Sunday, August 9, 2026
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दीपक शर्मा की कहानी ‘काज- प्रयोजन’

यह उन दिनों की बात है जब मोबाइल फ़ोन प्रयोग में नहीं आए थे। सन उन्नीस सौ अठासी की।

“मैं कस्बापुर से बोल रहा हूं,” टेलिफ़ोन के दूसरे सिरे से आवाज़ आई, “आप के साथ वाले घर में एक महेंद्रनाथ रहते हैं। उन का फ़ोन खराब लगता है। उन के लिए एक बुरी खबर है।”

“हां,हां, कहिए,”  महेंद्र के घर पर जब कोई पार्टी होती है तो वह अपने फ़ोन को चोंगे से अलग कर देता है, “मैं उन की पड़ोसिन बोल रही हूं, मधु त्रिपाठी।”

“मैं उन की पत्नी का भाई हूं।  मां गुज़र गई हैं। कांता को जल्दी ही कस्बापुर पहुंच जाना चाहिए।  सुबह अंत्येष्टि है।”

“कृपया मेरी सहानुभूति स्वीकार करें,” मैं ने कहा, “कांता से मैं अभी बात करती हूं।”

अगले ही पल मैं अगले दरवाज़े पर जा पहुंची।

“नैपकिन्ज़ लगा कर केय अभी नहाने गई है,” महेंद्र अपने खाने के कमरे का निरीक्षण कर रहा था, “आप के ग्लासेस मुझे बहुत पसंद आए, मै’म। सोचता हूं, इस बार….”

“आप के लिए एक शोक- सूचना थी। केय की मां नहीं रहीं।”

कांता का उल्लेख हम सभी ‘केय’ नाम ही से किया करते। महेंद्र का अनुकरण करते हुए। उस के अनुसार ‘कांता’ नाम एक कस्बे निवासी होने का प्रमाण देता है, जब कि ‘केय’ नाम आधुनिक होने का।

“इधर नहीं,” महेंद्र तत्काल बाहर वाले बरामदे में लपक लिया, “केय विचलित हो गई तो मेरी पार्टी जोखिम में पड़ जाएगी। मेरे मेहमानों का मज़ा किरकिरा हो जाएगा। ले- दे कर तीन- चार घंटों का ही तो अंतर पड़ेगा। जैसे ही मेहमान जांएगे आप केय को बतला दीजिएगा। मगर यह न कहिएगा कि मैं पहले जान चुका था।”

“सोच लो,” आए.ए.एस.में मैं महेंद्र से दो साल पहले आई थी।

“मेरा आप से निवेदन है, मै’म,” महेंद्र कारुणिक हो चला, “आप इस सूचना को अभी दबा ही लीजिए। तिवारी मेरे बौस हैं और पहली बार मेरी पार्टी में आ रहे हैं। उन्हें मैं ख़ुशनुमा माहौल देना चाहता हूं….”

अपनी जो मोरपंखी साड़ी मैं ने पार्टी के लिए इस्त्री कर रखी थी, उसे महेंद्र के घर से लौटने पर मैं ने वापस अपनी आलमारी में रख दी।

बाहर निकाली काले मोर लिए सफ़ेद हैंडलूम साड़ी।

“तुम्हें देख कर अच्छा लग रहा है,” तैयार हो कर महेंद्र के घर की ओर अपने कदम मैं ने बढ़ाए ही थे,कि अपनी पत्नी के साथ तिवारी मुझे वहीं जाते हुए मिला।

“मुझे भी,सर,” मैं ने कहा। सर्विस में वह मुझ से एक साल सीनियर है।

“यह केय है, मेरी पत्नी,सर,” तिवारी से महेंद्र ने वहां पहले से बैठे मेहमानों का औपचारिक परिचय करवाया, “मेरे बैचमेट गिरीश टंडन और उन की पत्नी आभा, मेरी बैचमेट इंदु और उस के इन्कम- टैक्स कमिश्नर पति,विनोद और यह मेरे बौस मिस्टर तिवारी और उन की मै’म।”

“आप क्या लेंगे,सर,” महेंद्र ने तिवारी से पूछा, “औरंज जूस या ऐपल जूस?”

