Thursday, May 21, 2026
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गोविंद शर्मा की दो लघुकथाएं

पक्की छत

वे पूरे पांच साल बाद उस बस्ती में वोट मांगने आये। कच्ची झौंपड़ियों में रहने वाले लोग उनके सामने घेर कर लाये गये थे। उन्होंने कहा- वह दिन दूर नहीं, जब तुम सबके सिर पर पक्की छत्त होगी…। अभी वे अपनी बात पूरी नहीं कर पाए थे कि एक बोल पड़ा- यह वादा तो आपने पांच साल पहले भी किया था।

मैं भूला नहीं हूं। दो साल पहले मैंने इस पर काम भी षुरू कर दिया था। तुम्हें याद होगा, दो साल पहले मैंने तुम्हारी झौंपड़ियों के पास से निकलने वाले फ्लाई ओवर का षिलान्यास किया था। जब वह बनकर तैयार हो जायेगा, तब उसके ऊपर तो दूसरे लोगों की गाड़ियां फर्राटा भरेंगी, पर उसके नीचे तो तुम्हारी आबादी ही रहेगी। वह छत्त इतनी पक्की होगी कि उसका आंधी-तूफान तो क्या भूकंप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। बजाओ ताली….।

बड़ी हो गई

आठ साल की पिचिका की दादी उसके पास रहने आ गई। दादी को पिचिका और पिचिका को दादी- अच्छी लगने लगे। एक दिन दादी ने देखा, पिचिका खूब गीली मिट्टी में खेल रही हैं।दादी ने किंचित गुस्से में कहा- यह क्या कर रही हो? न जाने तुम कब बड़ी होवोगी।

पिचिका को हंसी आ गई। बोली- दादीजी, आपको पता नहीं है क्या? मैं बड़ी हो गई हूं। जब से घर में मेरा छोटा भाई आ गया है। वह मुझसे से कोई चीज छीनता है और मैं रोकती हूं तो सब कहते हैं- देदो उसे, तुम बड़ी हो। कभी किसी बात को लेकर तो कभी किसी बात को लेकर मुझे कहते रहते हैं- तुम बड़ी हो, यह तुम्हें मारता है तो उसे वापस मत मारो। वह छोटा है तुम बड़ी हो। वह मम्मी के साथ ही जायेगा और पापा के साथ भी। तुम घर में रह सकती हो, क्योंकि तुम बड़ी हो। वाह दादी, आप पूछ रही हैं कि मैं बड़ी कब होऊंगी।

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