घर आँगन
बचपन से किताबों में डूबी रही,
कि मेरी अपनी किताब ही कहीं खो गई।
लिख-लिखकर मिटाती रही,
जाने किससे मैं अपनी प्रतिभा छुपाती रही।
छोड़ दिया जिस चौखट को लड़कपन में,
बहुत कुछ रह गया मेरा माँ के उस आँगन में।
आज भी जब कलम मिल जाती है,
तो चेहरे पर कलियाँ खिल जाती हैं।
कलम की ताकत अब बहुत भारी है,
पर उस पर पकड़ पाने की मेरी कोशिश जारी है।
लौट जाना चाहती हूँ उस आँगन में,
जहाँ खुशबू है मेरी माँ की,
जहाँ खिलखिलाहट है मेरे परिवार की,
जहाँ माँ के सीने पर सिर रखकर
मैं सोई थी जाने कितनी ही रातें। मैं वहाँ रोई थी।
दिल आज फिर टूट जाता है,
जब कुछ अपना पीछे छूट जाता है।
लौट तो जाऊँ अब फिर उस आँगन में,
पर वहाँ अब वो जादू नहीं।
अब उसके किसी कोने में
मेरी माँ की खुशबू नहीं।
ख़याल तो कई आते रहे, जाते रहे,
जाने कितने ही मेरे सीने में समाते रहे।
अब बैठकर सोचती हूँ,
कब तक थामे रहूँगी उन पुरानी यादों को,
उन प्यारे सपनों और जज़्बातों को?
अब उनकी खूबसूरती के साथ
मुझे आगे बढ़ना है।
मुझे अपने बच्चों के लिए भी
तो अब नया आँगन खड़ा करना है।
सच बात तो ये है—
अब भी ऐसा क्या पिछड़ गया?
ऐसा भी कुछ क्या बिगड़ गया?
अब भी कौन सा शब्दों का अकाल है ।
जिस आँगन में अब खड़ी हूँ,
वो भी तो मेरा अपना घर,
मेरा ससुराल है।
एक बार फिर डूबना चाहती हूँ उन किताबों में,
उस बचपन से इस छप्पन में।
उस माँ के आँगन से चलकर,
अब अपने बनाए इस घर-आँगन में
अपनी उस पुरानी प्रतिभा से नई पहचान बनाना चाहती हूँ
एक बार फिर आँगन में बैठकर
किताबों में डूब जाना चाहती हूँ !
- निधि गुप्ता
लंदन
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