 “तुम लोग क्या ले रहे हो?” तिवारी की गर्दन ने एक लहरदार बल भरा।

“हम औरंज ले रहे हैं,सर,” टंडन ने खीसें निपोरीं।

“नींबू सोडा मिलेगा?” तिवारी ने अपनी रोबीली आवाज़ में पूछा। 

“क्यों नहीं,सर?” महेंद्र तत्क्षण खाने वाले कमरे में चला गया।

“और आप के लिए, मैम?” कांता ने मिसेज़ तिवारी के संग सत्कारिणी की भूमिका ग्रहण की।

“मैं ऐपल ले लूंगी,” मिसेज़ तिवारी को भी अपने को दूसरों से ऊपर रखने का अच्छा अभ्यास रहा।

“मैं अभी लाती हूं,”कांता उठ खड़ी हुई। 

 “मूर्ख ने ड्रिंक्स का इंतज़ाम नहीं किया,” महेंद्र और कांता को एकसाथ अनुपस्थित देख कर तिवारी ने टंडन की ओर आंख मिचकाई। 

“ना,”टंडन भी कनखियाया, “नो स्कौच्च, नो बियर, नौट ईवन वाइन….”

“यह बताओ, आभा,” तिवारी टंडन की पत्नी की ओर मुड़ा,“यह केय क्या एंग्लोइंडियन है?”

“एंग्लोइंडियन क्या उस जैसी अंग्रेज़ी बोलते हैं?” टंडन की पत्नी ने हंसी छोड़ी। 

“आभा, ठीक बात बोलो,” टंडन ने पत्नी को त्योरी दिखाई, “जैसी तुम्हारी अंग्रेज़ी, वैसी केय की अंग्रेज़ी।”

“नाम तो उस का कांता है,” टंडन की पत्नी तनिक न झेंपी— अपनी अंग्रेज़ी पर वह खूब भरोसा रखती थी— “मगर नहीं। यह महेंद्र महाशय अंग्रेज़ों की नकल करेंगे।”

“लीजिए, सर,” महेंद्र तभी तिवारी के लिए नींबू सोडे के साथ बैठक में लौट आया।

“कुछ खाने के लिए भी लीजिए,” पीछे- पीछे खाने का सामान व ऐपल जूस  लिए कांता का नौकर उस के साथ बैठक में दाखिल हुआ। 

चिकन और पनीर के टिक्कों को कांता ने टुथपिक की सहायता से छोटे निवालों में बदल दिया था।

“यह तो सरासर अन्याय है,केय,” टंडन ने कांता के साथ चुहल की, “हम यहां पूरे पंद्रह मिनट बैठे रहे मगर तुम ने ये टिक्के हमारे सामने नहीं रखे….”

“आंएगे,आप के पास भी आंएगे,” कांता ने अपने गालों के गड्ढे उजागर किए। 

“कल सचिव स्तर की एक बैठक में मुझे चीफ़ मिले थे,” तिवारी ने अपनी वरिष्ठता की धाक जमाई, “दिल्ली से वापस आने वाले लोगों को एडजस्ट करने की बात हो रही है। कुछ बदलियां अब और होंगी….”

“मुझे मत खिसकाइएगा,सर,” महेंद्र ने चिरौरी की, “मैं यहाँ खूब खुश हूं….”

“आप कब तक दिल्ली जाएंगे,सर?” टंडन ने पूछा।

“अभी मेरा कूलिंग आव पीरियड चल रहा है,” तिवारी लखनऊ आने से पहले पांच साल टोक्यो में लगा चुका था, “पांच साल पूरे होने में अभी डेढ़ साल बाकी है….”

“मैं खुद दिल्ली जाना चाहती हूं, सर,”इंदु ने कहा, “विनोद को भी वहां ज़्यादा सहूलियत रहेगी।”

“आप यह और लीजिए,” कांता ने चिकन टिक्के की प्लेट तीसरी बार तिवारी के सामने रखी।

“सौरी फ़ौर टौकिंग शौपिंग,” तिवारी ने इंदु की ओर उपेक्षा दिखाई, “मूर्खतावश इन टिक्कों का मज़ा लेने की बजाय दफ़्तर इधर ले आए हैं। भई, ये तो बहुत ही उम्दा बने हैं। इस बार हम ने कोई पार्टी रखी तो महेंद्र के नौकर को अपने यहां बुलवाना पड़ेगा।”

“ज़रूर,सर, ज़रूर,” महेंद्र उल्लसित हुआ, “केय ने उसे बहुत अच्छा सिखा रखा है।”

“हमारे यहां सिखाने वाली को खुद बहुत सीखने की ज़रूरत है,” तिवारी पत्नी को काटने दौड़ा। 

“हां, इन्हें यही शिकायत उधर टोक्यो में भी रही,” मिसेज़ तिवारी ने अपनी सफ़ाई पेश की, “चूंकि मांसाहारी चीज़ों से मुझे सख्त परहेज़ है। उधर टोक्यो में भी जब हम पार्टी देते थे तो मांसाहारी सारा सामान बाहर ही से मंगाया जाता था और बाहर ही बांट दिया जाता था। मजाल जो एक भी मांसाहारी चीज़ मेरी रसोई में दाखिल हो….”

