिखी गई है। कहानियों की घटनाएँ  अतीत के पर्दे में हैं। ‘मैं’ या नैरेटर स्त्री पात्र अतीत की सारी घटनाओं की साक्षी है, उसकी भूमिका एक किस्सागो की है। वह घटनाओं की उलझी गुत्थियों को रोचक ढंग से पाठकों के समक्ष खोलती जाती है। पर्दे उठते जाते है, रहस्य खुलते जाते हैं और पाठक एक प्रवाह में कहानी के साथ बहता चलता है। जादुई शिल्प और सहज भाषा पाठकों  को कहानी के अंत तक बाँधे रखने में सक्षम है।
कहानियों को ‘फ्लैश बैक’ में लिखने का कारण यह है  कि कहानियाँ  अतीत से निकल कर आईं हैं। ये एक ऐसे काल-खण्ड की घटनाओं पर आधारित कहानियाँ हैं जब सामाजिक परिवर्तन की गति शिथिल थी, समाज एक बँधे-बँधाए ढर्रे पर चल रहा था। स्त्री अपने अस्तित्व को तलाशते हुए रूढ़ियों से मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर तो थी पर वर्तमान की तरह मुखर और विद्रोही नहीं हुई थी, वह एक घुटन में जीते हुए स्वतंत्र होने के लिए आकुल थी। पुरुष वर्ग बहुत कुछ रूढ़ और सामंती ठसक में जी रहा था, उसे परिवर्तन कम स्वीकार थे। संग्रह की प्रत्येक कहानी में सामंती परम्पराओं के अवशेष ढोते ऐसे ही मध्यवर्गीय परिवार हैं जहाँ कुछ पात्र आदर्शवादी और परम्परागत मूल्यों का सम्मान करने वाले हैं, कुछ स्थितियों से समझौता करने वाले तथा कुछ अपनों से ही छल करने वाले स्वार्थी और प्रपंची पात्र हैं। पुरुष पात्रों के चरित्र बहुत कम उभर कर आए हैं, अधिकांश युवा पात्र उत्तराधिकार में मिली परिवार की सम्पत्ति पर ऐश करने वाले, उसे उड़ा-खा कर लुटाने वाले हैं। लड़कियों पर पारिवारिक अंकुश बहुत हैं, उनके सपने असमय ही ध्वस्त होते हैं। कहीं तो वे गृहस्थी के बंधन में बाँध दी जाती हैं और कहीं अविवाहित रह कर अपने माँ बाप का दायित्व उठाने को विवश होती हैं। मुखर विद्रोह करने का साहस इन नारियों में नहीं है, यहाँ तक कि अधिकांश युवतियों को परिजनों या परिचितों द्वारा किए गए दैहिक व्यभिचार से भी गुजरना पड़ता है पर लोकलाज और प्रतिष्ठा के नाम पर उन्हें मौन रहने की सीख दी जाती है और वे मौन रहती भी हैं। संग्रह की विविध कहानियों में इस प्रकार के स्त्री पात्रों का अवलोकन किया जा सकता है। ‘प्रायश्चित’ की नंदी, ‘काली बकसिया’ की कांति बुआ, ‘छलिया’ की रजनी, ‘मैं तो जोगन री’ की विधवा बहू,  ‘बंदिनी की सुमि’, ‘दिद्दा’ की दिद्दा सब इसी प्रकार की नारियाँ हैं जिनका नजदीकी लोगों द्वारा दैहिक शोषण किया गया पर उन्होंने कोई विद्रोह नहीं किया कोई प्रतिकार का विचार भी उनके अंदर नहीं आया।  ‘प्रायश्चित’ की नंदी की अस्मिता का हरण उसी घर के मुखिया द्वारा किया जाता है जहाँ वह शरणागत है। वह विरोध न करके चुपचाप उसके बच्चे को जन्म दे देती है।  विडंबना यह है कि परिवार की अन्य स्त्रियाँ भी इस घटना पर मौन रहती हैं। ‘काली बकसिया’ की कांति बुआ की शुचिता को उनके प्रेमी और दो दोस्तों द्वारा ही तार-तार किया जाता है। ‘बंदिनी’ की सुमि जिससे प्रेम करके घर से भागने का साहस करती है वहीं उसकी की देह का उपभोग करके त्याग देता है। ‘छलिया’ की रजनी  निखिल के प्रेम में डूब कर गर्भवती होती है और निखिल उसे धोखा दे देता है। ‘मैं तो जोगन री’ की हवेली का स्वामी अपनी विधवा अनुज वधू का दैहिक शोषण वर्षों करता रहता है और इस पाप से उत्पन्न संतानो को जन्मते ही मार कर आँगन में दबा देता है। अंततः एक दिन वह साहस करके इस जाल से बाहर भाग कर सन्यासिनी बन जाती है।  ‘दिद्दा’ की दिद्दा भावावेश में अपने प्रोफेसर के साथ भाग जाती हैं, वह कुछ दिन उनकी देह को भोग कर उन्हें त्याग देता है। वस्तुतः ये उस समय के समाज का कुत्सित यथार्थ है जिस समय के समाज का यथार्थ लेखिका अपनी कहानियों में चित्रित कर रही हैं।
मध्यवर्ग के परिवारों में लड़कियों के वाह्य जीवन को तो अनेक प्रकार के प्रतिबंधों में रखा जाता है किन्तु उनके सपनों पर तो प्रतिबंध नहीं लग सकते। लड़कियाँ सपने देखती हैं, उनके सपनों में मुक्ति का अर्थ प्रेम होता है। वे किसी काल्पनिक नायक के स्वप्न देखती और अपने परिवेश में निकट आने वाले किसी भी युवक में उन्हें ऐसे ही नायक की छवि दिखाई देती है, भावावेश में  वे प्रेम कर बैठती हैं। अधिकांश लड़कियाँ का ये प्रेम लुकाछुपी वाला प्रेम होता है, परिवार और समाज से छुप कर वे प्रेम करती हैं प्रायः उनकी परिणति असफल प्रेम में होती है यदि प्रेम सफल भी होता है तो किन्ही कारणों से वह स्थायी नहीं रह पाता। संकलन की हर कहानी में ऐसे ही प्रेम की एक महीन धारा बहती रहती है। ये प्रेम भी तत्कालीन समाज के परिवेश का चित्र सामने लाती हैं।  ‘वो मेरा बेटा नहीं’ की गायत्री पड़ोस के देव से प्रेम करती है पर देव सिविल सर्विस में आते ही गायत्री के सच्चे प्रेम को ठुकरा देता है। ‘वारिस’ की रचना और दिनेश का प्रेम विवाह हो तो जाता है पर बिना दहेज के आने वाली रचना को ससुराल में अनेक यंत्रणाएँ देते हुए अपमानित करके घर से निकाल दिया जाता है। ‘एक थी सुजाता’ की सुजाता जोशी कमल से प्रेम करती है पर वह अपने ही अंतरद्वंद्व के कारण विवाह न करके आजीवन कमल की प्रतीक्षा करती रहती है। ‘छलिया’ की रजनी निखिल से प्रेम करके गर्भवती हो जाती है पर निखिल धन सम्पत्ति के लोभ में उसे ठुकरा देता है। ‘दिद्दा’ की दिद्दा प्रोफेसर बसंत के प्रेम में ठगी जाती है वहीं ‘बंदिनी’ की अमिता झूठे प्रेम को सच्चा मानकर आवेश में अपने प्रेमी रिसर्च गाइड की पत्नी की हत्या कर देती है और जेल जीवन स्वीकार करती है। ‘मुक्ति’ की नंदिनी सक्सेना का राजन से सफल प्रेम विवाह होता है, आई.ए.एस. पति की व्यस्तता के कारण वह समाज सेवा में लग कर कुष्ठ रोग से संक्रमित हो जाती है अतः पति राजन उसे त्याग देता है। ‘काली बकसिया’ की कांति बुआ का प्रेम पारिवारिक बंदिशों की भेंट चढ़ता है साथ ही प्रेमी द्वारा उनका शोषण होता है हैं। ‘प्रायश्चित’ की नंदी का प्रेम अवश्य सफल होता है जीवन में अनेक यंत्रणाओं के बाद उसे उसका प्रेमी मोहसिन मिल जाता है और ‘प्रायश्चित’ एक सुखान्त प्रेम कथा बन जाती है।
