यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन प्रयोग में नहीं आए थे। सन उन्नीस सौ अठासी की।
“मैं कस्बापुर से बोल रहा हूं,” टेलिफ़ोन के दूसरे सिरे से आवाज़ आई, “आप के साथ वाले घर में एक महेंद्रनाथ रहते हैं। उन का फ़ोन खराब लगता है। उन के लिए एक बुरी खबर है।”
“हां,हां, कहिए,” महेंद्र के घर पर जब कोई पार्टी होती है तो वह अपने फ़ोन को चोंगे से अलग कर देता है, “मैं उन की पड़ोसिन बोल रही हूं, मधु त्रिपाठी।”
“मैं उन की पत्नी का भाई हूं। मां गुज़र गई हैं। कांता को जल्दी ही कस्बापुर पहुंच जाना चाहिए। सुबह अंत्येष्टि है।”
“कृपया मेरी सहानुभूति स्वीकार करें,” मैं ने कहा, “कांता से मैं अभी बात करती हूं।”
अगले ही पल मैं अगले दरवाज़े पर जा पहुंची।
“नैपकिन्ज़ लगा कर केय अभी नहाने गई है,” महेंद्र अपने खाने के कमरे का निरीक्षण कर रहा था, “आप के ग्लासेस मुझे बहुत पसंद आए, मै’म। सोचता हूं, इस बार….”
“आप के लिए एक शोक- सूचना थी। केय की मां नहीं रहीं।”
कांता का उल्लेख हम सभी ‘केय’ नाम ही से किया करते। महेंद्र का अनुकरण करते हुए। उस के अनुसार ‘कांता’ नाम एक कस्बे निवासी होने का प्रमाण देता है, जब कि ‘केय’ नाम आधुनिक होने का।
“इधर नहीं,” महेंद्र तत्काल बाहर वाले बरामदे में लपक लिया, “केय विचलित हो गई तो मेरी पार्टी जोखिम में पड़ जाएगी। मेरे मेहमानों का मज़ा किरकिरा हो जाएगा। ले- दे कर तीन- चार घंटों का ही तो अंतर पड़ेगा। जैसे ही मेहमान जांएगे आप केय को बतला दीजिएगा। मगर यह न कहिएगा कि मैं पहले जान चुका था।”
“सोच लो,” आए.ए.एस.में मैं महेंद्र से दो साल पहले आई थी।
“मेरा आप से निवेदन है, मै’म,” महेंद्र कारुणिक हो चला, “आप इस सूचना को अभी दबा ही लीजिए। तिवारी मेरे बौस हैं और पहली बार मेरी पार्टी में आ रहे हैं। उन्हें मैं ख़ुशनुमा माहौल देना चाहता हूं….”
अपनी जो मोरपंखी साड़ी मैं ने पार्टी के लिए इस्त्री कर रखी थी, उसे महेंद्र के घर से लौटने पर मैं ने वापस अपनी आलमारी में रख दी।
बाहर निकाली काले मोर लिए सफ़ेद हैंडलूम साड़ी।
“तुम्हें देख कर अच्छा लग रहा है,” तैयार हो कर महेंद्र के घर की ओर अपने कदम मैं ने बढ़ाए ही थे,कि अपनी पत्नी के साथ तिवारी मुझे वहीं जाते हुए मिला।
“मुझे भी,सर,” मैं ने कहा। सर्विस में वह मुझ से एक साल सीनियर है।
“यह केय है, मेरी पत्नी,सर,” तिवारी से महेंद्र ने वहां पहले से बैठे मेहमानों का औपचारिक परिचय करवाया, “मेरे बैचमेट गिरीश टंडन और उन की पत्नी आभा, मेरी बैचमेट इंदु और उस के इन्कम- टैक्स कमिश्नर पति,विनोद और यह मेरे बौस मिस्टर तिवारी और उन की मै’म।”
“आप क्या लेंगे,सर,” महेंद्र ने तिवारी से पूछा, “औरंज जूस या ऐपल जूस?”
“तुम लोग क्या ले रहे हो?” तिवारी की गर्दन ने एक लहरदार बल भरा।
“हम औरंज ले रहे हैं,सर,” टंडन ने खीसें निपोरीं।
“नींबू सोडा मिलेगा?” तिवारी ने अपनी रोबीली आवाज़ में पूछा।
“क्यों नहीं,सर?” महेंद्र तत्क्षण खाने वाले कमरे में चला गया।
“और आप के लिए, मैम?” कांता ने मिसेज़ तिवारी के संग सत्कारिणी की भूमिका ग्रहण की।
“मैं ऐपल ले लूंगी,” मिसेज़ तिवारी को भी अपने को दूसरों से ऊपर रखने का अच्छा अभ्यास रहा।
“मैं अभी लाती हूं,”कांता उठ खड़ी हुई।
“मूर्ख ने ड्रिंक्स का इंतज़ाम नहीं किया,” महेंद्र और कांता को एकसाथ अनुपस्थित देख कर तिवारी ने टंडन की ओर आंख मिचकाई।
“ना,”टंडन भी कनखियाया, “नो स्कौच्च, नो बियर, नौट ईवन वाइन….”
“यह बताओ, आभा,” तिवारी टंडन की पत्नी की ओर मुड़ा,“यह केय क्या एंग्लोइंडियन है?”
