बाथरूम में दाखिल होते वह चिहुंक गया- एक कोने पर एक छोटा सा- अनजान- कीड़ा बहुत धीरे-धीरे रेंग रहा था। यह केंचुए का छोटा रूप तो नहीं है? या फिर किसी सांप का? सांप का ख़याल आते ही एक सनसनाहट उसकी पीठ में दौड़ गई। चाहे जितना भी छोटा हो, सांप ख़तरनाक ही होता है। उसे याद आया, बचपन में एक बहुत ही छोटा चमकता हुआ तेलिया सांप हुआ करता था जिसे घर में लोग फौरन मार देते थे। मारने का तरीक़ा भी अजीब था। उस पर नमक डाल दिया जाता था। वह छटपटाता हुआ छोटा सा जीव अंततः शांत हो जाता था। फिर उसे अख़बार में लपेट कर जला दिया जाता था। यह मान्यता थी कि उसकी मरी हुई देह भी बची रही तो उसकी आंख देखकर दूसरा सांप चला आ सकता है।
क्या वह बहुत नन्हा सा सांप छटपटाता होगा? क्या वह समझ भी पाता होगा कि उसके साथ क्या हो रहा है? क्या नमक की वजह से उसे बहुत तकलीफ होती होगी? क्या उसको किसी और तरीक़े से मारना ठीक नहीं होता? हां, ऐसा भी होता था। कुछ लोग पैरों से भी कुचल देते थे। कुछ झाड़ू या किसी भी दूसरे ऐसे सामान से पीट कर उसे मार डालते। लेकिन उसे मारना क्यों था? क्या उसका यह कसूर था कि वह सांप था? और सांप के बारे में इंसान की धारणा इतने डर से भरी हुई थी कि इंसान ख़ुद अपने मुहावरे में सांप बन जाता था?
सच है कि बचपन में इन सवालों ने उसे नहीं घेरा। अब वह बड़ा हो गया है। वह इस धारणा से उबर चुका है कि सांप की आंख देख दूसरा सांप आ सकता है। पुरानी वाहियात मान्यताएं अब भी उसे कभी-कभी डराती हैं, लेकिन अमूमन वह मानता है कि वह अंधविश्वासी नहीं है। वैसे भी वह जिस चमचमाते फ़्लैट में रहता है, वहां ऐसी मान्यताओं के लिए कमरा नहीं है। वह उन पुराने घरों को लगभग भूल चुका था जहां कीड़े-मकोड़ों की एक दुनिया आबाद रहती थी जो रसोई घर से लेकर बाथरूम तक कोनों और दीवारों में अपना साम्राज्य जमाए रहती थी। वे बड़े खुले बरामदों और आंगनों वाले खपरैल घर हुआ करते थे जहां जैसे हर हिस्सा कीड़े-मकोड़ों, कबूतरों, कौवों, गौरैया आदि के लिए खुला रहता था। मक्खी, मच्छर, छिपकली, मकड़े कमरे में होते तो बाहर पतिंगे, ततैया, तितलियां- सब होते। चूहे दिखते तो सब चौकन्ना हो जाते और कभी-कभी कोई बिल्ली उसे दौड़ाती तो सब मानते कि अब चूहे की शामत आई। कुत्ते गली के बाहर भूंक रहे होते। घर में कभी-कभी सांप भी चले आते थे जिनको लेकर सबसे ज़्यादा शोर मचता और किसी भी सूरत में सांप को मार कर निकाला जाता।
लेकिन उसके इस फ़्लैट के बाथरूम में यह कीड़ा कहां से चला आया? यह एक काला-चमकता कीड़ा बहुत छोटे धागे जैसा था जो टाइल्स के गैप में आसानी से छुप जा सकता था। वह इसलिए दिखा कि कीड़े ने अपना सिर उठाया था और यह ‘फन’ उसे नज़र आ गया था। फिर उसने ध्यान से देखा तो इस धागे में हरकत भी दिख रही थी। तो एक ज़िंदा कीड़ा उसके बाथरूम में घूम रहा है।
तो वह क्या करे? यह कीड़ा उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन उसकी मौजूदगी भर से उसे अपनी रीढ़ पर एक कीड़ा रेंगता हुआ लग रहा था। कीड़ा बहुत धीरे-धीरे सरक रहा था। यह साफ़ था कि वह न उड़ सकता है और न सरसराता हुआ तेज़ भाग सकता है। यानी इससे डरने की कोई वजह नहीं है। लेकिन बहुत सारे डर बेवजह होते हैं, जैसे बहुत सारे पूर्वग्रह बेवजह होते हैं। लोग उसकी वजह तलाशते हैं। तो वह भी इस कीड़े से नफरत करने की, उसे मार डालने की वजह तलाश रहा था। क्या पता, जिसे वह कीड़ा समझ रहा है, वह एक ख़तरनाक सांप का बच्चा हो जो जब बड़ा होगा तो बिल्कुल डरावना हो उठेगा? क्या पता, इस बाथरूम में बेसिन आदि के पीछे छुपे कुछ और कीड़े हों जिनकी संख्या बढ़ी तो उसका साफ-सुथरा बाथरूम गंदा नज़र आने लगेगा? क्या पता कि यह किसी दूसरी प्रजाति का कीड़ा हो जो ज़हरीला भी हो सकता है और धीरे-धीरे ही रेंगता हुआ उसके पांव के नीचे आकर उसे काट भी सकता है?
