प्रवीण झा ने युवा लेखकों के बीच बड़ी तेजी से अपनी एक ख़ास जगह बनाई हैपेशे से चिकित्सक हैं, लेकिन साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं। फिलवक्त नॉर्वे में निवास है। स्वप्रकाशन और किंडल के जरिये तीन किताबों के बाद इनकी चौथी इतिहास की किताब ‘कूली लाइन्स’ वाणी प्रकाशन से आई है और काफी चर्चा में है। सोशल मीडिया पर प्रवीण अच्छी-खासी प्रशंसक-श्रृंखला और अपना एक पाठक-वर्ग रखते हैं। साक्षात्कार श्रृंखला में आज युवा लेखक/समीक्षक पीयूष द्विवेदी ने प्रवीण झा से उनके निजी जीवन, अबतक के साहित्यिक सफर सहित हिंदी साहित्य को लेकर बातचीत की है।

सवाल – अपने अबतक के जीवन के विषय में बताइए ताकि हमारे पाठक आपसे ठीक प्रकार से परिचित हो सकें।

प्रवीण – मेरा जन्म पटना में हुआ, बचपन दरभंगा में बीता। उसके बाद मैं क्रमश: पटना, पुणे, शैम्पेन (अमेरिका), दिल्ली और बेंगलुरू में अध्ययन और व्यवसाय के सिलसिले में रहा। अब मैं कॉन्ग्सबर्ग (नॉर्वे) में विशेषज्ञ चिकित्सक (रेडियोलॉजिस्ट) हूँ। मैं अभी चालीस वर्ष से कुछ महीने दूर हूँ, और पुस्तकाकार हिन्दी लेखन का मुझे मात्र तीन वर्ष का अनुभव है।

सवाल – चिकित्सा के क्षेत्र में होते हुए साहित्य की तरफ मन कैसे मुड़ा? बचपन में ही इसकी बुनियाद पड़ गयी थी या बड़े होने पर इस क्षेत्र ने आकर्षित किया?

प्रवीण – साहित्य में रुचि ही नहीं, इसमें जीवन लगाने की इच्छा स्कूल से ही थी। लेकिन, साथ ही साथ विज्ञान से भी मोह था। शिक्षा-व्यवस्था कुछ ऐसी है कि एक ही राह पकड़नी होती है। अगर डॉक्टरी में हर सेमेस्टर में साहित्य का भी एक पर्चा होता, तो मैं जरूर चुनता। अकादमिक विषय तो नहीं था, लेकिन मैं नियमित साहित्य पढ़ता जरूर रहा जो आज तक चल रहा है। अब भी मैं बहुधा पाठक ही हूँ, लेखनी जो भी है वह पठन और अनुभव का ही प्रतिफल है।

सवाल – जहां तक मेरी जानकारी है, आपकी शुरुआती तीन किताबें किंडल और स्वप्रकाशन के जरिये आई हैं। इन किताबों के विषय में कुछ बताइये और इन तरीकों से प्रकाशन का अनुभव कैसा रहा?

प्रवीण – चार वर्ष पूर्व मैंने एक डायरीनुमा कथा-संग्रह लिखी। नाम रखा- चमनलाल की डायरी। लेकिन मैं नॉर्वे में था और मुझे मालूम नहीं था कि हिन्दी पुस्तकों की पांडुलिपि किसे भेजनी होती है, प्रारूप क्या होता है आदि। मैं सोशल मीडिया पर भी सक्रिय नहीं था। फिर मुझे एक वेबसाइट (एजुक्रिएशन) का पता लगा, जो किताब फीस लेकर छापती है, और ऑनलाइन पोर्टल पर डाल देती है।

हालांकि सिर्फ किताब का ऑनलाइन होना काफी नहीं होता, और संपादन के बिना किताब कच्ची रह जाती है। किन्डल के साथ भी यही समस्या है, लेकिन किन्डल प्रकाशन मुफ्त है। किताब चाहे जितनी भी बिके, पारदर्शी तरीके से हर महीने पैसे एकाउंट में आ जाते हैं। बाकी, यह तीनों प्रयोगात्मक और छोटे प्रारूप (सौ पृष्ठ) की किताबें ही थी, जिसे मैंने संपर्क होने के बाद भी संपादकों को भेजना जरूरी नहीं समझा। यह लेखन की रणजी ट्रॉफी या नेट-प्रैक्टिस ही कही जाएगी जब तक मंजे हुए कोच (संपादक) इनसे नहीं जुड़ते।

सवाल – हाल ही में आपकी किताब ‘कुली लाइन्स’ आई है, जो इतिहास पुस्तक है। इसकी विषय-वस्तु और रचना-प्रक्रिया के विषय में बताइये। रचना-प्रक्रिया की क्या कुछ चुनौतियाँ रहीं?