“एंग्लोइंडियन क्या उस जैसी अंग्रेज़ी बोलते हैं?” टंडन की पत्नी ने हंसी छोड़ी।
“आभा, ठीक बात बोलो,” टंडन ने पत्नी को त्योरी दिखाई, “जैसी तुम्हारी अंग्रेज़ी, वैसी केय की अंग्रेज़ी।”
“नाम तो उस का कांता है,” टंडन की पत्नी तनिक न झेंपी— अपनी अंग्रेज़ी पर वह खूब भरोसा रखती थी— “मगर नहीं। यह महेंद्र महाशय अंग्रेज़ों की नकल करेंगे।”
“लीजिए, सर,” महेंद्र तभी तिवारी के लिए नींबू सोडे के साथ बैठक में लौट आया।
“कुछ खाने के लिए भी लीजिए,” पीछे- पीछे खाने का सामान व ऐपल जूस लिए कांता का नौकर उस के साथ बैठक में दाखिल हुआ।
चिकन और पनीर के टिक्कों को कांता ने टुथपिक की सहायता से छोटे निवालों में बदल दिया था।
“यह तो सरासर अन्याय है,केय,” टंडन ने कांता के साथ चुहल की, “हम यहां पूरे पंद्रह मिनट बैठे रहे मगर तुम ने ये टिक्के हमारे सामने नहीं रखे….”
“आंएगे,आप के पास भी आंएगे,” कांता ने अपने गालों के गड्ढे उजागर किए।
“कल सचिव स्तर की एक बैठक में मुझे चीफ़ मिले थे,” तिवारी ने अपनी वरिष्ठता की धाक जमाई, “दिल्ली से वापस आने वाले लोगों को एडजस्ट करने की बात हो रही है। कुछ बदलियां अब और होंगी….”
“मुझे मत खिसकाइएगा,सर,” महेंद्र ने चिरौरी की, “मैं यहाँ खूब खुश हूं….”
“आप कब तक दिल्ली जाएंगे,सर?” टंडन ने पूछा।
“अभी मेरा कूलिंग आव पीरियड चल रहा है,” तिवारी लखनऊ आने से पहले पांच साल टोक्यो में लगा चुका था, “पांच साल पूरे होने में अभी डेढ़ साल बाकी है….”
“मैं खुद दिल्ली जाना चाहती हूं, सर,”इंदु ने कहा, “विनोद को भी वहां ज़्यादा सहूलियत रहेगी।”
“आप यह और लीजिए,” कांता ने चिकन टिक्के की प्लेट तीसरी बार तिवारी के सामने रखी।
“सौरी फ़ौर टौकिंग शौपिंग,” तिवारी ने इंदु की ओर उपेक्षा दिखाई, “मूर्खतावश इन टिक्कों का मज़ा लेने की बजाय दफ़्तर इधर ले आए हैं। भई, ये तो बहुत ही उम्दा बने हैं। इस बार हम ने कोई पार्टी रखी तो महेंद्र के नौकर को अपने यहां बुलवाना पड़ेगा।”
“ज़रूर,सर, ज़रूर,” महेंद्र उल्लसित हुआ, “केय ने उसे बहुत अच्छा सिखा रखा है।”
“हमारे यहां सिखाने वाली को खुद बहुत सीखने की ज़रूरत है,” तिवारी पत्नी को काटने दौड़ा।
“हां, इन्हें यही शिकायत उधर टोक्यो में भी रही,” मिसेज़ तिवारी ने अपनी सफ़ाई पेश की, “चूंकि मांसाहारी चीज़ों से मुझे सख्त परहेज़ है। उधर टोक्यो में भी जब हम पार्टी देते थे तो मांसाहारी सारा सामान बाहर ही से मंगाया जाता था और बाहर ही बांट दिया जाता था। मजाल जो एक भी मांसाहारी चीज़ मेरी रसोई में दाखिल हो….”
“हां,इस लिए क्यों कि मेरी पत्नी अपनी जाति- हित के सामने पति की रुचि को क्षुद्र मानती है….”
“नहीं,सर,” महेंद्र ने कहा, “आप हमें बताइएगा, सर। जब भी चाहिए हों, आप को चिकन टिक्का हम अपनी रसोई में बनवा कर आप को भिजवा दिया करेंगे….”
“आप ने नौकर भेजने की बात कही थी,सर,” महेंद्र को मात देने के इरादे से टंडन ने तिवारी का ध्यान अपनी ओर लाना चाहा, “तो नौकर का एक किस्सा याद आ गया। एक नौसिखिए नौकर को पहली बार एक बड़े भोज पर खाना परोसने का अवसर मिला। अपनी पूरी ज़िंदगी में उस ने ऐसी स्त्रियां नहीं देखी थीं, सर से पांव तक चिकनी और चमकीली। स्त्रियां खातीं कम और आपस में फुसफुसातीं ज़्यादा। उन के निकट जा कर उस ने उन की फुसफुसाहटें अपनी श्रवण- सीमा में लाने की कई चेष्टाएं कीं, मगर वह हर बार असफल रहा। अपनी जिज्ञासा दबानी जब उस के लिए असंभव हो गई तो वह एक बूढ़े नौकर के पास पहुंच लिया, ‘ये महिलाएं हम से क्या छिपाना चाहतीं हैं? इन के पास जब भी हम में से कोई पहुंचता है तो ये फ़ौरन बोलना बंद कर देती हैं। किस के बारे में यह इतना छिपाव बरत रहीं हैं?’अब बूझिए, सर, उस बूढ़े अनुभवी नौकर ने उस नौसिखिए से जवाब में क्या कहा, ‘हमारी, मूर्ख, हमारी!’”
सभी के साथ कांता ने भी टंडन की हंसी का पीछा किया।
मगर मैं ने नहीं।
“अचरज है, सर, घोर अचरज,” महेंद्र ने अपनी हंसी सब से पहले वापस ली, “हमारी पत्नियां नीरस इन नौकरों में कैसे अपने लिए दिलचस्पी का सामान खोज निकालतीं हैं?”