तो इस कीड़े को मारना होगा। लेकिन कैसे? क्या वह इसे अपने पैर से कुचल दे? अगर कीड़े से खून निकल कर उसके पांव में लग गया तो? इस विचार से ही उसे कुछ मितली सी आने लगी। हालांकि यह खयाल आया कि बहुत सारे कीड़े कुचल दिए जाने से ऐसे ही मर जाते हैं, उनका ख़ून बाहर नहीं आता। लेकिन मच्छर का तो आता है। हालांकि मच्छर को मारने पर उसका ख़ून हाथ में लग जाए तब भी बहुत बुरा नहीं लगता। शायद इसलिए कि वह इंसान का ख़ून होता है। बल्कि मच्छर मार कर एक संतोष सा होता है कि अपने एक दुश्मन को ख़त्म कर दिया- पता नहीं, वह कैसी-कैसी बीमारियां लेकर घूम रहा हो। आख़िर बहुत सारी बीमारियां मच्छरों से ही तो होती हैं। उसे याद आया, मच्छर के अलावा खटमल भी उसने खूब मारे हैं। बचपन में जिस बिस्तर पर वह सोता था, वहां खटमलों की बहुतायत थी- रात को जाग कर वह खटाखट उन्हें मारता था। पहली बार जब ये खटमल दिखे तो वह कुछ मायूस और कुछ नाराज़ हुआ। उसने मां से शिकायत की तो मां ने बिस्तर उलट कर चौकी पर न जाने कौन सा तेल डाल दिया- बताते हुए कि अब खटमल मर जाएंगे। लेकिन खटमल बचे रहे थे। फिर धीरे-धीरे वह उन्हें मारने लगा था। फिर यह उसका प्रिय खेल हो गया था। सोते समय खटमल उसे नहीं मिलते, लेकिन आधी रात के बाद अचानक उसकी नींद पीठ और गर्दन पर हल्की चुभन के बीच टूटती तो वह उठता और देखता कि कई खटमल इधर से उधर दौड़ रहे हैं। वह झट-झट एक-एक को मारता। वह खुश होने लगा था, गिनने भी लगा था। एक दिन उसने 18 खटमल मारे थे। अगली सुबह मां को बताया तो वह परेशान हुई- फिर चौकी का कुछ इंतज़ाम किया गया और खटमल ख़त्म हो गए। 18 खटमल मारने का उसका रिकॉर्ड टूट नहीं सका।
लेकिन मच्छर और खटमल तो इंसान के पुराने परिचित दुश्मन हैं। उन्हें पहले से मारा जाता रहा है। इस कीड़े का क्या किया जाए? गनीमत बस इतनी थी कि रेंगता हुआ कीड़ा उससे दूर एक दीवार से लगा हुआ चल रहा था। लेकिन असली मुश्किल इसके आगे की थी। अगर यह कीड़ा बेसिन के पीछे छुप जाए या दीवार पर चढ़ता हुआ कहीं और गुम हो जाए तो वह क्या करेगा? कीड़ा बड़ा होता रहेगा और ऐसा न हो कि एक दिन वह उसे काटने लायक हो जाए।
तो इसे मारना तो है ही। लेकिन कैसे? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा था कि वह मूलतः खुद को अहिंसक मानता था- गांधीवादी। किसी को मारना उसके उसूलों के ख़िलाफ़ था। हालांकि उसने मार्क्स को भी पढ़ रखा था और वर्ग संघर्ष की ज़रूरत समझता था, लेकिन चाहता था कि ऐसा जो भी संघर्ष हो, वह हिंसक न हो, हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता हुआ हो। वैसे एक कीड़े को मारने के क्रम में उसे गांधी और मार्क्स याद आने लगे- यह बात भी उसे कुछ हास्यास्पद प्रतीत हुई। उसने खुद को कोसा।
