Sunday, August 9, 2026
होमकवितासन्तोष खन्ना की कविता 'तलाश'

सन्तोष खन्ना की कविता ‘तलाश’

तलाश थी मुझे
हरितिमा-सी मानवता की
बरसाती बुद्ध-सी करुणा
जो धरती से अम्बर
अहिंसा का दामन लहराती
मन के बाहर और अंदर

लो अचक अचानक
फूटी फिर एक नये युद्ध की विभीषिका
करती चहुं ओर
विनाशक मिसाइलों की बौछार
दागी जा रही करने शिकार
स्कूल में पढ़ती निर्दोष बच्चियां

अस्पतालों में रोगी
रसोई में खनकती चूड़ियां
भक्ति भावना में रत योगी
छोड़े जा रहे हैं ड्रोन
ध्वस्त करने वह सभी
जो भी आता उनकी जद में

इमारतें, शहर, गांव
खेत खलिहान
तेल के कुएं या खदान
नहीं हैं सुरक्षित
समुद्री जल शोधन संयंत्र
सब हो रहे हैं ध्वस्त

जीवनदायिनी नदियां
या सिंधु पर तैरते पोत स्वतंत्र
कांप रही धरा थर-थर निरंतर
ज़मींदोज़ किये जा रहे विध्वंसक
नहीं रहे सुरक्षित अब
बमों से बचाने वाले बंकर।

भयग्रस्त प्रकृति दुबकी है
क्षितिज के अनजान छोर पर
नहीं बची कहीं दया या विवेक
पगला गया है धरती का आदमी
बुला रहा अपना विध्वंस विनाश
हथियारों से पटा दिया अंबर

प्रस्तुत हो रहा एक दृश्य भयंकर
कहां हो दयावान प्रभु, हे शंकर!
बचा लो मानव और मानवता
धरा पर रहे केवल
शिव तत्व का साम्राज्य
न रहे कोई कांटा न कोई कंकर।।

  • सन्तोष खन्ना (वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर)
    प्रधान संपादक- महिला विधि भारती पत्रिका
    मो. 9899651272
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest