Saturday, September 19, 2026
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प्रदीप गुप्ता  की कविता-फ़ॉल सीजन 

फ़ाल सीजन आ चुका है.  पश्चिमी देशों में इसे Autumn, saison d’automne भी कहते हैं एक उत्सव की तरह होता है , वृक्षों पर अचानक हरे पत्ते पीले , लाल , कत्थई , बैंगनी हो जाते हैं , जंगल प्रकृति की जागृत पेंटिंग में बदल जाते हैं , लोग कार उठा कर मीलों मीलों दूर इस अद्भुत नज़ारे को देखने के लिए निकल पड़ते हैं . मेरे हिसाब से यह रंग बिरंगी बदलाव हम मानवों के लिए एक सबक है उम्र के अंतिम पड़ाव में कुछ बेहतर करें , कुछ बेहतर दिखें ताकि लोग आप को याद रखें :

कत्थई, बैंगनी, पीले,
लाल—कितने रंग
एक साथ उतर आए हैं वृक्षों पर;
मानो आकाश ने
अपनी सारी संध्या
धरती के नाम कर दी हो।

देखो मित्र,
पश्चिम की देहरी पर
फिर ठहरा है मौसम फ़ॉल—
ऋतु का वह पत्र
जिसे पढ़ने के लिए
आँखों से अधिक
मन चाहिए।

कल तक
इन्हीं शाखों पर हरियाली थी—
नवांकुरों की हँसी,
पत्तों में दौड़ता हुआ प्रकाश,
और वन ऐसा लगता था
जैसे धरती ने
वसंत की चूनर ओढ़
सूरज को निमंत्रण दिया हो।

पर्वतों ने बादलों से कहा,
नदियों ने घाटियों से,
हवा ने पत्तों से—
जीवन का संगीत
किसी एक स्वर का नाम नहीं।

हर पत्ती
अपने भीतर एक ऋतु लिए थी,
हर शाख
एक हरा हुआ भविष्य।

हम भी तब
हरे  ही तो थे, मित्र—
आँखों में सपने,
हथेलियों में उजास,
और मन को भ्रम था
कि जो सुंदर है
वह सदा रहेगा।

पर समय
किसी वृक्ष की छाया में
कभी नहीं बैठता।

जुलाई गुज़रा,
अगस्त ने धीरे से
अपनी पगड़ी उतारी,
और सितंबर की हवा ने
शाखों के कान में
एक पुराना रहस्य कह दिया—

“जो जन्मा है,
उसे बदलना होगा।”

बस फिर क्या था—
हर पत्ता
धीरे-धीरे अपना हरा नाम भूलने लगा।

किसी ने कत्थई ओढ़ा,
किसी ने पीला,
किसी ने रक्तिम लाल,
किसी ने बैंगनी संध्या-सा
अपने भीतर का आकाश पहन लिया।

मैं देर तक देखता रहा—
यह कैसा उत्सव है
जिसमें फूल नहीं,
विदाइयाँ खिलती हैं?

कैसा संगीत है
जिसमें स्वर नहीं,
पत्तों का झरना सुनाई देता है?

और तभी लगा—
पतझड़ पेड़ों पर नहीं आता,
वह पहले मन में उतरता है।

वह सिखाता है
कि सुंदरता का अर्थ
उसे रोक लेना नहीं;
कभी-कभी
उसे जाते हुए
पूरा देख पाना भी
प्रेम है।

पत्ता शाख से छूटा—
वृक्ष ने हाथ नहीं बढ़ाया।

न कोई प्रश्न,
न कोई शिकायत,
न बीते हरे दिनों का शोक।

बस हवा चली,
पत्ता काँपा,
और धरती ने
उसे अपनी बाँहों में ले लिया।

कितना सरल है वृक्ष होना—
देना,
फिर छोड़ देना;
छाँव बनना,
फिर स्वयं धूप में खड़ा रहना;
और जब ऋतु कहे—
“अब विदा”—
तो मौन में भी
जीवन पर विश्वास रखना।

हम मनुष्य
कितना कठिन बनाते हैं
इस सरल सत्य को।

हम टूटे हुए संबंधों को
स्मृतियों में बाँधते हैं,
बीते मौसमों को
आज की खिड़की पर टाँगते हैं,
सूखे फूलों से पूछते हैं—
“तुम फिर क्यों नहीं खिले?”

और वृक्ष
हमारी ओर देखता है—
निःशब्द।

जैसे कहता हो—

“मैंने भी बहुत कुछ खोया है,
पर खोकर ही
अगली हरियाली के लिए
स्थान बनाया है।”

शाखें जब खाली होती हैं,
तभी तो हवा
उनके बीच से गुजर पाती है।

रिक्तता
सिर्फ़ अभाव नहीं होती, मित्र—
वह कभी-कभी
आने वाले जीवन की
पहली जगह होती है।

धरती पर गिरा पत्ता
मृत नहीं होता;
वह मिट्टी की भाषा सीखता है।

जो कल
वृक्ष का वस्त्र था,
वही कल
उसकी जड़ों का अन्न बनेगा।

प्रकृति में
कोई विदाई अंतिम नहीं—
एक रूप का अंत
दूसरे रूप की शुरुआत है।

इसीलिए
जब सर्दी आएगी
और वृक्ष
नंग धड़ंग खड़ा होगा,
लोग कहेंगे—
“देखो, सब चला गया।”

पर वृक्ष जानता होगा—
उसकी सबसे बड़ी कथा
अब शाखों पर नहीं,
जड़ों में लिखी जा रही है।

बर्फ़ के नीचे
एक अदृश्य वसंत
धीरे-धीरे
अपनी आँखें खोल रहा होगा।

मित्र,
शायद मनुष्य का जीवन भी
कुछ ऐसा ही है।

हमारी कुछ ऋतुएँ
हमसे बिना पूछे चली जाती हैं—
कुछ लोग,
कुछ सपने,
कुछ उम्र,
कुछ घर,
कुछ आवाज़ें।

हम उन्हें
“खोना” कहते हैं।

प्रकृति उन्हें
“बदलना” कहती है।

और शायद
यही दोनों शब्दों के बीच
जीवन का सबसे गहरा अंतर है।

तो यदि कभी
तुम्हारे भीतर की हरियाली
अचानक कम हो जाए,
और तुम्हें लगे—
अब कोई ऋतु शेष नहीं,
अब कोई पत्ता नहीं फूटेगा,
अब कोई रंग लौटकर नहीं आएगा—

तब वृक्षों को याद करना।

वे जानते हैं—
हर सूनी शाख के भीतर
एक अदृश्य वसंत
अपनी बारी की प्रतीक्षा करता है।

प्रदीप गुप्ता
प्रदीप गुप्ता
Freelance Media Journalists' Combine के प्रमुख हैं. संपर्क - [email protected]
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