हे सांप, क्या बात है!

तुम भी हो गए टेक्नोसेवी,

मान लिया,

है तुम्हारा अपना बिल

दुनियाँ की चकाचौंध में

कहाँ लगे उसमें दिल

इसलिए तुम भी हो गए टेकनोसेवी

चट्टानों में लगे गर्मी

दलदलों की नरमी

झाड़ीयॉं हैं काँटेदार

रेंगना है दुशवार

इसलिए तुम भी हो गए टेक्नोसेवी

कायर तुम नहीं

कि

छुपो ऊँची लम्बी घासों में

दरख़्तों पे चढ़ना

है न तुम्हें स्वीकार

इसलिए तुम भी हो गए टेक्नोसेवी

फ़न फैलाकर देखते हो जब

शहरों की इमारतें

पहुँचे कैसे काले इरादों का विष

किया जाए कैसे किस

दरारें हैं नदारद

करते हो मिस

वो अपना धूर्त हिस

इसलिए तुम भी हो गए टेक्नोसेवी

मिल जाए गर इक मौक़ा

दे देते हो तेज़ तरार्र दिमाग़ों को धोखा

हा हा हा

हींग लगे न फटकरी रंग भी आए चौखा

इसलिए तुम भी हो गए टेक्नोसेवी.

अनिल गांधी
कवि, कहानीकार, विज्ञान विषयों के लेखक, समाचारवाचक, ब्रॉडकास्टर, थियेटर आर्टिस्ट और प्रशासक. आकाशवाणी में 1991 से 1995 तक प्रोग्राम इग्ज़ेक्युटिव के पद रहते हुए साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े रहे. मो:9968312359 ईमेल:gandhiak58@gmail com

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