“हां,इस लिए क्यों कि मेरी पत्नी अपनी जाति- हित के सामने पति की रुचि को क्षुद्र मानती है….”

“नहीं,सर,” महेंद्र ने कहा, “आप हमें बताइएगा, सर। जब भी चाहिए हों, आप को चिकन टिक्का हम अपनी रसोई में बनवा कर आप को भिजवा दिया करेंगे….”

“आप ने नौकर भेजने की बात कही थी,सर,” महेंद्र को मात देने के इरादे से टंडन ने तिवारी का ध्यान अपनी ओर लाना चाहा, “तो नौकर का एक किस्सा याद आ गया। एक नौसिखिए नौकर को पहली बार एक बड़े भोज पर खाना परोसने का अवसर मिला। अपनी पूरी ज़िंदगी में उस ने ऐसी स्त्रियां नहीं देखी थीं, सर से पांव तक चिकनी और चमकीली। स्त्रियां खातीं कम और आपस में फुसफुसातीं ज़्यादा। उन के निकट जा कर उस ने उन की फुसफुसाहटें अपनी श्रवण- सीमा में लाने की कई चेष्टाएं कीं, मगर वह हर बार असफल रहा। अपनी जिज्ञासा दबानी जब उस के लिए असंभव हो गई तो वह एक बूढ़े नौकर के पास पहुंच लिया, ‘ये महिलाएं हम से क्या छिपाना चाहतीं हैं? इन के पास जब भी हम में से कोई पहुंचता है तो ये फ़ौरन बोलना बंद कर देती हैं। किस के बारे में यह इतना छिपाव बरत रहीं हैं?’अब बूझिए, सर, उस बूढ़े अनुभवी नौकर ने उस नौसिखिए से जवाब में क्या कहा, ‘हमारी, मूर्ख, हमारी!’” 

सभी के साथ कांता ने भी टंडन की हंसी का पीछा किया।

मगर मैं ने नहीं।

“अचरज है, सर, घोर अचरज,” महेंद्र ने अपनी हंसी सब से पहले वापस ली, “हमारी पत्नियां नीरस इन नौकरों में कैसे अपने लिए दिलचस्पी का सामान खोज निकालतीं हैं?”

“एक बात और समझने की है,” तिवारी ने अपनी अक्लमंदी बघारी, “सभी पत्नियां निष्ठुरता की सीमा तक अपने नौकरों के साथ बेलिहाज़ी क्यों बरतती हैं….”

“लेकिन कमाल देखिए,” मिसेज़ तिवारी ने ताना कसा, “सभी पति अपने नौकरों व दूसरों की पत्निओं के साथ बेजोड़ उदारता दिखाते हैं….”

“खाना कब लगवा रहे हो,महेंद्र?” मैं ने पूछा।

मैं बुरी तरह थक रही थी।

“हां भई, खाना लगवा दो,केय,” तिवारी ने कांता की ओर देखा, “अब और नींबू सोडा नहीं….”

“मैं अभी सूप भिजवाती हूं,” कांता तुरंत अंदर चली गई।

“दावत बिछी है,” खाने के कमरे में कदम रखते ही तिवारी ने ज़ोर से सीटी बजाई।

मेज़ वाकई अच्छी बिछी थी।

बांए कोने पर बारह खंडों में तराशी गई तीन मुर्गियों के संग- संग दो समूची मछलियां सजी थीं।दांए कोने में रखे थे पनीर कोफ़्ते, काबुली चने और भरवां परवल।

मेज़ के बीचोंबीच मेयोनीज़ सौस में उछाली गई नानाविध सब्ज़ियां सलाद का काम दे रहीं थीं : पहाड़ी मिर्च, फ़्रैचबीन, गाजर और काहू की पत्ती।

सलाद के एक तरफ़ लगे थे मटर वाले बासमती चावल और दूसरी तरफ़ दही- बड़े।

“लीजिए,” कांता ने सब से पहले तिवारी को नैपकिन के साथ प्लेट थमाई। 

“शुरू कीजिए, सर,” महेंद्र ने मुर्गी की तश्तरी की ओर संकेत किया।

“अपनी पार्टी के लिए अब मैं केय पर आश्रित रहूंगा,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ पर एक हल्का धौल जमाया, “तुम सुन रही हो न,केय? खाने के मामले में तुम ने मुझे आज कायल कर दिया….”