‘गली गली ढूँढा तुझे’ एक अलग ढंग की प्रेम कथा है यह कहानी प्रेम की कोमल भावनाओं पर निर्मम आघात करती है। अधेड़ अवस्था का ज्ञान अत्यंत उत्साह के साथ किशोर जीवन की प्रेयसी सुनयना से मिलने जाता है पर जिस अल्हड़ सुनयना की छवि वह अपने अंदर सहेज कर जाता है उसके विपरीत समय के प्रवाह में थकी हारी अधेड़, स्थूल होती हुई एक स्त्री मिलती है जिसके अंतस में अतीत के प्रेम का लेश मात्र शेष नहीं है। यह पूर्णतः यथार्थवादी कहानी है। समय और दायित्व – बोध के नीचे अनेक स्वप्न दम तोड़ देते हैं। इस कहानी को अन्य दृष्टि से भी देखा जा सकता है जहाँ  नायक ज्ञान के लिए प्रेम एक भावनात्मक तथ्य है पर नायिका  सुनयना के लिए अवस्था का एक उन्माद। ज्ञान भावुक है और सुनयना व्यावहारिक।
यद्यपि आभा श्रीवास्तव ने किसी बड़ी सामाजिक समस्या को केंद्र में नहीं रखा किन्तु कहानियों के केंद्र में स्त्री जीवन की विडंबनाएँ हैं अतः मध्यवर्ग की स्त्री जिन समस्याओं से जूझती है वे स्वाभाविक रूप से आ गईं हैं। बेटी और बेटे में भेद अधिकांश कहानियों में है, बेटों के लिए सारी सुविधाएँ  और बेटियों पर अंकुश और प्रतिबंध है, दहेज के लोभी लोग, पारिवारिक व्यभिचार जैसी समस्याएँ  स्वाभाविक रूप से आ गईं हैं। कुछ स्त्री पात्र निरंकुश भी हैं, उनमें खलत्व भी है। वे परिवार में ही प्रपंच रचती रहती हैं ।सच तो यह है कि सामंतशाही खत्म ही गईं पर उसके अवशेष अभी भी मानसिकता में हैं। इस संग्रह की कहानियों के सारे परिवार उस जर्जर सामंतशाही के अवशेष ढोने को अभिशप्त हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात की ओर इंगित करना अनिवार्य है। भारतीय संस्कृति के ऐसे लोक-विश्वास भी कहानियों में है जिन्हे तर्क की कसौटी पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। पाप-पुण्य,प्रायश्चित, इस लोक से मुक्ति के भाव के साथ ही  एक वैराग्य-बोध और पराभौतिक घटनाएँ अनेक कहानियों को आच्छादित किए है। कुछ कहानियों में मृत्यु के बाद भी पात्र सशरीर उपस्थित हो जाते हैं ‘तर्पण’ की जिया और ‘मुक्ति’ की नंदिनी  इसके उदाहरण हैं। संग्रह में आश्रम, सन्यासी और सन्यास भी पूर्ण श्रद्धा भाव से उपस्थित हैं। प्रायः निराश और हताश पात्र सन्यास मार्ग की ओर अग्रसर हो जाते हैं । ‘मैं तो जोगन री’ की विधवा बहू जोगन बन जाती है ‘दिद्दा’की  दिद्दा ईसाई नन बनती है, ‘वो सन्यासी’ में बड़े भैया संन्यासी बन जाते हैं। पाप -पुण्य और ईश्वरीय या प्राकृतिक न्याय पर पात्रों का अगाध विश्वास है ,अतीत के पाप बोझ के रूप में पात्रों को व्यथित करते रहते हैं और वे प्रायश्चित करना चाहते हैं, ‘काली बकसिया’ के अकील का प्रायश्चित इसी रूप में देखा जा सकता है। वस्तुतः तर्क से सिद्ध न होने वाले ये विश्वास भी जनमानस में गहरी जड़ें जमाए हुए है जिनको आभा श्रीवास्तव ने सहज प्रवाह में चित्रित किया है। समग्रतः ‘काली बकसिया’ की कहानियाँ मध्यवर्ग की उन दबी छुपी घटनाओं  को सामने लाती हैं जो लंबे समय से एक अनिवार्य बुराई के रूप में उन्हे आक्रांत किए  हैं और जिन्हे देख कर भी अनदेखा किया जाता रहा है। निःसंदेह यह संग्रह पाठकों के मन-मस्तिष्क को आंदोलित करते हुए उन्हे चिंतन की नवीन दिशा देगा।
डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
मोबाइल      9557518552
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