Saturday, April 18, 2026
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प्रमिला वर्मा की कलम से – शैलेन्द्र: शब्दों के शिल्पी और आत्मा से उपजी कविता

किसी एक कोने में बैठा एक शख़्स…. आँखों में हलकी उदासी, होंठों पर धीमी मुस्कान, और जेब में महज़ रेल की नौकरी की तनख्वाह। मगर दिल में लावा…सी कोई बेचैनी, जो दुनिया को कह देना चाहती थी … कि ज़िंदगी गीत बन सकती है, अगर कोई उसे सुनने वाला हो।
वह शख़्स था शंकरदास केसरीलाल ‘शैलेन्द्र’, और उसकी आवाज़ वो कविता थी, जो हिंदी सिनेमा के पर्दे से उतरकर लोगों के जीवन का हिस्सा बन गई।
शैलेन्द्र …..हिन्दी सिनेमा के उन बिरले गीतकारों में गिने जाते हैं जिनकी कलम से निकले शब्द सीधे दिल की ज़मीन पर उतरते थे। उनके गीतों में वह सादगी थी जो गांव की मिट्टी से आती है, वह भावनात्मक गहराई थी जो श्रमिक की आंखों से झांकती है, और वह जनमानस से जुड़ाव था जो किसी विचारधारा से नहीं, बल्कि इंसानियत की बुनियाद से जन्म लेता है।
पैसे से नहीं, आत्मा से चलती थी कलम…..
 सवाल उठता है कि क्या शैलेन्द्र पैसे के लिए नहीं लिखना चाहते थे, तो इसका उत्तर किसी एक पंक्ति में नहीं समेटा जा सकता। यह उस ज़मीन की बात है जहाँ कलम पैसे के लिए नहीं, आत्मा की पुकार के लिए चलती थी। यह उस दौर की बात है जब शब्दों को बिकाऊ बना देने का दबाव था, मगर कुछ लोग अब भी उन्हें पूजा की तरह जिया करते थे।
शब्द !उनके लिए केवल सजावट नहीं थे … वे आत्मा के ताप और युग के तनाव से जन्मे हुए जीवित तत्व थे। शैलेन्द्र के गीतों में भले ही फिल्मी परिधान हो, पर उनके भीतर किसान का पसीना ,धूल, मज़दूर की थकन, और प्रेमी की सच्ची तड़प धड़कती थी।
शैलेन्द्र के जीवन और उनके लेखन का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए, तो साफ़ दिखता है कि उन्होंने कभी भी बाज़ार की चमक को अपने विचारों पर हावी नहीं होने दिया। वे गीत ज़रूर फिल्मों के लिए लिखते थे, पर उनकी आत्मा किसी मजदूर की आह, किसी प्रेमी की पुकार, या किसी क्रांतिकारी की चेतना से जुड़ी होती थी। उनके शब्दों में नाटक नहीं, जीवन था … और वह भी ऐसा जीवन जिसे समझने के लिए केवल आंखें नहीं, संवेदना चाहिए।
वे उन बिरले रचनाकारों में थे, जिनकी कलम जब चलती थी तो बाज़ार ठहर जाता था और मनुष्य बोलने लगता था।
जलता है पंजाब…
और राज कपूर से पहला परिचय
रेलवे की नौकरी करते हुए एक शाम जब श्रमिकों की हलचल, धुएँ और धूल के बीच शैलेन्द्र की कलम से “जलता है पंजाब” निकली, तो वह केवल एक कविता नहीं थी … वह जलते हुए समय की चीख थी। यह रचना उन दिनों की थी जब देश बँट चुका था, और पंजाब की धरती पर लहू रिस रहा था। शैलेन्द्र ने उस पीड़ा को अपनी कविता में उकेरा था, जैसे कोई अपने ही शरीर पर लगी चोट को शब्द दे रहा हो।
