Wednesday, February 11, 2026
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डॉ कमल किशोर गोयनका अब स्मृति में रहेंगे… – डॉ लालित्य ललित

डॉ कमल किशोर गोयनका अब स्मृति में रहेंगे…

 

  • डॉ लालित्य ललित

मेरे शिक्षक डॉ कमल किशोर गोयनका जी नहीं रहे। एम ए की क्लास में पढ़ाया करते थे, कहते थे कि मेरा नाम कमल किशोर गोयनका है और तुम्हारा ललित किशोर मंडोरा। लेखन के क्षेत्र में भी यही रखो, मैंने कहा कि सर लालित्य ललित लेखकीय नाम है सुनकर मुस्करा दिए थे।

मेरी पुस्तकों पर यदा कदा लिखा भी करते,जब मेरा पहला व्यंग्य संग्रह आया “जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग” उन्होंने लिखा था उसको हूबहू यहां दे रहा हूं।

रवीन्द्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान जब मुझे दिया गया था तो भावुक हो गए थे, यह कहते हुए कि हिंदी भवन की सारी कुर्सियां भारी अंधड़ और बारिश के बीच भरी है यह सब तुम्हारे प्रेम के कारण उपस्थित है और तुम्हारे जनसंपर्क का कमाल है; मैंने कहा था कि सब आपके आशीर्वाद का फल है।

हिंदी के सुपरिचित विद्वान और केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा के उपाध्यक्ष डॉ कमल किशोर गोयनका का पत्र कल की डाक से मिला –

प्रिय लालित्य ललित,

प्रेम जनमेजय के निवास पर प्रवासी लेखिका सुधा ओम ढींगरा के सम्मान में आयोजित गोष्ठी में तुमने मुझे अपनी नई पुस्तक”जिन्दगी तेरे नाम डार्लिंग”दी। मुझे प्रसन्नता हैं कि तुम बराबर सक्रिय हो तथा साहित्य के मंच पर अपनी उपस्थिति बनाए हुए हो। यह एक युवा रचनाकार के लिए अपनी पहचान बनाने तथा निरंतर सर्जनात्मक भूमिका में रहने का स्वस्थ प्रयास है।

मुझे इसका शीर्षक बहुत पसंद आया-अपनी जिन्दगी अपने सबसे प्रिय व्यक्ति के नाम-जिन्दगी दूसरे को अर्पित करना सबसे कठिन साधना है,लेकिन यही मानव-यात्रा का सर्वोतम लक्ष्य है।

मैंने कुछ लेख पढ लिए हैं और प्रिय प्रेम जनमेजय की भूमिका तथा तुम्हारा आत्म-कथ्य ‘मेरी व्यंग्य यात्रा’ दोनों ही आधोपांत पड़े हैं। प्रेम जनमेजय ने तुम्हारे व्यंग्यों को व्यंग्य-यात्रा तथा व्यंग्य सर्जनात्मकता को पहचाना है और उसकी कुछ मूल प्रवृतियों का उदघाटन किया है। मैं तो प्रेम जनमेजय को व्यंग्य-साहित्य का ऋषि मानता हूँ-जो स्वयं सृजन करता है और व्यंग्य को दिशा भी देता है। तुम्हारी टिप्पणी एक प्रकार से आत्म-कथ्य है और वह तुम्हारी रचनात्मकता को समझने के लिए जरुरी है।

 तुम्हारे व्यंग्य बहुत अच्छे हैं-विसंगतियों की पकड़ और उनकी अभिव्यक्ति दोनों में ही तुम्हारी कुशलता प्रकट होती है। तुम्हारे में व्यंग्यकार बनने का गुण है, उन्हें और शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है।

 मुझे इसके व्यंग्य पढ कर सुख मिला है और मैं नई पीड़ी के प्रति आश्वस्त हूँ कि उनकी  लेखनी ने अपने दायित्व को पहचाना हैं और वह समाज के दुःख दर्द को जी रही हैं।

मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।

शुभकामनाओं के साथ

शुभेच्छु

कमल किशोर गोयनका

पत्र पा कर बेहद खुशी हुई; अक्सर वे मुझे लिखा करते थे,जब कोई कविता संग्रह पढ़ते या कोई व्यंग्य संग्रह पढ़ते तो शाबाशी दिए बिना रहते नहीं थे।