“एक बात और समझने की है,” तिवारी ने अपनी अक्लमंदी बघारी, “सभी पत्नियां निष्ठुरता की सीमा तक अपने नौकरों के साथ बेलिहाज़ी क्यों बरतती हैं….”
“लेकिन कमाल देखिए,” मिसेज़ तिवारी ने ताना कसा, “सभी पति अपने नौकरों व दूसरों की पत्निओं के साथ बेजोड़ उदारता दिखाते हैं….”
“खाना कब लगवा रहे हो,महेंद्र?” मैं ने पूछा।
मैं बुरी तरह थक रही थी।
“हां भई, खाना लगवा दो,केय,” तिवारी ने कांता की ओर देखा, “अब और नींबू सोडा नहीं….”
“मैं अभी सूप भिजवाती हूं,” कांता तुरंत अंदर चली गई।
“दावत बिछी है,” खाने के कमरे में कदम रखते ही तिवारी ने ज़ोर से सीटी बजाई।
मेज़ वाकई अच्छी बिछी थी।
बांए कोने पर बारह खंडों में तराशी गई तीन मुर्गियों के संग- संग दो समूची मछलियां सजी थीं।दांए कोने में रखे थे पनीर कोफ़्ते, काबुली चने और भरवां परवल।
मेज़ के बीचोंबीच मेयोनीज़ सौस में उछाली गई नानाविध सब्ज़ियां सलाद का काम दे रहीं थीं : पहाड़ी मिर्च, फ़्रैचबीन, गाजर और काहू की पत्ती।
सलाद के एक तरफ़ लगे थे मटर वाले बासमती चावल और दूसरी तरफ़ दही- बड़े।
“लीजिए,” कांता ने सब से पहले तिवारी को नैपकिन के साथ प्लेट थमाई।
“शुरू कीजिए, सर,” महेंद्र ने मुर्गी की तश्तरी की ओर संकेत किया।
“अपनी पार्टी के लिए अब मैं केय पर आश्रित रहूंगा,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ पर एक हल्का धौल जमाया, “तुम सुन रही हो न,केय? खाने के मामले में तुम ने मुझे आज कायल कर दिया….”
“मैं कैसे मान लूं आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा नहीं कह रहे?” कांता खिलखिलाई, “खाकर दिखाइए तो मानूं।”
“पत्नी हो तो ऐसी,” तिवारी ने अपनी पत्नी को खिझाया, “खुश करने के लिए तत्पर….”
“हम स्त्रियां बैठक में क्यों नहीं बैठ लेतीं?” मिसेज़ तिवारी ने मेरी ओर देखा।
“क्यों नहीं?” मैं ने हामी भरी।
मांसाहारी भोजन की मैं खासी शौकीन हूं किंतु उस दिन अपनी प्लेट में मैं एक चम्मच चावल के अतिरिक्त कुछ और न ले पायी।
मिसेज़ तिवारी ने भी दिखाने भर को अपनी प्लेट में एक दही- बड़ा लिया और मेरे साथ बैठक में चली आई।
खाने के साथ पूरा न्याय किया टंडन की पत्नी और इंदु ने।
हमारे साथ बैठक में शामिल हुईं, तो दोनों की प्लेटें अपनी अधिकतम समाई तक भरी रहीं।
“मैं बहुत दिनों से सोचती रही हूं,मैम,” इंदु मेरे समीप बैठ गई, “आप से मिलूंगी। मगर दफ़्तर की कवायद कमबख्त ऐसी है कि….”
“हमारी कवायद क्या कम है?” टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी को अपने पक्ष में रखना चाहा, “पहले घर चमकाओ। तब अपने को संवारो। फिर किट्टी में जाओ या अपने घर पर किट्टी को जमाओ। इस के बाद खाना खाते ही फल- सब्ज़ी खरीदने मार्किट जाओ। मार्किट से आकर फिर अपने को नए सिरे से सजाओ और पति का इंतजार करो। पति के आने पर किसी जोड़े को मिलने जाओ या किसी जोड़े को अपने घर बुलाओ।”
“पूरी लीजिए,” पूरी भरी एक बड़ी प्लेट ले कर कांता बैठक में चली आई।
“तुम भी खाओ,केय,” टंडन की पत्नी ने एक साथ दो पूरियां अपनी प्लेट में रख लीं।
“हां,केय,” इंदु ने एक पूरी उठायी।
“आप लीजिए,” कांता मिसेज़ तिवारी के पास दोबारा गई।
“धन्यवाद,” मिसेज़ तिवारी ने कहा, “मैं खा चुकी हूं।”
“मैं भी खा चुकी हूं,” मैं ने कहा, “मगर तुम अब खाना शुरू करो न!”
“मैं बाद में खांऊगी,” कांता मुस्कराई और बाहर चली गई।
“वह महेंद्र तो अव्वल दर्जे का खुशामदी टट्टू है ही,” टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी के कान भरे, “और रही उस की पत्नी। उसे तो खुशामद विरासत में मिली है। उस का बाप पी.सी.एस. था । महेंद्र का मातहत था। मगर खुशामद के ज़ोर पर महेंद्र को दामाद ले उड़ा….”
“महेंद्र कौन तीसमार खां है?” इंदु ज़ोर से हंसी, “उधर अकादमी में इस ने एक नहीं,दो नहीं, तीन- तीन लड़कियों के सामने अपने विवाह का प्रस्ताव रखा था, लेकिन एक के बाद एक सभी ने उसे ठुकरा दिया।”
“उन तीन में एक कहीं तुम्हीं तो नहीं थीं?” टंडन की पत्नी ने इंदु को छेड़ा।
“नहीं। मैं विनोद के साथ थी। हमारी शादी मेरे आए. ए. एस.में आने से पहले हो चुकी थी….”