यह कविता किसी नाटकीय मंच से नहीं, बल्कि भीतर की टीस से उपजी थी। और जब वह कविता अभिनेता-निर्माता राज कपूर तक पहुँची, तो वे चौंक उठे। उन्होंने महसूस किया कि यह वह आवाज़ है जिसे उनका सिनेमा ढूँढ़ रहा था… सच्ची, बेबाक और जलती हुई। उन्होंने शैलेन्द्र से निवेदन किया कि इस कविता को अपनी फिल्म में उपयोग करना चाहते हैं।
लेकिन शैलेन्द्र ने विनम्रता से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, “यह कविता मेरे लिए व्यापार नहीं, भाव का संकल्प है। यह मेरा निजी प्रतिकार है … इसे बेचा नहीं जा सकता।”
उनके लिए कविता केवल कला नहीं, आत्मा की प्रतिध्वनि थी। “जलता है पंजाब” उनकी चेतना की साक्षी थी, जिसे किसी रुपये-पैसे या सिनेमा की चमक के नीचे रखा नहीं जा सकता था।
राज कपूर यह समझ गए … या शायद तभी उन्होंने समझना शुरू किया कि शैलेन्द्र जैसे लोग सिर्फ गीतकार नहीं होते, वे समय के दस्तावेज़कार होते हैं।
कुछ समय बीत गया। फिर जब राज कपूर बरसात बना रहे थे, उन्होंने एक बार फिर शैलेन्द्र को आमंत्रित किया। इस बार कोई सौदा नहीं था, कोई कविता नहीं खरीदी गई … एक दोस्ती ने रास्ता बनाया। शैलेन्द्र ने कहा, “गीत लिखूँगा, लेकिन केवल अगर मैं महसूस करूँ कि उसमें कुछ कहने को है।”
राज ने सिर झुका दिया। और फिर जन्मे वे गीत जो आज भी बरसात की पहली बूंद में कहीं सुनाई दे जाते हैं ….
“बरसात में हमसे मिले तुम सजन,”
“पतली कमर है, तिरछी नजर है,”
और न जाने कितने मन के धागों से बुने गीत, जिन्होंने हिन्दी सिनेमा को केवल गीत ही नहीं दिए ,संवेदना भी दी।
यहीं से शुरू हुई वह साझेदारी जो हिन्दी सिनेमा की सबसे भावनात्मक और कलात्मक रचनात्मक जोड़ी में तब्दील हो गई । राज कपूर और शैलेन्द्र।
प्रगतिशील चेतना और अटूट सिद्धांत
शैलेन्द्र केवल एक गीतकार नहीं थे …. वे उस समय की आत्मा की आवाज़ थे, जब भारत आज़ादी की सच्ची परिभाषा ढूँढ़ रहा था। वे उन विरले कलाकारों में से थे जो शब्दों को सिर्फ सजाते नहीं थे, उन्हें सामाजिक विवेक और जीवन-दृष्टि से सींचते थे।
वे प्रगतिशील लेखक संघ और इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) जैसे सांस्कृतिक आंदोलनों से गहराई से जुड़े हुए थे । जो लेखन को केवल सौंदर्य नहीं, सामाजिक हस्तक्षेप मानते थे। उनकी कविता, उनका गीत, उनका हर वाक्य … जनमानस की पीड़ा से जन्मा था, और उसी की ओर उन्मुख भी।
उनके गीतों में कविता का प्रवाह स्पष्ट दिखाई देता है। 
शैलेन्द्र के गीत केवल संगीत के लिए रचे हुए वाक्य नहीं थे …. वे भीतर के अनुभवों से जन्मी हुई कविताएं थीं, जो सुरों में बहकर जन-जन तक पहुँचती थीं। उन्हें केवल सुना जाना नहीं चाहिए, उन्हें पढ़ा जाना चाहिए ….. शब्दों की गहराई में उतरकर, अर्थ की परतों को छूकर।
“हरि ने जनम लिया राधा री…”
यह कोई पारंपरिक भक्ति गीत नहीं है; यह राधा के हृदय में उठती हलचल है, एक आध्यात्मिक प्रेम की सघन अनुभूति।
“मैं गाऊँ तुम सो जाओ…”
यह सिर्फ़ लोरी नहीं, माँ की थकी हुई आत्मा का कोमल स्पंदन है, जिसमें जीवन की कठोरता के बीच भी कोमलता बची रहती है।
“जिंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या…”
यह एक दार्शनिक दृष्टिकोण है, जो अस्तित्व और भ्रम के बीच झूलती हमारी चेतना को छूता है। यह वही स्वर है जो कबीर की उलटबांसियों से, और ग़ालिब की शायरी से संवाद करता है।
इन गीतों में न केवल लय और छंद है, बल्कि प्रतीकों की वह दुनिया है जो कविता का प्राण होती है। उनका हर गीत एक जीवन-दर्शन, एक अनुभव, एक अंतर्यात्रा है।
जनमानस से जुड़ी कविता और सामाजिक चेतना दर्शाती है।
शैलेन्द्र की कविता सिर्फ़ साहित्यिक मंचों की बौद्धिक खुराक नहीं थी ….. वह सड़कों पर गूंजती थी, चाय की दुकानों पर गुनगुनाई जाती थी, और रिक्शे वालों के होंठों पर उतर आती थी। वे शब्दों के कवि नहीं थे, जीवन के कवि थे।
उनका गीत “मैं नैना झुका दूँ तो मन मान लो…” सिर्फ़ प्रेम निवेदन नहीं, भारतीय लोकगीतों की उस परंपरा का हिस्सा है जहाँ संकोच, लज्जा और अनुराग एक ही साँस में मिलते हैं। यह गीत नायिका के मन का वह कोना है जहाँ शब्द कम होते हैं, और भाव अधिक।
लेकिन वहीं जब वह लिखते हैं ……
“हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे…”
तो यह गीत नहीं, आंदोलन बन जाता है। यह कविता नहीं, क्रांति की घोषणा है। इसकी जड़ें फ़ैज़, मजाज़, और गोरख पांडे जैसे कवियों की परंपरा में हैं …. मगर इसकी शाखाएँ किसी भी आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में फैली हुई हैं।
शैलेन्द्र के गीतों में विचारधारा है, लेकिन वह थोपी हुई नहीं ….. वह भीतर से उगी हुई है। वह कोई प्रचारक नहीं थे; वे संवेदनाओं के दस्तावेज़कार थे। उनका हर गीत जैसे अपने समय की आत्मा में दर्ज एक पंक्ति हो।
शब्द जो बहते हैं, बिकते नहीं
शैलेन्द्र की कलम का जादू केवल व्यक्तिगत भावनाओं या प्रेम के चित्रण तक सीमित नहीं था। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ को भी उतनी ही सघनता और सरलता से छुआ। चाहे वह “अवारा हूँ” की बेचैनी हो या “धरती कहे पुकार के” का सघन आत्मबोध … हर गीत मानो अपने समय की नब्ज़ पर हाथ रखता है।
उनकी कविता में सामूहिक स्मृति और निजी अनुभूति का अद्भुत संयोग दिखाई देता है। “मेरा जूता है जापानी” जैसी पंक्तियाँ मज़ाक में कहती हैं, लेकिन उनमें एक गहरी राजनीतिक व्यंग्यात्मकता छिपी होती है …. विभाजन के बाद की भारतीय अस्मिता, राष्ट्रवाद और उपभोक्तावाद पर कटाक्ष भी।
शैलेन्द्र की कविताएं कभी सजावटी नहीं रहीं। वे बाज़ार के लिए नहीं, आत्मा की जरूरत के लिए लिखी जाती थीं। यही कारण है कि उनके गीत कालजयी हैं …. वे किसी एक फिल्म या संगीतकार से बंधे नहीं रहते, वे समय और पीढ़ियों की सीमाओं को लांघते हैं।
उनके गीतों की शक्ति इस बात में है कि वे लोक से जन्म लेते हैं और मनुष्य की आत्मा से संवाद करते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ गीत कविता बन जाता है …. और कविता लोकगीत।
उनकी लेखनी में वामपंथी विचारधारा का असर था, पर वह विचारधारा कभी घोषणापत्र नहीं बनती । वह प्रेम की तरह बहती है, करुणा की तरह टूटती है, और विद्रोह की तरह गूँजती है।
जब उन्होंने लिखा —
“हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे”
तो यह कोई कविता नहीं, बल्कि इतिहास की चुप दीवारों पर उँगलियों से खींची गई एक चेतावनी थी।
और जब उन्होंने लिखा —
“मेरे मन की गंगा और तेरे मन की जमुना का बहना,”
तो वह गीत केवल एक प्रेम-दृश्य का भावुक क्षण नहीं रहा, वह भारत की सांस्कृतिक सह-अस्तित्व की चिरकालिक कामना बन गया।
शैलेन्द्र किसी भी सच्चे कवि की तरह अपने विचारों के साथ समझौता करने को तैयार नहीं थे। कई बार उन्होंने फिल्मों को केवल इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वहाँ उन्हें लगा कि उनके शब्दों की आत्मा खो जाएगी … और आत्मा खोने से उन्हें डर नहीं लगता था, बल्कि उसे खोने से इनकार था।
वे बड़े निर्माता, मशहूर अभिनेता या चकाचौंध भरी दुनिया से प्रभावित नहीं होते थे। उनके लिए एक बात सबसे ऊपर थी …. क्या यह गीत मेरे भीतर की सच्चाई को सजीव कर सकता है?
अगर उत्तर ‘नहीं’ होता, तो वे न बोलते … भले ही वह प्रस्ताव लाखों रुपये का होता।
उनकी लेखनी का स्वाभिमान था ….. और यह स्वाभिमान किसी अभिमान से नहीं, एक कवि की आत्मिक जिम्मेदारी से उपजा था। उनका हर गीत ऐसा लगता था, मानो किसी किसान के हल की तरह खेत में सीधा उतरता हो, या किसी माँ की लोरी की तरह बच्चे के माथे को सहलाता हो।
शैलेन्द्र के लिए गीत केवल रचना नहीं थे …. वे आत्मा की पुकार थे। और आत्मा कभी समझौता नहीं करती।
‘तीसरी कसम’ और कलात्मक अखंडता की कीमत
शैलेन्द्र केवल कल्पनाओं के रथ पर सवार कोई स्वप्नदर्शी नहीं थे। वे ज़मीन की सच्चाइयों को पहचानते थे । उस धूल, उस पसीने, उस पीड़ा को जो एक आम इंसान की रोज़ की कमाई में छुपी होती है। पर जब उन्होंने तीसरी कसम बनाने का निर्णय लिया, तो यह निर्णय उन्होंने बाज़ार की आँखों में आँख डालकर नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की गहराइयों से लिया था।
यह केवल एक फिल्म नहीं थी … यह उनके भीतर के कवि का सबसे गहरा सपना था।
फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मारे गए गुलफ़ाम’ कहानी पर आधारित यह सिनेमा, एक ऐसा सेतु बन सकता था जहाँ भारतीय लोकजीवन की मिट्टी, शुद्ध प्रेम की आंच, और कविता की गूंज … सब एक साथ मिलते।
शैलेन्द्र ने इसे एक निर्माता के रूप में नहीं, एक साधक के रूप में रचा। उनके लिए यह व्यापार नहीं, तपस्या थी। पर यह तपस्या, अंततः उन्हें जला गई।
फिल्म बनी … सत्यजीत रे की शैली में, बिमल रॉय की आत्मा से … और यह एक कलात्मक मणि बनकर उभरी। राज कपूर और वहीदा रहमान की अभिनय-छाया में, शैलेन्द्र की आत्मा जैसे हर फ्रेम में बसी हुई थी। पर बॉक्स ऑफिस की निर्मम दुनिया ने इसे ठुकरा दिया।