“मैं कैसे मान लूं आप मेरा मन रखने के लिए ऐसा नहीं कह रहे?” कांता खिलखिलाई, “खाकर दिखाइए तो मानूं।”

“पत्नी हो तो ऐसी,” तिवारी ने अपनी पत्नी को खिझाया, “खुश करने के लिए तत्पर….”

“हम स्त्रियां बैठक में क्यों नहीं बैठ लेतीं?” मिसेज़ तिवारी ने मेरी ओर देखा।

“क्यों नहीं?” मैं ने हामी भरी।

मांसाहारी भोजन की मैं खासी शौकीन हूं किंतु उस दिन अपनी प्लेट में मैं एक चम्मच चावल के अतिरिक्त कुछ और न ले पायी।

मिसेज़ तिवारी ने भी दिखाने भर को अपनी प्लेट में एक दही- बड़ा लिया और मेरे साथ बैठक में चली आई। 

खाने के साथ पूरा न्याय किया टंडन की पत्नी और इंदु ने।

हमारे साथ बैठक में शामिल हुईं, तो दोनों की प्लेटें अपनी अधिकतम समाई तक भरी रहीं।

“मैं बहुत दिनों से सोचती रही हूं,मैम,” इंदु मेरे समीप बैठ गई,  “आप से मिलूंगी। मगर दफ़्तर की कवायद कमबख्त ऐसी है कि….”

“हमारी कवायद क्या कम है?” टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी को अपने पक्ष में रखना चाहा, “पहले घर चमकाओ। तब अपने को संवारो। फिर किट्टी में जाओ या अपने घर पर किट्टी को जमाओ। इस के बाद खाना खाते ही फल- सब्ज़ी खरीदने मार्किट जाओ। मार्किट से आकर फिर अपने को नए सिरे से सजाओ और पति का इंतजार करो। पति के आने पर किसी जोड़े को मिलने जाओ या किसी जोड़े को अपने घर बुलाओ।” 

“पूरी लीजिए,”  पूरी भरी एक बड़ी प्लेट ले कर कांता बैठक में चली आई। 

“तुम भी खाओ,केय,” टंडन की पत्नी ने एक साथ दो पूरियां अपनी प्लेट में रख लीं।

“हां,केय,” इंदु ने एक पूरी उठायी।

“आप लीजिए,” कांता मिसेज़ तिवारी के पास दोबारा गई। 

“धन्यवाद,” मिसेज़ तिवारी ने कहा, “मैं खा चुकी हूं।”

“मैं भी खा चुकी हूं,” मैं ने कहा, “मगर तुम अब खाना शुरू करो न!”

“मैं बाद में खांऊगी,” कांता मुस्कराई और बाहर चली गई।

“वह महेंद्र तो अव्वल दर्जे का खुशामदी टट्टू है ही,”  टंडन की पत्नी ने मिसेज़ तिवारी के कान भरे, “और रही उस की पत्नी। उसे तो खुशामद विरासत में मिली है। उस का बाप पी.सी.एस. था । महेंद्र का मातहत था। मगर खुशामद के ज़ोर पर महेंद्र को दामाद ले उड़ा….”

“महेंद्र कौन तीसमार खां है?” इंदु ज़ोर से हंसी, “उधर अकादमी में इस ने एक नहीं,दो नहीं, तीन- तीन लड़कियों के सामने अपने विवाह का प्रस्ताव रखा था, लेकिन एक के बाद एक सभी ने  उसे ठुकरा दिया।”

“उन तीन में एक कहीं तुम्हीं तो नहीं थीं?” टंडन की पत्नी ने इंदु को छेड़ा। 

“नहीं। मैं विनोद के साथ थी। हमारी शादी मेरे आए. ए. एस.में आने से पहले हो चुकी थी….”

“ओह!” मिसेज़ तिवारी ने आह भरी।

“मीठा लीजिए,” मिसेज़ तिवारी और मेरे लिए कांता अनानास का सूफ़ले दो जगह परोस कर ले आई।

“मैं इतना न खा पाऊंगी,” मैं ने अपनी अनिच्छा प्रकट की।

“न अच्छा लगे तो प्लेट में छोड़ दीजिएगा,” कांता हंसी और दूसरे मेहमानों के पास फ़ौरन लौट गई। 

सूफ़ले इतना नर्म था कि मुंह में रखते ही हलक में उतरने लगा।

सूफ़ले की अपनी प्लेट खत्म करते समय मैं कुछ पलों के लिए भूल सी गई कांता को एक शोक- सूचना देने का ज़िम्मा मेरा था।

“अनिन्द्य ! एकदम अनिन्द्य!!” पान चबा रहे तिवारी ने अन्ततोगत्वा महेंद्र से विदा ली, “बढ़िया, बहुत बढ़िया!”