“ओह!” मिसेज़ तिवारी ने आह भरी।
“मीठा लीजिए,” मिसेज़ तिवारी और मेरे लिए कांता अनानास का सूफ़ले दो जगह परोस कर ले आई।
“मैं इतना न खा पाऊंगी,” मैं ने अपनी अनिच्छा प्रकट की।
“न अच्छा लगे तो प्लेट में छोड़ दीजिएगा,” कांता हंसी और दूसरे मेहमानों के पास फ़ौरन लौट गई।
सूफ़ले इतना नर्म था कि मुंह में रखते ही हलक में उतरने लगा।
सूफ़ले की अपनी प्लेट खत्म करते समय मैं कुछ पलों के लिए भूल सी गई कांता को एक शोक- सूचना देने का ज़िम्मा मेरा था।
“अनिन्द्य ! एकदम अनिन्द्य!!” पान चबा रहे तिवारी ने अन्ततोगत्वा महेंद्र से विदा ली, “बढ़िया, बहुत बढ़िया!”
“धन्यवाद, सर, बहुत- सा धन्यवाद,” तिवारी के आदर में महेंद्र झुक लिया।
“धन्यवाद,मैम,” कांता ने मिसेज़ तिवारी को विदा दी, “आप के आने पर हमें बहुत खुशी हुई।”
“मिलेंगे फिर। जल्दी मिलेंगे,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ थपथपाई और अपनी गाड़ी में बैठ लिया। मिसेज़ तिवारी ने भी गाड़ी में अपनी जगह ग्रहण की।
“हम भी चलेंगे,पार्टनर,” तिवारी के ड्राइवर ने जैसे ही अपनी गाड़ी बढ़ाई, टंडन ने महेंद्र से हाथ मिलाकर कहा, “आज की शाम बहुत सफल रही, बहुत अच्छी रही।”
“हमें भी बहुत अच्छा लगा,” कांता ने अपना उत्साह मंद न पड़ने दिया।
“धन्यवाद! आपके साथ बहुत अच्छा समय बीता,” इंदु के पति ने भी महेंद्र की ओर अपना हाथ बढ़ाया। और इंदु के साथ अपनी गाड़ी में सवार हो लिया।
उन के ओझल होते ही महेंद्र मेरी ओर देख कर खिसियाहट भरे स्वर में बोला, “आप के कीमती ग्लासेस की मुझे बहुत चिंता है। बर्तनों को सेट में खरीदना सच में झंझट मोल लेना है। कमबख्त एक भी टूट जाए तो सारा सेट खराब हो जाता है….”
“पार्टी के बाद कीमती बर्तन मैं भी हमेशा धो-पोंछ कर अपनी आलमारी में टिकाती हूं,” पार्टी के लिए उधार दिए गए अपने ग्लासेस की ओर हाथ बढ़ाते हुए मैं ने कांता के सामने अपनी सेवाएं प्रस्तुत कीं, “आज ये बर्तन तुम्हारे साथ मैं भी धो-पोंछ दूं?”
“आप परेशान न हों,” कांता डोल गई, “ मैं एक भी बरतन टूटने न दूंगी। आप के ग्लासेस तो और भी संभल कर धोऊंगी…..”
“अपने ग्लासेस की मुझे कतई चिंता नहीं,” मैं ने कांता को अपने अंक में ले लिया, “तुम्हारे हिस्से आई आज की तुम्हारी थकान की चिंता है….”
“मैं जानती हूं। मेरी थकान से ज़्यादा आपको किस बात की मुझे बताने की ज़्यादा चिंता है। मगर मैं जानती हूं। सब जानती हूं। नहाने के लिए जाने से पहले से जानती हूं….”
“मैं कैसे बताऊं? मुझे कितना बुरा लग रहा है?” मैं ने उसे सान्त्वना देने चाही, “इन बर्तनों का ज़िम्मा आज के लिए मुझे दे दो,प्लीज़।”
“नहीं,धन्यवाद,” कांता ने अपने आप को शीघ्र ही संभाल लिया, “मेहमानों की ज़िम्मेदारी आसानी से निभा ले गई हूं। बर्तनों का काम भी सहज में निपटा लूंगी। अपनी मैरेथन दौड़ बीच में नहीं छोड़ूंगी….”
फटे कलेजे के साथ फिर मैं उसी पल अपने घर लौट ली।
अपने कमरे में पहुंचते ही मैं ने अपने विश्वकोश में से मैरेथन वाला प्रसंग देखा :
मैरेथन लंबी दूरी की एक सड़क दौड़ है जिस की ऐतिहासिक एक प्रष्ठभूमि भी है।
चार सौ नब्बे ईसा पूर्व की एक तपती दोपहर में पंद्रह हज़ार फ़ारसी आक्रमणकारियों को दस हज़ार यूनानी सिपाहियों ने अपने मैरेथन नगर में जब पराजित किया, तो इस भव्य विजय की घोषणा मैरेथन से एथेंस तक पहुंचायी फ़ीडिपीडीज़ ने। दौड़ कर। कहते हैं, मैरेथन से पच्चीस मील से ज़्यादा की दूरी पर स्थित एथेंस पहुंचने से एक घंटा पहले ही म्रियमाण फ़ीडिपीडीज़ मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। किंतु वह तब भी दौड़ता रहा था। मृतावस्था में दौड़ता रहा था।

वरिष्ठ हैं. लेकिन कहानी में संपादन की ज़रूरत है. वर्तनी दोष भी है..