फिर उसने खुद को टटोलना शुरू किया। उसे किस चीज़ से मुश्किल हो रही है? कीड़े के अस्तित्व से, उसको मारने के खयाल से, या मारने के तरीक़े से? अचानक उसे खयाल आया कि कीड़ों को कीड़े भी खा जाते हैं। छिपकलियां एक झपट्टे में छोटे-छोटे कीड़ों को लील लेती हैं। मकड़ियां भी उन्हें जाल में फंसा कर बांध लेती हैं। कई बार तो चींटियां अपने से बड़े कीड़ों पर इस फुर्ती से हमला करती हैं कि वह बच नहीं पाता। बस लाली-काल चींटियां दिखती हैं और उनके तितर-बितर होने पर किसी हल्के दाग सा बचा हुआ कोई ढांचा।
तो क्या वह प्रतीक्षा करे कि कोई कीड़ा इस कीड़े को खा जाए? लेकिन जितनी परेशानी उसे इस कीड़े की मौजूदगी से हो रही थी उससे ज़्यादा इस खयाल से कि कोई छिपकली भी यहां छुपी हो सकती है। सांप के बाद छिपकलियां ही उसे सबसे ज़्यादा डराती रही हैं। हालांकि यह भी अजीब था। सांप तो कभी-कभार दिखते थे, छिपकलियां तो हर तरफ़ होती थीं। दीवारों पर दौड़ लगाती हुई, छतों के आरपार जाती हुई। कई बार दरवाज़ों के पीछे वे छुपी रहतीं- परदा हटाने पर गिर पड़तीं। शरीर के किसी भी हिस्से से उनके स्पर्श को मां अशुभ मानती थी। उसे याद है- दो बार छिपकलियां गिरीं तो उसे नहाना पड़ा। सब कहते हैं, छिपकलियों में ऐसा ज़हर है जो छू लेने भर से असर करता है। हालांकि उसे याद नहीं है कि कभी छिपकलियों ने किसी को काटा हो। उसे भूओं का खयाल आया। ये काले बहुत छोटे से जीव बरसात के दिनों में खपरैल मकानों के छप्परों पर जाने कहां से आ जाते और शरीर पर गिर पड़ते। उनके गिरने भर से इतनी जलन और चुभन होती थी कि लोग चीख पड़ते थे- लगभग ततैया की ही तरह। इन दोनों को भी उसने खूब मारा है।
जब वह इतने सारे कीड़े-मकोड़े मार चुका है तो इस छोटे से कीड़े में क्या परेशानी है? हिंसा से उसे ऐसा भी परहेज नहीं रहा है। उसे यह भी खयाल आया कि हिंसा असल में विचार का नहीं, अभ्यास का मामला है। जिसे हम मारने का अभ्यास कर लेते हैं, उसे मारते हिचक नहीं होती, जिसे मारा नहीं होता है, पहली बार उसका ख़ून डराता है। एक बार तो उसने चूहा भी मारा है- हालांकि वह गलती से मर गया था। छोटा सा चूहा था और उसके बहुत तेज़ी से फेंकी हुई चप्पल के निशाने पर इस तरह आया कि उसकी जान चली गई। लेकिन तब भी घर के भीतर उसने गर्व महसूस किया- एक ही निशाने में चूहा साफ़। उसने अपनी आंखों के सामने मुर्गे कटते देखे हैं- बल्कि यह बहुत ही आम दृश्य है जिससे कभी-कभी वह विचलित होता था, लेकिन अब तो उसे पूरा अभ्यास हो गया है। वह जब चिकेन वाले की दुकान पर जाता है तो चिकेन वाला बड़ी आसानी से एक बड़े से पिंजरे में फड़फड़ाते पचासों मुर्गों के बीच एक चीखते हुए मुर्गे को खींच लाता है, उसकी गर्दन मरोड़ता है और फिर उसे एक गंदे से ड्राम में डाल देता है। अगले दो-तीन मिनट तक ड्राम के भीतर से उसकी फड़फड़ाहट सुनाई पड़ती है और फिर वह शांत पड़ जाता है। उसे निकाला जाता है, साफ़ किया जाता है, उसके पेट से अंतड़ियां निकाल कर बाहर फेंकी जाती हैं, और फिर टुकड़े-टुकड़े कर उसे पैक कर उसके हाथ में थमा दिया जाता है। इन सबके बीच वह ज़रा भी विचलित नहीं होता। इसी तरह उसने बकरे भी कटते देखे हैं। चमड़ी छिले और उल्टे लटके बकरे तो आम दृश्य हैं जिनके बीच वह बताता रहता है कि उसे कौन सी ‘पीस’ चाहिए- कितना गोश्त, कितनी हड्डी, कितनी कलेजी।
कीड़ा अब अपनी दिशा बदल रहा था। वह दीवार पर चढ़ने की कई कोशिशों के बाद अब फर्श पर रेंग रहा था। बुरा यह था कि वह उसकी ओर आ रहा था। क्या उसे पता होगा कि वह अपनी मौत की ओर बढ़ रहा है? कितनी होती होगी ऐसे कीड़ों की ज़िंदगी? उसने किसी ज़माने में पढ़ी बायोलॉजी की किताबों में कोई ऐसा चैप्टर याद करने की कोशिश की जिसमें बताया गया हो कि किन जीवों की कितनी उम्र होती है। लेकिन उसे याद नहीं आया। यह ध्यान ज़रूर आया कि कछुए डेढ़ सौ साल से ऊपर जीते हैं और कुत्ते 20 साल तक। शायद इन कीड़ों की उम्र कुछ दिन या कुछ महीने होती हो। लेकिन कई कीड़े हो सकता है, बरसों जीते हों।
बहरहाल, यह कीड़ा तो बस कुछ ही घंटों- नहीं, कुछ ही मिनटों- का मेहमान है। उसने उसके साफ़-सुथरे बाथरूम में दाख़िल होने की जुर्रत की है। उसे परेशान किया है। उसका मानसिक तनाव बढ़ाया है। तो इसे मरना होगा। लेकिन फिर वही सवाल आया कि कैसे? वह इतने पास था कि वह उसे पैरों से कुचल सकता था। लेकिन उसे कुचलने से जो लिजलिजापन उसे महसूस करना पड़ता, उससे वह बचना चाहता था। वैसे बाथरूम में ऐसी कई चीज़ें थीं जिन्हें वह हथियार की तरह इस्तेमालकर सकता है। एक झाड़ू भी पड़ी हुई है, एक वाइपर भी है। उसने सावधानी से झाड़ू उठाई। कीड़ा अब दूसरी ओर देख रहा है। यह भी उसे एक राहत सी लगी। जो आपकी ओर देख न रहा हो, शायद उसे मारना आसान होता होगा। लेकिन यह कीड़ा उसे देखत भी होगा? यह तो तय है कि उसकी आंखें हैं, लेकिन उसकी दृष्टि सीमा क्या है? क्या वह उसे देख पा रहा होगा? एक सेंटीमीटर भर के कीड़े को उसकी तरह का छहफूटा आदमी कितना बड़ा लगता होगा? वह इस कीड़े से कम से कम पचास गुना बड़ा है। उसने कल्पना की कि अगर उससे 50 गुना बड़ा कोई जीव- कोई पहाड़ जैसा दानव उसके सामने आ जाए तो उसका क्या हाल होगा? वह शायद डर के ही मर जाएगा- बेहोश तो हो ही जाएगा, या कम से कम चीखता-चिल्लाता हुआ भागेगा।
उसे यह भी खयाल आया कि इस पूरी धरती में वह भी एक कीड़े जैसा ही है- बल्कि ज़्यादा गहराई से सोचे तो कीड़े के कीड़े के कीड़े बराबर भी नहीं। धूल भर भी नहीं। उन अणुओं-परमाणुओं से भी छोटा जो नंगी आंख से नज़र नहीं आते। आख़िर यह धरती ही कितनी बड़ी है। वह एक सौरमंडल का हिस्सा है, सौरमंडल एक आकाशगंगा का हिस्सा है, सैकड़ों आकाशगंगाएं हैं। और वैज्ञानिक बताते हैं कि यह ब्रह्मांड तो फैलता ही जा रहा है। इस ब्रह्मांड में धरती तो एक बहुत छोटे से कंचे बराबर भी नहीं है। कुदरत ने एक बड़ा झटका दिया कि वह लुढ़कती हुई किसी अनंत में खो जाएगी। बल्कि धरती भी किसी कीड़े की तरह अपने अंत की तरफ़ बढ़ रही है। बस यह तय होना है कि उसे अनंत के समंदर में फेंक दिया जाए या किसी बहुत बड़े तारे से जला दिया जाए या फिर अपनी ही आग या अपने ही पानी में जल या गल जाने दिया जाए।