एक बार जब एम ए में क्लास में कोई जिज्ञासा हुई तो उन्होंने कुछ पूछ लिया तो मैंने हाथ खड़ा कर दिया मेरी ओर देख कर बोले कि नहीं तुम नहीं बताओगे, बाकियों को बताने दो।

केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष हुए तब भी अपने को सबके बीच में सरल होने का भाव महसूस कराया,उनकी याददाश्त बड़ी गजब की थी, एक बार उनके घर भी मिलने का अनुभव हुआ और एक बार मॉरीशस में,जब चौथे विश्व हिंदी सम्मेलन में मैं सबसे कम आयु का प्रतिनिधि वहां मौजूद था,उस यात्रा में प्रो विजयेंद्र स्नातक,सस्ता साहित्य मंडल वाले यशपाल जैन भी साथ में थे।कई किस्से है,सोचता हूं क्या याद करूं और किसे भूलूं,कुछ भी ऐसा नहीं।

कुछ बातों को कहना मुनासिब होता है और कुछ को स्मृति कक्ष में संग्रहीत करना उचित होता है।

कई पहलुओं पर उनसे चर्चा होती,वे अक्सर जिज्ञासाओं का समाधान भी करते। कभी किसी द्वंद्व में नहीं पड़ते,आमतौर पर सामने वाले की बात का समर्थन कर दिया करते थे। कई बैठकों में मैं रहा भी।

आज जब वे नहीं है तो उनके चाहने वालों में एक बड़ी सूची है;हमारे लिए भी कई पुस्तकों का रचनात्मक सहयोग दिया,कई महत्वपूर्ण पांडुलिपियों पर राय भी देते थे,यू समझ लीजिए वे अपने आपमें विलक्षण थे, कईयों के हमदर्द थे, कईयों के हमराज थे।

उनकी स्मृति को नमन,वे जहां कई भी है वहां से अपने मित्रों में,अपने पाठकों के बीच बने हुए है।

 

 

डॉ लालित्य ललित
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,भारत
5, इंस्टिट्यूशनल एरिया,
वसंत कुंज, नई दिल्ली 110070
Mobile: +91 98735 25397

 

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3 टिप्पणी

  1. बेहद भाव प्रवण श्रद्धांजलि।
    आदरणीय डॉक्टर कमल किशोर गोयनका सहज सरल सौम्य व्यक्तित्व और कृतित्व भी। उनके कार्य आने वाले साहित्य के विद्यार्थियों को एक दीप स्तंभ की भांति शोध और लेखन का रास्ता प्रशस्त करते रहेंगे।
    उनके पट्ट शिष्य ने अपने अनुभव और भाव जनित उद्गारों और पत्रों के माध्यम से उनके समग्र व्यक्तित्व और कार्यों को बेहद संजीदगी से इस स्मृति शेष में प्रस्तुत किया है। उनका आभार कि भविष्य के अध्येताओं हेतु यह एक नज़ीर साबित होगी कि गुरु शिष्य परंपरा क्या होती है और उसे कैसे श्रद्धापूर्वक निभाया जाता है।
    इस स्मृति शेष को पढ़ कर एक उर्दू की पुरानी
    कहावत याद आ रही है
    बा अदब बा नसीब
    बे अदब बे नसीब।
    आदरणीय डॉक्टर कमल किशोर गोयनका को विनम्र श्रद्धांजलि ।

  2. आत्मीय एवं भावपूर्ण स्मरण, आदरणीय लालित्य जी ने अपने गुरु गोयनका जी की की स्मृतियों को जिस सहज ढंग से प्रस्तुत किया है वह मन को छू लेता है। कमल किशोर गोयनका जी को विनम्र श्रद्धांजलि

  3. आदरणीय ललित जी!

    भले ही हमारा गोयनका जी से कोई परिचय नहीं है लेकिन एक शिक्षक की हैसियत से वे वंदनीय हैं।जितना उनको इस समय पढ़ा हमने जाना कि वे बेहद अच्छे शिक्षक तो रहे ही होंगे लेकिन एक बेहतर इंसान भी रहे और एक अच्छा इंसान होना ज्यादा महत्व रखता है।
    गुरु तो हमेशा वंदनीय होते ही हैं। आपके श्रद्धांजलि संस्मरण को पढ़कर उनके बारे में काफी कुछ जाना।
    ऐसे परम प्रिय पूजनीय गुरु को सादर श्रद्धांजलि।

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