आदरणीया दीपक शर्मा जी की कहानी ‘काज प्रयोजन’ नई जीवन शैली अपनाने की शुरुआत पर आधारित है। चूंकि यह कहानी उस समय की है जब हम आधुनिक बनने की प्रैक्टिस कर रहे थे।
कहानी की मुख्य पात्र कांता घर में बाॅस के लिए घर में पार्टी रखती है। अपनों की दुखद सूचना पर भी वह पार्टी को चलने देती है। वह अपनी मैरेथन दौड़ को विराम नहीं लेने देती है।
कहानी की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठाया जा सकता है कि मां की मृत्यु का समाचार सुनकर भी उसके चेहरे पर दुख का कोई चिह्न नजर नहीं आया। वह मेहमानों के साथ सहजता से पेश आती रही। कहा जा सकता है कि ऐसे दुखद समय में भी उसकी संवेदना मर चुकी थी। मां से बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा होता ही नहीं है।
लेकिन घर में मेहमान आने वाले हों और ऐसी सूचना अचानक आ जाए तो क्या करना चाहिए? गांव में देखते आए है कि ऐसे समय में पहले लोग पंगत शुरू करवा देते हैं, क्योंकि मृत्यु की सूचना जाहिर हो गई तो कोई पंगत न खाएगा। और सारा खाना बर्बाद हो जाएगा। यह समाज का यथार्थ है। सदियों से यह चला आ रहा है।
कहानी के सभी पात्र एक से बढ़कर एक काइयां है। पति-पत्नी का आपस में चिढ़ना चिढ़ाना हो, बाॅस को वाइन की चाह हो, या मक्खनबाजी हो अथवा नीयरे वाली निंदा हो। सभी बहुत स्वाभाविक एवं वास्तविक हैं।
इस कहानी की भाषा और शैली नब्बे के दशक वाली लग रही है। आज यह कहानी लिखी जाती तो कुछ पात्र कम जरूर हो जाते।
आपकी कहानियों के विषय बहुत वास्तविक होते हैं। कहानी पढ़ते समय पूरा घटनाचक्र आंखों के सामने घूम जाता है।
बढ़िया कहानी के लिए आपको बधाई आदरणीया दीपक जी
धन्यवाद, लखनलाल पाल जी
शुभ कामनांए
आदरणीय दीपक दीदी
आपकी कहानी पढ़ी।
काफी गंभीर लगी। वास्तविकता से परे पहली नजर में तो यह दिखावे की रंगत में रंगी बड़े-बड़े अधिकारियों की एक आधुनिक पार्टी की तरह लगी,जिसमें आमतौर पर जैसा होता रहता है वैसा ही दिखाई दिया जैसा कि अक्सर उच्च पदाधिकारियों और अमीरों की पार्टी में दिखाई देता है।बस !उस समय मोबाइल नहीं था…किसी का स्वार्थ, किसी की चापलूसी, किसी की शिकायत, किसी की व्यस्तता ; किंतु सबसे ऊपर पद का प्रभाव और दिखावा था। और फिर कहानी का अंत मैराथन भी बहुत महत्वपूर्ण संकेत बिंदु है।
कहानी का प्रारंभ एक फोन कॉल से होता है जो मधु त्रिपाठी के फोन पर आता है अपने पड़ोसी महेन्द्र के लिये। जिनकी आदत थी कि पार्टी के समय फोन के चोंगे को उठाकर नीचे रख देते थे।
फोन पर महेंद्र की पत्नी कांता के भाई के द्वारा माँ की मृत्यु का संदेश था जिसकी अंत्येष्टि के लिए उसे शीघ्र बुलाया गया था, पर उस सूचना को पार्टी के होने तक कांता तक पहुँचाने के लिए स्वयं उसका पति महेन्द्र मना कर देता है।
पद का मद, स्वार्थ, दिखावा और पैसा! दुनिया में यह चार चीजें ऐसी हैं जो कभी किसी की मीत नहीं होतीं।न ही इनका रिश्तों से कोई वास्ता रहता है, न ही भावनाओं और संवेदनाओं से इनकी कोई दोस्ती रहती है।
शीर्षक और कहानी, दोनों ही इस बात को सिद्ध करते हैं,वरना भले ही पार्टी कैंसिल हो जाती, लेकिन अगर पत्नी से प्यार होता, उसकी भावनाओं को समझते, माँ के महत्व को समझते ,माँ जैसी शख्सियत की मृत्यु पर जाना जरूरी समझा जाता।
ऐसा न भी करते तो कम से कम अपनी पत्नी को सूचना देकर उससे सलाह करते कि क्या किया जाए? पर पार्टी से पूर्व पत्नी को इस खबर की सूचना देने के लिए ही मना कर दिया गया।
शीर्षक कहानी के केन्द्रीय भाव से जुड़ कर अपनी सार्थकता सिद्ध करता है।
पूरी संवेदना और उसके केंद्रीय अर्थ को खोलने वाली बंद ताले अकी चाबी की तरह है यह शीर्षक।
‘काज एक देशज शब्द है इसका अर्थ कार्य व काम दोनों ही सही हैं, लेकिन हिंदी में पर्यायवाची शब्द भी एक ही अर्थ रखते हुए भी प्रयोग की दृष्टि से भिन्न महत्व रखते हैं और वहाँ उनका अर्थ थोड़ा भिन्न हो जाता है।
यहाँ पर काज याने काम और प्रयोजन का अर्थ है- उद्देश्य ।