इस लिहाज से क्या वह भी एक कीड़ा ही है? और उसके बाथरूम में जो लड़ाई चल रही है, वह दो कीड़ों के बीच की है? लेकिन यह कीड़ा तो ऐसा कुछ नहीं सोच रहा। वह घबराया हुआ भी नहीं दीख रहा। शायद इतना सोचने लायक दिमाग उसके पास नहीं है। आख़िर यह दिमाग है जो इंसानों को कीड़ों से अलग करता है। यही वजह है कि इस कीड़े को उससे डर नहीं लग रहा। उसे हिंसा की अवधारणा का कुछ एहसास ही नहीं होगा। उल्टे कीड़ा धीरे-धीरे उसी की ओर चला आ रहा था। उसने कुछ गुमान से सोचा कि अभी वह उसका ईश्वर है- ऐसा ईश्वर जो उसे जीवन भी दे सकता है और मौत भी। ईश्वर ने अब झाड़ू उठा ली थी। उसने ज़ोर से फर्श पर उसे दे मारा। लेकिन यह क्या? कीड़ा कुछ कसमसाया और फिर पलट कर चलने लगा। ईश्वर की झाड़ू निशाने पर नहीं लगी थी। या फिर उसकी सींकें इतनी मुलायम थीं कि उनसे कीड़ा मरा नहीं। क्या वह अब वाइपर का इस्तेमाल करे? यह तो सख़्त है। इससे कीड़े के दो टुक़डे हो जाएंगे। लेकिन फिर वह इस कीड़े की ‘लाश’ कैसे ठिकाने लगाएगा? उसे खयाल आया, वह इसे पानी से बहा कर नाली के रास्ते निकाल सकता है।
यहीं से नया खयाल कौंधा। कीड़े को इस तरह मारने की ज़रूरत क्या है? वह सीधे-सीधे इस चलते हुए कीड़े पर ज़ोरदार पानी की धार डाले, वह बहता हुआ जीता या मरता किसी ऐसी नाली में चला जाएगा जिससे फिर बाहर आना संभव नहीं होगा। तो उसने नल से लगी पाइप उठाई। पहले कीड़े के आसपास पानी की ज़ोरदार धार मारी। वह सीधे कीड़े पर पानी डालने से बच रहा था। संभव है, इससे कीड़ा दो टुकड़ों में बंट जाए- ऐसा वीभत्स दृश्य उससे देखा नहीं जाएगा। तो वह पानी की धार से कीड़े को बहाने की कोशिश में लगा रहा। कीड़े ने एकाध बार भागने की कोशिश की, लेकिन वह फिर असहाय सा धारा में बहने लगा। शायद वह बेहोश हो गया हो। अब वह उसे बिल्कुल नाली के मुहाने तक ले आया था। नाली में लगी जाली में कीड़ा फंस गया था। उसने सावधानी से फिर पानी की धार मारी- कीड़ा नीचे चला गया। अब वह अदृश्य था। इसके बाद भी वह एक मिनट पानी की धार मारता रहा। आखिरकार वह आश्वस्त हो गया कि कीड़ा या तो बचा नहीं होगा, या फिर सीवर में इतनी दूर जा चुका होगा कि उसके लौटने के आसार नहीं बचे होंगे।
लेकिन भीतर से उसे पता था कि उसने कीड़े को मार डाला है। इससे उसे एक तृप्ति सी हो रही थी। किसी संकट से ख़ुद को निकाल लेने के गुमान जैसा कुछ महसूस हो रहा था। एक जीत का सा एहसास हो रहा था। वह कुछ थक गया था। उसने बाथरूम में लगे आईने में अपनी शक्ल देखी। उस पार उसे एक मुस्कुराता हुआ बेडौल कीड़ा ही नज़र आ रहा था।
