Sunday, March 15, 2026
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राशि सिंह की दो कविताएँ

1

व्यस्त हूँ मैं जिंदगी की

पेचीदीकियाँ सुलझाने में

दर्द के साथ  लय बनाने में

और टूटे रिश्तों को एक माला में पिरोने में .

​व्यस्त हूँ मैं हर बार दिलासा देने में

कई बार वह जो किया ही नहीं

गुनाह मानने में

जानते हो क्यों ?

​टूटे रिश्तों को एक माला में पिरोने में .

​व्यस्त हूँ मैं मेकअप की परत में

गम छिपाने में

और सूखे दुःख से भरे लबों पर

मुस्कराहट की चलिपस्टिक लगाने में .

​व्यस्त हूँ मैं खुद को तराशने में

​बिखरे हुए सपनों को संजोने में

​वक्त ही कहाँ है तेरा- मेरा कहने और

​करने का

​पता है क्यों ?

​कव्यस्त हूँ मैं यूँ ही बेबजह ग़मों को कर धता मुस्कराने में

 

2

चढ़ता सूरज और डूबता सूरज

बस समय का फेर है

उगते दोनों ही और डूबते भी हैं

समय की देर सबेर है .

​धारण करके धैर्य और विश्वास

​कर लो थोड़ा इन्तजार

जिस दिन कदम चूम लेगी कामयाबी

बदल जाएगा दुश्मनों का व्यवहार .

​आज अँधेरा घाना है उदासियों का

दूर दिख रहा किनारा

जिस दिन थाम लोगे पतवार विशवास की

मिट जाएगा हर भ्रम तुम्हारा .

​जिंदगी कागजों में लिखी हुई कोई

कहानी जैसी ही है

जिस दिन पूरी हो जायेगी यह किताब

रुखसत इस जहां से करना होगा .

​अनगिनत ख्वाब और अनगिनत

यह तृष्णाएं

जीवन का सकूं चचुरा लेती हैं

बना देती हैं पाकीजा जिंदगी को शमशान .

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