कोई भी पार्टी कभी भी निरुद्देश्य नहीं होती।
प्रयोजन का अर्थ उद्देश्य से है। कहानी में यही उद्देश्य शीर्षक रूप में एक गहरे नैतिक और मानवीय व्यंग्य में बदल जाता है।
यहाँ कहानी शीर्षक के माध्यम से एक बड़ा प्रश्न भी उठाती है—मनुष्य के जीवन में वास्तविक ‘काज’ क्या है और हमारा ‘प्रयोजन’ क्या हो गया है? हमें करना क्या चाहिए और हम कर क्या रहे हैं? कहानी में प्रयोजन बहुअर्थी हैं।
महेंद्र के लिये है-पार्टी की सफलता और बॉस की प्रसन्नता।
उसके लिए पार्टी का एक स्पष्ट ‘प्रयोजन’ है—अपने बॉस तिवारी को प्रसन्न करना,अपनी सामाजिक हैसियत दिखाना और अपने करियर के हित साधना। उसके प्रयोजन के सामने पत्नी कांता की माँ की मृत्यु भी अर्थहीन है।
यही विरोधाभास इस कहानी की नैतिक विडंबना है।
स्वयं महेन्द्र के अतिरिक्त भी ‘काज’ और ‘प्रयोजन’ का अंतर कहानी में अन्य पात्रों के साथ भी जुड़ा दिखाई देता है, और किसी न किसी स्वार्थपूर्ण प्रयोजन से संचालित भी दिखाई देता है।
तिवारी- अपनी वरिष्ठता और पद का प्रभाव और रुआब।
टंडन और दूसरे अधिकारी आपसी चुहल, पद-प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
पत्नियाँ भी अपने-अपने सामाजिक दायरे, किटी, सजने-संवरने और पारिवारिक भूमिकाओं के संदर्भ में उसी दिखावटी संसार का हिस्सा हैं।
इस पूरे वातावरण में सिर्फ कांता ही ऐसी है जो अपने वास्तविक काज में लगी है ।वह सबकी मेजबानी करती है, भोजन परोसती है, मेहमानों को प्रसन्न रखती है, जबकि उसकी माँ की मृत्यु का समाचार उसके भीतर दबा हुआ है।
यही कहानी का सबसे मार्मिक विरोधाभास है—
जिस स्त्री के जीवन में उस रात सबसे बड़ा काज शोक मनाना होना चाहिए था,वह अपने पति की महत्वाकांक्षाओं की चाल में उलझ कर हँसी खुशी पार्टी का प्रयोजन पूरा करने में लगी हुई है।
इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संकेत “मैरेथन” है।
जब मधु त्रिपाठी कांता को प्लेटें धोने में हेल्प करने की बात करती हैं तब कांता कहती है-
*”मैं जानती हूं मेरी थकान से ज्यादा आपको किस बात की मुझे बताने की ज्यादा चिंता है, मगर मैं जानती हूं। सब जानती हूं ।नहाने के लिए जाने से पहले से जानती हूँ…?
कांता आगे कहती है—
*“अपनी मैरेथन दौड़ बीच में नहीं छोड़ूंगी…।”*
कांता भी एक प्रकार की मैरेथन दौड़, दौड़ रही है। जीवन ने उसे व्यक्तिगत दुःख के बीच भी रुकने का अवसर नहीं दिया
जैसा की मैरेथन में हुआ था; कि विजय की घोषणा मैराथन से एथेंस तक पहुंचाने वाले फ़ीडीपीडीज़ एथेंस पहुंचने के एक घंटा पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। वह मृत अवस्था में भी दौड़ता रहा।
कांता को भी अपने आँसुओं और पीड़ा को स्थगित करके सामाजिक ‘कर्तव्य’ पूरा करना पड़ा। वह जानती है कि उसकी माँ नहीं रही, फिर भी मेहमानों की सेवा करती रहती है। उसकी दौड़ केवल एक पार्टी की मेजबानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की दौड़ है जिसमें स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निजी दुःख को पीछे रखकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत दूसरों की सुख- सुविधा और सामाजिक मर्यादा का भार उठाती रहे।
यहाँ फ़ीडिपीडीज़ और कांता का साम्य अत्यंत अर्थपूर्ण है। फ़ीडिपीडीज़ के लिये दौड़ एक संदेश पहुँचाने का काज था; कांता के लिए जीवन स्वयं एक ऐसी मैरेथन बन गया है जिसमें उसे अपने भीतर के दुःख को लेकर भी दौड़ते रहना है।
कहानी में ‘काज’ बहुत हैं, लेकिन मानवीय प्रयोजन खो गया है।
लोग पार्टी कर रहे हैं, भोजन कर रहे हैं, पद की बातें कर रहे हैं, तबादलों की चर्चा कर रहे हैं, एक-दूसरे की पत्नियों और नौकरों पर चुटकुले कर रहे हैं। लेकिन उसी घर में एक स्त्री की माँ मर चुकी है पर वह खुश रहने का अभिनय करते हुए मेजबानी कर रही है।
इसलिये कहानी पाठकों से प्रश्न करती है कि क्या सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रयोजन मनुष्य की संवेदनाओं से बड़ा हो सकता है?