यह फिल्म न चली। और न चलने के साथ ही टूट गई वह दीवार, जो उनके भीतर बाज़ार और विश्वास के बीच खड़ी थी।
वे कर्ज़ में डूबे, तनाव में घिरे, और धीरे-धीरे उस छवि की ओर बढ़ने लगे …. जिसे शायद कोई कवि नहीं देखना चाहता: आत्मसंदेह की छाया में झुलसता एक स्वप्नद्रष्टा।
1966 में, केवल 43 वर्ष की उम्र में, शैलेन्द्र इस दुनिया से चले गए। लोग कहते हैं कि उनकी मृत्यु का एक कारण ‘तीसरी कसम’ की विफलता भी थी …. पर यह असफलता नहीं थी, यह उस युग की विफलता थी जो एक ईमानदार कलाकृति को समझ न सका।
यह नहीं कि शैलेन्द्र को पैसे की ज़रूरत नहीं थी। वे रेलवे की नौकरी से आए थे, एक बड़ा परिवार था, और जीवन के रोज़मर्रा के संघर्ष उन्हें भलीभाँति ज्ञात थे। पर जब वे कलम उठाते थे, तो वह कलम बाज़ार की ओर नहीं, भीतर की ओर घूमती थी… आत्मा की परिधि पर चलती, वहाँ से शब्दों का दीपक जलाती।
उनका गीत —
“होठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है”
…. केवल एक पंक्ति नहीं, उनके पूरे जीवन की घोषणा थी।
या
“ज़िंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या”
… यह वह दार्शनिक स्पंदन था, जो शायद उन्हें भीतर से खा भी रहा था।
शैलेन्द्र कभी पैसे के विरोध में नहीं थे। वे जानते थे कि पेट की भूख सच्चाई है। पर वे इस बात को भी जानते थे कि आत्मा की भूख बड़ी होती है …. और जब कलम आत्मा की भूख से लिखी जाती है, तो वह बिकती नहीं, बहती है।
वह गंगा बन जाती है … जिसे न सोना खरीद सकता है, न सत्ता मोड़ सकती है।
शैलेन्द्र की कलम वही थी ….. एक नदी, जो प्रेम, श्रम, विद्रोह, और करुणा को अपने शब्दों में प्रवाहित करती थी।
वे जब लिखते थे, तो वह केवल गीत नहीं होता था …. वह मनुष्य के होने की सबसे मूल भावना होती थी।
और यह भावना, यह मन, कभी बिकाऊ नहीं होता।
शैलेन्द्र की कविता उस भारत की आवाज़ है, जो मिट्टी में पनपती है, ग़रीबी में गाती है, प्रेम में बहती है और संघर्ष में उठ खड़ी होती है। वह केवल शब्दों का शिल्पी नहीं था … वह आत्मा का कारीगर था।
शायद इसी लिए, उसकी कविता अब भी हमारे जीवन में धीरे-धीरे गूँजती है ….
एक माँ की लोरी में,
एक प्रेमी की पुकार में,
एक मजदूर की हिम्मत में,
और एक देश की अनकही स्मृतियों में।
शैलेन्द्र ! जिनके शब्द बिके नहीं, बहते रहे।
और बहते हुए अमर हो गए।
डॉ प्रमिला वर्मा
डॉ प्रमिला वर्मा
संपर्क - +91 73918 66481
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1 टिप्पणी

  1. निस्संदेह शैलेन्द्र एक बहुत ही उच्च कोटि के गीतकार थे। उनकी बनाई ‘तीसरी कसम’ भी एक अति सुंदर और गहन प्रस्तुति थी। दुर्भाग्यवश दर्शकों ने उसे उतनी तव्वजो नहीं दी जो संभवतः उनकी मृत्यु का कारण बनी। अच्छा होता यदि डा: वर्मा सिर्फ गीतों के मुखड़े ही नहीं बल्कि पुरे पुरे गीत उद्धरित करतीं। लेख के लिए धन्यवाद।

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