प्रवीण – ‘कुली लाइन्स’ भारत से उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में ले जाए गए जहाज़ी गिरमिटिया मजदूरों और उनके वंशजों का इतिहास है। यह इक्कीस भिन्न देशों में बसे भारतीयों का संदर्भ-सहित इतिहास है तो फ्रेम काफी बड़ा है। लेकिन अब ऑनलाइन आर्काइव और पुस्तकालय बनने से संदर्भ जुटाना बहुत सुलभ हो गया है। हाँ! वे भिन्न-भिन्न भाषाओं में हैं, और बिखरी हुई है, तो उसे समेटने में वक्त लगता है। कई बातें मिल कर साक्षात्कार से बेहतर समझ आती है।

यह भी हुआ कि इतिहासकार एक डॉक्टर से बातचीत के लिए सहज नहीं थे, और पहले मेरा ही साक्षात्कार लिया कि कुछ जानता भी हूँ या हवा में बातें कर रहा हूँ। जब उनके मानकों पर खरा उतरा, तभी बात की और दिल खोल कर बात की। यह काम ऐसा था कि इसमें मैं डूबता चला गया और देश-विदेश घूमते कुछ निजी अनुभव ऐसे रहे कि लगा कि यह कहानी गाँव-गाँव तक पहुँचानी जरूरी है। और इसमें मुझे नियमित संशोधन भी करते रहना चाहिए, और प्रवास पर चर्चा भी होती रहे। ‘कुली लाइन्स’ इस संवाद में बस एक सीढ़ी है।

सवाल – आज जब ज्यादातर नए लेखक कथा-कविता के साहित्य की तरफ उन्मुख हैं, आपने ऐसी ऐतिहासिक नॉन-फिक्शन लिखने का इरादा कैसे कर लिया? इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली?

प्रवीण – मैं पढ़ता अधिक नॉन-फिक्शन ही हूँ। लगभग अस्सी प्रतिशत किताबें उसी विधा की। दूसरी बात तो आपने कह ही दी। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें अभी हिन्दी में कम ही लोग हैं। कुर्सियाँ खाली हैं कि कोई भी लपक ले। मेरी किताब प्रकाशक के पास पहुँची और एक हफ्ते में उन्होंने हाँ कह दी। ऐसा ही मेरी अगली आने वाली कथेतर के साथ भी हुआ। कथा होती तो मैं कहीं भीड़ में पीछे खड़ा होता। एक से एक कथाकार है। मैं तो युवा लेखकों को कहूँगा कि इधर आइए, कुर्सियाँ-मंच सब खाली हैं। इतिहास, संगीत, विज्ञान, खेल, कला में अथाह है लिखने के लिए और पढ़ने के लिए।

सवाल – हिंदी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य को कैसे देखते हैं?

प्रवीण – हिंदी साहित्य का मेरी दृष्टि में अभी ‘रजत-युग’ है। स्वर्ण युग भले न सही। नित नए प्रयोग हो रहे हैं। बहुआयामी युवा लेखन हो रहा है। पाठक-वर्ग बढ़ता जा रहा है और पुस्तकों की उपलब्धता भी बहुआयामी हो गयी है। डिज़िटल से ऑडियो तक, पाँच सेकंड में किताब आपकी जेब में। आयोजन भी बहुत हो रहे हैं।

मैं एक महीने भारत गया, लगभग हर हफ्ते ही कार्यक्रम होते रहे, किताब की बात होती रही। प्रथम संस्करण दो महीने में खत्म हो गयी; जबकि मैं नया लेखक हूँ, बाहर रहता हूँ और कथेतर श्रेणी में किताब लिखी। मंजे हुए और देश में बसे कथाकारों की तो मुझसे दसगुणा अधिक व्यस्तता और पूछ होगी।

सवाल – हिंदी के तमाम नए लेखकों द्वारा अपनी रचनाओं में जिस तरह अंग्रेजी का अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा, उसपर आपकी क्या राय है? हिंदी साहित्य का भाषाई स्वरूप कैसा होना चाहिए?