महेंद्र के लिए उत्तर ‘हाँ’ है; किन्तु कहानी के प्रेरणातत्व की दृष्टि से लेखिका के लिये ‘नहीं’।
यही लेखकीय सोच महेंद्र की अमानवीयता और कांता की सहनशीलता के बीच खड़ी मानवीय संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है।
पार्टी के बीच वह भीतर से बेचैन रहती है।भोजन का आनंद भी उसके लिए संभव नहीं हो पाता। अंत में जब कांता कहती है कि वह सब जानती थी, तब कहानी का भावनात्मक चरम सामने आता है।
कांता को अपने अंक में लेना केवल सांत्वना नहीं है; यह उस पूरे सामाजिक वातावरण के विरुद्ध मानवीय आत्मीयता का प्रतिरोध है।
आधुनिकता के चलते महेन्द्र ने उसे कांता से ‘केय’ बना दिया । अपनी पत्नी के नाम तक में उसे पिछड़ापन नजर आता है।
लेकिन उसके भीतर एक बेटी भी है जिसकी माँ मर चुकी है।कहानी के अंत में जब वह अपनी पीड़ा जानते हुए भी दौड़ जारी रखने की बात करती है, तब उसका चरित्र केवल सहनशील पत्नी का नहीं रह जाता; वह अपने दुःख को अपने भीतर लेकर आगे बढ़ने वाली एक दृढ़ स्त्री बन जाती है।
मैरेथन का रूपक शीर्षक को असाधारण गहराई
देता है।
यह कहानी मनुष्य के कर्तव्य, सामाजिक दिखावे, स्त्री की अदृश्य पीड़ा और संवेदना के क्षरण की मार्मिक कहानी है।
इस बेहतरीन कहानी के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई दीदी।
प्रस्तुति के लिये पुरवाई के संपादकीय मंडल का तहेदिल से आभार।
आपकी कहानी पड़ी दीपक दीदी
काफी गंभीर लगी। वास्तविकता से परे पहली नजर में तो यह दिखावे की रंगत में रंगी बड़े-बड़े अधिकारियों की एक आधुनिक पार्टी की तरह लगी,जिसमें आमतौर पर जैसा होता रहता है वैसा ही दिखाई दिया जैसा कि अक्सर उच्च पदाधिकारियों और अमीरों की पार्टी में दिखाई देता है।बस !उस समय मोबाइल नहीं था…किसी का स्वार्थ, किसी की चापलूसी, किसी की शिकायत, किसी की व्यस्तता ; किंतु सबसे ऊपर पद का प्रभाव और दिखावा था। और फिर कहानी का अंत मैराथन भी बहुत महत्वपूर्ण संकेत बिंदु है।
कहानी का प्रारंभ एक फोन कॉल से होता है जो मधु त्रिपाठी के फोन पर आता है अपने पड़ोसी महेन्द्र के लिये। जिनकी आदत थी कि पार्टी के समय फोन के चोंगे को उठाकर नीचे रख देते थे।
फोन पर महेंद्र की पत्नी कांता के भाई के द्वारा माँ की मृत्यु का संदेश था जिसकी अंत्येष्टि के लिए उसे शीघ्र बुलाया गया था, पर उस सूचना को पार्टी के होने तक कांता तक पहुँचाने के लिए स्वयं उसका पति महेन्द्र मना कर देता है।
पद का मद, स्वार्थ, दिखावा और पैसा! दुनिया में यह चार चीजें ऐसी हैं जो कभी किसी की मीत नहीं होतीं।न ही इनका रिश्तों से कोई वास्ता रहता है, न ही भावनाओं और संवेदनाओं से इनकी कोई दोस्ती रहती है।
शीर्षक और कहानी, दोनों ही इस बात को सिद्ध करते हैं,वरना भले ही पार्टी कैंसिल हो जाती, लेकिन अगर पत्नी से प्यार होता, उसकी भावनाओं को समझते, माँ के महत्व को समझते ,माँ जैसी शख्सियत की मृत्यु पर जाना जरूरी समझा जाता।
ऐसा न भी करते तो कम से कम अपनी पत्नी को सूचना देकर उससे सलाह करते कि क्या किया जाए? पर पार्टी से पूर्व पत्नी को इस खबर की सूचना देने के लिए ही मना कर दिया गया।
शीर्षक कहानी के केन्द्रीय भाव से जुड़ कर अपनी सार्थकता सिद्ध करता है।
पूरी संवेदना और उसके केंद्रीय अर्थ को खोलने वाली बंद ताले अकी चाबी की तरह है यह शीर्षक।
‘काज एक देशज शब्द है इसका अर्थ कार्य व काम दोनों ही सही हैं, लेकिन हिंदी में पर्यायवाची शब्द भी एक ही अर्थ रखते हुए भी प्रयोग की दृष्टि से भिन्न महत्व रखते हैं और वहाँ उनका अर्थ थोड़ा भिन्न हो जाता है।
यहाँ पर काज याने काम और प्रयोजन का अर्थ है- उद्देश्य ।
कोई भी पार्टी कभी भी निरुद्देश्य नहीं होती।
प्रयोजन का अर्थ उद्देश्य से है। कहानी में यही उद्देश्य शीर्षक रूप में एक गहरे नैतिक और मानवीय व्यंग्य में बदल जाता है।
यहाँ कहानी शीर्षक के माध्यम से एक बड़ा प्रश्न भी उठाती है—मनुष्य के जीवन में वास्तविक ‘काज’ क्या है और हमारा ‘प्रयोजन’ क्या हो गया है? हमें करना क्या चाहिए और हम कर क्या रहे हैं? कहानी में प्रयोजन बहुअर्थी हैं।
महेंद्र के लिये है-पार्टी की सफलता और बॉस की प्रसन्नता।
उसके लिए पार्टी का एक स्पष्ट ‘प्रयोजन’ है—अपने बॉस तिवारी को प्रसन्न करना,अपनी सामाजिक हैसियत दिखाना और अपने करियर के हित साधना। उसके प्रयोजन के सामने पत्नी कांता की माँ की मृत्यु भी अर्थहीन है।
यही विरोधाभास इस कहानी की नैतिक विडंबना है।
स्वयं महेन्द्र के अतिरिक्त भी ‘काज’ और ‘प्रयोजन’ का अंतर कहानी में अन्य पात्रों के साथ भी जुड़ा दिखाई देता है, और किसी न किसी स्वार्थपूर्ण प्रयोजन से संचालित भी दिखाई देता है।
तिवारी- अपनी वरिष्ठता और पद का प्रभाव और रुआब।
टंडन और दूसरे अधिकारी आपसी चुहल, पद-प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।
पत्नियाँ भी अपने-अपने सामाजिक दायरे, किटी, सजने-संवरने और पारिवारिक भूमिकाओं के संदर्भ में उसी दिखावटी संसार का हिस्सा हैं।
इस पूरे वातावरण में सिर्फ कांता ही ऐसी है जो अपने वास्तविक काज में लगी है ।वह सबकी मेजबानी करती है, भोजन परोसती है, मेहमानों को प्रसन्न रखती है, जबकि उसकी माँ की मृत्यु का समाचार उसके भीतर दबा हुआ है।
यही कहानी का सबसे मार्मिक विरोधाभास है—
जिस स्त्री के जीवन में उस रात सबसे बड़ा काज शोक मनाना होना चाहिए था,वह अपने पति की महत्वाकांक्षाओं की चाल में उलझ कर हँसी खुशी पार्टी का प्रयोजन पूरा करने में लगी हुई है।
इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संकेत “मैरेथन” है।
जब मधु त्रिपाठी कांता को प्लेटें धोने में हेल्प करने की बात करती हैं तब कांता कहती है-
*”मैं जानती हूं मेरी थकान से ज्यादा आपको किस बात की मुझे बताने की ज्यादा चिंता है, मगर मैं जानती हूं। सब जानती हूं ।नहाने के लिए जाने से पहले से जानती हूँ…?
