‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’, ‘कलयुग’, ‘जुनून’, ‘त्रिकाल’, ‘मंडी’, ‘अंतर्नाद’, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘मम्मो’, ‘सरदारी बेगम’, ‘समर’, ‘हरी भरी’ और ‘जुबैदा’ जैसी उत्कृष्ट फ़िल्मों के सृजन के साथ साथ भारत एक खोज का निर्माण करने वाले श्याम बेनेगल नहीं रहे। हाल ही में मित्रों ने मिलकर उनका 90वां जन्मदिन मनाया था। उनके निधन के साथ समानांतर सिनेमा के एक युग का पटाक्षेप हो गया। पुरवाई परिवार की ओर से एक श्रद्धांजलि…
‘पुरवाई’ के संपादक तेजेन्द्र शर्मा से फ़ोन पर ख़बर मिली है कि श्याम बेनेगल नहीं रहे। कुछ ऐसा महसूस हुआ कि हिंदी फ़िल्मों में समानांतर सिनेमा का सबसे चमकीला सितारा अस्त हो गया। उनके साथ मेरी संस्था ‘फ़िल्म मीडिया जर्नलिस्ट कंबाइन्स’ की बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं ।
1974 में जब मैं विद्यार्थी था उनकी फ़िल्म ‘अंकुर’ देखी थी… यह उनकी पहली फ़िल्म थी, इसके ज़रिए ही उन्होंने निर्देशन की शुरुआत की थी। कमर्शियल और टाइप्ड हिंदी फ़िल्मों के जमघट में श्याम बेनेगल की इस फ़िल्म ने एक नई बयार का अहसास कराया था और हमारी पीढ़ी के दर्शकों को उन्होंने अपना फ़ैन बना लिया था। इस फिल्म ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई थी और इस ने 40 से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीते थे।
हैदराबाद में हुई एक सच्ची घटना पर आधारित यह फ़िल्म श्याम बेनेगल ही नहीं शबाना आज़मी की भी पहली फ़िल्म थी। इसके बाद एक-एक करके अंकुर, मंथन, निशांत, कलयुग, मंडी, ज़ुबेदा जैसी फ़िल्में आईं और श्याम बेनेगल नए सिनेमा के शिखर पुरुष के रूप में स्थापित हो गए। यही नहीं उन्होंने समानांतर सिनेमा के लिए प्रतिभावान कलाकारों की बड़ी फ़ौज तैयार की। भारत एक खोज पर बनी दूरदर्शन की श्रृंखला अभी भी लोगों की स्मृतियों में ताज़ा है।
श्याम बेनेगल को भारत सरकार की ओर से 18 राष्ट्रीय पुरस्कारों के अतिरिक्त पद्मश्री, पद्मभूषण एवं दादा साहेब फालके सम्मान से नवाज़ा गया। उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों का राजकुमार भी कहा जाता था। उनका अंतिम संस्कार भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय सम्मान के साथ किया गया।

पहली बार उनसे मुलाक़ात जहाँ तक याद आता है उनकी फ़िल्म त्रिकाल के प्रेस शो के दौरान हुई थी तब तक उनकी निशांत, मंथन, भूमिका, जुनून और कलयुग फ़िल्में आ चुकी थीं और वे समानांतर सिनेमा में स्थापित हो चुके थे। मैंने उनसे एक सवाल किया था कि उनकी फ़िल्मों में हाड़ मांस के चरित्रों के साथ ही शहर, गांव या स्थान भी चरित्र की तरह से स्थापित होते हैं उसके लिए वे क्या करते हैं। उन्होंने पीठ थपथपाई और कहा मैं चाहता था कि कोई यह सवाल मुझसे पूछे। मैं कहानी के घटनाक्रम में आए स्थानों, गांव और शहर को फ़िल्माने से पहले जीता हूँ वे भी मेरी फ़िल्म के अन्य चरित्रों के साथ स्थापित हो जाते हैं।
बाद में जब MAMI फ़िल्म फ़ेस्टिवल की शुरुआत हुई तो जो गंभीर फ़िल्म निर्माता इसके साथ जुड़े उनमें सबसे अधिक सक्रिय श्याम बेनेगल थे। उन दिनों इस फ़ेस्टिवल के साधन सीमित थे इसलिए हमारी संस्था ने कई वर्षों तक फ़ेस्टिवल डेली बुलेटिन अपने खर्चे पर निकाली। इसकी विषय-वस्तु जुटाने में श्याम भाई का सहयोग भी बराबर रहता था।
श्याम भाई जहाँ अपनी फ़िल्म क्राफ्ट को लेकर बहुत संवेदनशील थे, साथ ही उनका प्रयास रहता था कि कहानी के साथ पूरा न्याय कर पाएँ। यही नहीं उनकी फ़िल्मों के विषय वस्तु में काफ़ी विविधता रहती थी ।
उनकी फ़िल्म मंथन को बड़ी मेहनत और समय लगा कर एम एम प्रिंट से 4K फॉर्मेट में डिजिटल रूप में संरक्षित किया गया था । इस वर्ष मई में फ्रांस के कान्स फ़िल्म महोत्सव में इसे क्लासिक खंड में प्रदर्शित किया गया था जो विश्व सिनेमा के इस बड़े मंच पर उनकी कला का अद्भुत सम्मान था।
श्याम बेनेगल फ़िल्म वालों के हितों को लेकर विभिन्न फ़ोरम में सक्रिय रहा करते थे और जब भी अवसर मिलता आवाज बुलंद करते रहे ।
उन्हें और उनकी रचना धर्मिता को श्रद्धांजलि।

प्रदीप गुप्ता