प्रवीण – पाठक रूप में मुझे लिपि का बदलाव कुछ असहज करता है। अलग से पूरा वाक्य रोमन में लिख दिया जाए, तो पढ़ने में आसानी होती है। लेकिन देवनागरी शब्दों के मध्य यूँ यदा-कदा हुलकी मारते रोमन के शब्द पढ़ने कठिन लगते हैं। इसका हल यह है कि रोमन शब्द उच्चारणानुसार देवनागरी में ही लिखी जाए।

मैं लेखक रूप में सरल भाषा में ही लिखता हूँ, लेकिन पाठक रूप में अब ठीक-ठाक सीढ़ियाँ चढ़ ली हैं कि तत्सम्-बहुल गद्य भी सहजता से पढ़ लेता हूँ। और मेरा विचार है कि दोनो रहें। भाषा सिकुड़ती न जाए, बल्कि विस्तृत होती जाए। तत्सम्, तद्भव, देशज, विदेशज, अपभ्रंस, लोकभाषा सभी प्रयोग में लाने का प्रयास हो।

सवाल – आपको नहीं लगता कि आजकल के लेखकों के लेखन की ‘रेंज’ बहुत छोटी है याकि वे अपने आसपास या अनुभव-क्षेत्र से आगे देख ही नहीं पा रहे जिस कारण कमोबेश एक से विषयों पर आज का अधिकांश लेखन हो रहा है?

प्रवीण – ‘रेंज’ तो अनुभव के साथ ही बढ़ता है। लेखन के शैशव काल में आशा भी शिशु-तुल्य ही हो कि सीमित बिस्तर पर करवट लेगा, दृष्टि सीमित होगी लेकिन उसमें भी दर्शकों के लिए भिन्न आनंद होगा जो बुजुर्ग न दे पाएँगे। समय के साथ संतुलन और परिधि बढ़ती जाएगी। और अभी तो हिन्दी जगत में हर उम्र के लोग लिख ही रहे हैं। पाठक के पास हर ‘रेंज’ उपलब्ध है।

सवाल – पढ़ने को कितना समय दे पाते हैं और किस तरह की किताबें पसंद हैं?

प्रवीण – मैं प्रतिदिन दो से तीन घंटे नियमित पढ़ ही लेता हूँ। नौ बजे रात से बारह बजे रात तक। संगीत में मैं सुनते हुए रिफरेंस के लिए किताबें पढ़ता हूँ, जैसे जब कोई राग, वाद्य-यंत्र या कलाकार के प्रति जिज्ञासा हुई। इसलिए वे किताबें खरीदता भी रहता हूँ। अपने लेखन से संबंधित किताबें तो पढ़नी ही होती हैं। रोचक इतिहास की एक और किताब पर काम शुरू ही किया है, तो संदर्भ की कई किताबें जमा हो गयी हैं।

इसके अलावा मैं किन्डल पर कथा/उपन्यास छुट्टे समय में या सप्ताहांत में पढ़ पाता हूँ। लेकिन हफ्ते में एक तो पढ़ ही डालता हूँ। कविता तो मुझे वाचन का शौक है, वह कभी भी सामने दिख जाए तो बंद कमरे या खुले आकाश में बस शुरू हो जाता हूँ। मैं कवि न बन पाऊँगा, यह मालूम है। इसलिए कविता से विशेष मोह है, जैसे किसी अप्राप्य सुंदरी से होता है।

सवाल – नए-पुराने प्रिय लेखक-लेखिका?

प्रवीण – यतींद्र मिश्र, सुभाष चंद्र कुशवाहा, अशोक कु। पाण्डेय, नीलोत्पल मृणाल, पुष्य मित्र। हाल में सुशोभित सक्तावत और भगवंत अनमोल को पढ़ा और अच्छे लगे। प्रभात रंजन जी का प्रवाह सहज है। मनीषा कुलश्रेष्ठ जी की शिल्प और भाषा बहुत सुंदर है। गजेंद्र नारायण सिंह की संगीत पर किताबें तो मेरे लिए कोर्स की किताबों जैसी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी, अमृतलाल वेगड जी, अनुपम मिश्र जी, राही मासूम रज़ा, अज्ञेय, शिवानी, भीष्म साहनी, मोहन राकेश। प्रिय की सूची बहुत लंबी हो जाएगी, क्योंकि अप्रिय की सूची खाली है।

पीयूष – समय देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

प्रवीण – धन्यवाद!

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