कांता आगे कहती है—
*“अपनी मैरेथन दौड़ बीच में नहीं छोड़ूंगी…।”*
कांता भी एक प्रकार की मैरेथन दौड़, दौड़ रही है। जीवन ने उसे व्यक्तिगत दुःख के बीच भी रुकने का अवसर नहीं दिया
जैसा की मैरेथन में हुआ था; कि विजय की घोषणा मैराथन से एथेंस तक पहुंचाने वाले फ़ीडीपीडीज़ एथेंस पहुंचने के एक घंटा पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। वह मृत अवस्था में भी दौड़ता रहा।
कांता को भी अपने आँसुओं और पीड़ा को स्थगित करके सामाजिक ‘कर्तव्य’ पूरा करना पड़ा। वह जानती है कि उसकी माँ नहीं रही, फिर भी मेहमानों की सेवा करती रहती है। उसकी दौड़ केवल एक पार्टी की मेजबानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की दौड़ है जिसमें स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निजी दुःख को पीछे रखकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत दूसरों की सुख- सुविधा और सामाजिक मर्यादा का भार उठाती रहे।
यहाँ फ़ीडिपीडीज़ और कांता का साम्य अत्यंत अर्थपूर्ण है। फ़ीडिपीडीज़ के लिये दौड़ एक संदेश पहुँचाने का काज था; कांता के लिए जीवन स्वयं एक ऐसी मैरेथन बन गया है जिसमें उसे अपने भीतर के दुःख को लेकर भी दौड़ते रहना है।
कहानी में ‘काज’ बहुत हैं, लेकिन मानवीय प्रयोजन खो गया है।
लोग पार्टी कर रहे हैं, भोजन कर रहे हैं, पद की बातें कर रहे हैं, तबादलों की चर्चा कर रहे हैं, एक-दूसरे की पत्नियों और नौकरों पर चुटकुले कर रहे हैं। लेकिन उसी घर में एक स्त्री की माँ मर चुकी है पर वह खुश रहने का अभिनय करते हुए मेजबानी कर रही है।
इसलिये कहानी पाठकों से प्रश्न करती है कि क्या सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रयोजन मनुष्य की संवेदनाओं से बड़ा हो सकता है?
महेंद्र के लिए उत्तर ‘हाँ’ है; किन्तु कहानी के प्रेरणातत्व की दृष्टि से लेखिका के लिये ‘नहीं’।
यही लेखकीय सोच महेंद्र की अमानवीयता और कांता की सहनशीलता के बीच खड़ी मानवीय संवेदना का प्रतिनिधित्व करती है।
पार्टी के बीच वह भीतर से बेचैन रहती है।भोजन का आनंद भी उसके लिए संभव नहीं हो पाता। अंत में जब कांता कहती है कि वह सब जानती थी, तब कहानी का भावनात्मक चरम सामने आता है।
कांता को अपने अंक में लेना केवल सांत्वना नहीं है; यह उस पूरे सामाजिक वातावरण के विरुद्ध मानवीय आत्मीयता का प्रतिरोध है।
आधुनिकता के चलते महेन्द्र ने उसे कांता से ‘केय’ बना दिया । अपनी पत्नी के नाम तक में उसे पिछड़ापन नजर आता है।
लेकिन उसके भीतर एक बेटी भी है जिसकी माँ मर चुकी है।कहानी के अंत में जब वह अपनी पीड़ा जानते हुए भी दौड़ जारी रखने की बात करती है, तब उसका चरित्र केवल सहनशील पत्नी का नहीं रह जाता; वह अपने दुःख को अपने भीतर लेकर आगे बढ़ने वाली एक दृढ़ स्त्री बन जाती है।
मैरेथन का रूपक शीर्षक को असाधारण गहराई
देता है।
यह कहानी मनुष्य के कर्तव्य, सामाजिक दिखावे, स्त्री की अदृश्य पीड़ा और संवेदना के क्षरण की मार्मिक कहानी है।
इस बेहतरीन कहानी के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई दीदी।
प्रस्तुति के लिये पुरवाई के संपादकीय मंडल का तहेदिल से आभार।
दीपक जी काज प्रयोजन बहुत सारे प्रश्नों को जन्म देती मर्मस्पर्शी कहानी है। सजीव चित्रण आपकी कहानी को बेहतरीन बनाता है। बहुत-बहुत बधाई।