“धन्यवाद, सर, बहुत- सा धन्यवाद,” तिवारी के आदर में महेंद्र झुक लिया।

“धन्यवाद,मैम,” कांता ने मिसेज़ तिवारी को विदा दी, “आप के आने पर हमें बहुत खुशी हुई।”

“मिलेंगे फिर। जल्दी मिलेंगे,” तिवारी ने महेंद्र की पीठ थपथपाई और अपनी गाड़ी में बैठ लिया। मिसेज़ तिवारी ने भी गाड़ी में अपनी जगह ग्रहण की। 

“हम भी चलेंगे,पार्टनर,” तिवारी के ड्राइवर ने जैसे ही अपनी गाड़ी बढ़ाई, टंडन ने महेंद्र से हाथ मिलाकर कहा, “आज की शाम बहुत सफल रही, बहुत अच्छी रही।”

“हमें भी बहुत अच्छा लगा,” कांता ने अपना उत्साह मंद न पड़ने दिया।

“धन्यवाद! आपके साथ बहुत अच्छा समय बीता,” इंदु के पति ने भी महेंद्र की ओर अपना हाथ बढ़ाया। और इंदु के साथ अपनी गाड़ी में सवार हो लिया।

उन के ओझल होते ही महेंद्र मेरी ओर देख कर खिसियाहट भरे स्वर में बोला, “आप के कीमती ग्लासेस की मुझे बहुत चिंता है। बर्तनों को सेट में खरीदना सच में झंझट मोल लेना है। कमबख्त एक भी टूट जाए तो सारा सेट खराब हो जाता है….”

“पार्टी के बाद कीमती बर्तन मैं भी हमेशा धो-पोंछ कर अपनी आलमारी में टिकाती हूं,” पार्टी के लिए उधार दिए गए अपने ग्लासेस की ओर हाथ बढ़ाते हुए मैं ने कांता के सामने अपनी सेवाएं प्रस्तुत कीं, “आज ये बर्तन तुम्हारे साथ मैं भी धो-पोंछ दूं?”

“आप परेशान न हों,” कांता डोल गई, “ मैं एक भी बरतन टूटने न दूंगी। आप के ग्लासेस तो और भी संभल कर धोऊंगी…..”

“अपने ग्लासेस की मुझे कतई चिंता नहीं,” मैं ने कांता को अपने अंक में ले लिया, “तुम्हारे हिस्से आई आज की तुम्हारी थकान की चिंता है….”

“मैं जानती हूं। मेरी थकान से ज़्यादा आपको किस बात की मुझे बताने की ज़्यादा चिंता है। मगर मैं जानती हूं। सब जानती हूं। नहाने के लिए जाने से पहले से जानती हूं….”

“मैं कैसे बताऊं? मुझे कितना बुरा लग रहा है?” मैं ने उसे सान्त्वना देने चाही, “इन बर्तनों का ज़िम्मा आज के लिए मुझे दे दो,प्लीज़।”

“नहीं,धन्यवाद,” कांता ने अपने आप को शीघ्र ही संभाल लिया, “मेहमानों की ज़िम्मेदारी आसानी से निभा ले गई हूं। बर्तनों का काम भी सहज में निपटा लूंगी। अपनी मैरेथन दौड़ बीच में नहीं छोड़ूंगी….”

फटे कलेजे के साथ फिर मैं उसी पल अपने घर लौट ली। 

अपने कमरे में पहुंचते ही मैं ने अपने विश्वकोश में से मैरेथन वाला प्रसंग देखा :

मैरेथन लंबी दूरी की एक सड़क दौड़ है जिस की ऐतिहासिक एक प्रष्ठभूमि भी है।

चार सौ नब्बे ईसा पूर्व की एक तपती दोपहर में पंद्रह हज़ार फ़ारसी आक्रमणकारियों को दस हज़ार यूनानी सिपाहियों ने अपने मैरेथन नगर में जब पराजित किया, तो इस भव्य विजय की घोषणा मैरेथन से एथेंस तक पहुंचायी फ़ीडिपीडीज़ ने। दौड़ कर। कहते हैं, मैरेथन से पच्चीस मील से ज़्यादा की दूरी पर स्थित एथेंस पहुंचने से एक घंटा पहले ही म्रियमाण फ़ीडिपीडीज़ मृत्यु को प्राप्त हो चुका था। किंतु वह तब भी दौड़ता रहा था। मृतावस्था में दौड़ता रहा था।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
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