कैलाश बुधवार का जाना - हिंदी की वैश्विक पत्रकारिता की बड़ी क्षति 1
कैलाश बुधवार (साभार : वेब दुनिया )

बीती ग्यारह जुलाई को ब्रिटेन में हिंदी पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं कथा यूके के अध्यक्ष कैलाश बुधवार का निधन हो गया। हमारे कथा यूके परिवार के साथ-साथ निश्चित रूप से विश्व पटल पर हिंदी के लिए भी कैलाश जी का जाना एक अपूरणीय क्षति है। कैलाश जी जितने ऊंचे पदों पर रहे थे, व्यवहार में उतने ही विनम्र थे। मिलते ही वे आपको अपना बना लेते थे। यही कारण है कि उनके निधन के बाद अलग-अलग क्षेत्रों के लोग लगातार उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियाँ साझा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। इसी क्रम में केन्द्रीय हिंदी संस्थान आगरा के नवनियुक्त उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने भी कैलाश बुधवार को बड़े भावपूर्ण ढंग से याद किया है। – मॉडरेटर

कैलाश बुधवार जी का देहांत हिंदी पत्रकारिता के बड़े स्तंभ का जाना है। उन्होंने कई दशक तक बी.बी.सी हिंदी और तमिल सेवा में अध्यक्ष  व अन्य भूमिकाओं का निर्वहन किया। यह दौर हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर था।  
भारत में प्रभाष जोशी और राजेन्द्र माथुर जैसे संपादक देश को विचारों की लहरों से प्रेरित कर रहे थे तो वहीं बी.बी.सी हिंदी सेवा  में कैलाश जी के नेतृत्व में हिंदी पत्रकारिता का वैश्विक चेहरा उभर रहा था। कैलाश बुधवार, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, अचला शर्मा , गौतम सचदेवविजय राणानरेश कौशिक, शिवकांतललित मोहन जोशी जैसे पत्रकारों ने भारत  में सरकारी सेंसरशिप के युग में मुक्त , निष्पक्ष, विचारधारामुक्त, सम्यक विश्लेषण के साथ समाचार और उस पर बेबाक समीक्षा उपलब्ध करवाई। 
जिस प्रकार राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी ने हिंदी के प्रखर पत्रकारों की एक बड़ी टीम खड़ी की उसी प्रकार कैलाश जी ने वैश्विक दृष्टि और सरोकार रखने वाली टीम बी.बी.सी में  भी बनाई। ओंकार नाथ श्रीवास्तव के साथ उनकी जोड़ी देव दुर्लभ जोड़ियों में से थी। यह साथ इलाहबाद से था।  दो दिग्गजों की इस जुगलबंदी ने हिंदी की वैश्विक पत्रकारिता को कई दशकों तक समृद्द किया। 
इन्हीं सब विशेषताओं के चलते बी.बी.सी हिंदी सेवा  बुद्दिजीवियों, विद्यार्थियों, दूर-दराज़ में रहने वाले भारत के 4 करोड़ जागरूक नागरिकों की पहली पसंद बनी। यह वह समय  था जब बी.बी.सी सुनना एक प्रकार का बौद्धिक स्टेटस सिंबल बन गया था।  बी.बी.सी हिंदी सेवा  की यह लोकप्रियता केवल किसी नीति विेशेष या आधुनिक उपकरणों के कारण ही संभव नहीं हुई । मै समझता हूँ भारत और हिंदी की असाधारण प्रतिभाओं को उनकी संभावनाओं के लिए खुला आकाश देने वाले कैलाश जी के व्यक्तित्व  के कारण ही बी.बी.सी भारत में महाप्रसारक की भूमिका में आ गयी। उनके व्यक्तित्व का खुलापन, एक प्रबंधन अध्य्यन का विषय  हो सकता है कि कैसे असाधारण प्रतिभाओं की सामूहिक ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है ! 
बी.बी.सी हिंदी और तमिल सेवा के पहले गैर-युरोपियन अध्यक्ष का दायित्व संभाल उन्होंने भारत और हिंदी को गौरव और सम्मान की अनुभूति दी । उससे पूर्व हिंदी कार्यक्रम मुख्य रूप से अनुवाद आधारित होते थे  उनके समय में ही हिंदी में मौलिक कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू हुई। शायद यही समय था कि बी.बी.सी की उपनिवेशवादी सोच का बोझ बी.बी.सी हिदी सेवा के कंधों से उतरने लगा था। 
विजय राणा बताते हैं कि वे बी.बी.सी में 40 से अधिक भाषाओं का प्रसारण होता था और कैलाश जी ने सदा यह सुनिश्चित किया कि अंग्रेजी के बाद प्रसारण की  दूसरी बड़ी भाषा हिंदी ही रहे। हिंदी के प्रति यह लगाव सदा इस तरह बना रहा कि ठंडे और बर्फीले मौसम में भी उन्हें  हिंदी के हर छोटे -बड़े कार्यक्रम में  उत्साह से भाग लेते देखा जा सकता था। उनके असाधारण योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में उन्हें विश्व हिदी सम्मान से सम्मानित किया जिसे उन्होंने अपनी चिरपरिचित विनम्रता के साथ  ग्रहण किया। 
वर्ष 2000-2005 तक ब्रिटेन में हिंदी और संस्कृति अधिकारी के रूप में काम करने के अपने कार्यकाल के दौरान कैलाश जी से कई मुलाकातें हुईं। मेरे घर होने वाली गोष्ठियों में वे नियमित रूप से परिवार सहित आते थे। हिंदी के प्रति मेरे कामकाज को देखकर वे सदा प्रोत्साहित करते और यथासंभव सहयोग भी देते। उनके साथ एक बार साहित्यिक पुरस्कार के निर्णायक मंडल का सदस्य बनने का अवसर मिला  तो मुझे उनकी विवेकशीलता और भाषा व साहित्य  पर गहरी पकड़ को देखने का अवसर मिला। मैं बैठक से पहले कई चीजें उनको बताने के लिए सोच कर गया था। पर कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने चंद शब्दों में वह सब कुछ कह डाला, जो मेरे मन में था। 
भारत वापसी के समय उन्होंने मुझे विदाई भोज पर आमंत्रित किया  और हिंदी के संबंध में खूब चर्चाएं हुई।  भारत वापस आकर भी उनका स्नेह बना रहा और वे कई बार फ़ोन भी करते थे। 2012 में उनकी पुस्तक ‘लंदन के पत्र’ के भारत में लोकार्पण के बारे में कई बार चर्चा हुई परंतु उनकी यात्रा के कार्यक्रमों में बदलाव के चलते संभव नहीं हो पाया। 
वे अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते थे। इतने मशहूर प्रसारक और इतने विनम्र की वे उम्र , ज्ञान और अनुभव का एहसास न होने देते थे। उनकी विनम्रता ओढ़ी हुई नहीं थी। यह किसी रणनीति के तहत नहीं था । यह विनम्रता कृत्रिम नहीं थी। वे एक पवित्र आत्मा  थे। इस विनम्रता और उदारता के चलते  ही वे इतनी बड़ी टीम खड़ी कर पाए । 
उन्होंने पृथ्वी थियेटर में काम किया था और पृथ्वीराज कपूर के साथ नाटक में अहम किरदार किए थे। उनकी यह रचनात्मकता जीवन भर बनी रही । उन्हें जब भी थियेटर करने का अवसर मिला वे चूके नहीं। इसलिए  शायद जीवन के अतिंम समय तक वे सह्रदय और रचनात्मक बने रहे । ऐेसे विराट और उदात्त व्यक्तित्त्व को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि ।

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