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अरुण आशरी की कविता – श्री कृष्ण लीला

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शक्ति प्रतीक अष्टम तिथि, समय था आधी रात,
छाई थी घनघोर घटा,चरम पर थी बरसात,
चूंकि चंद्र प्रिय थी रोहिणी और रोहिणी नक्षत्र,
बुध को जन्मे कृष्ण तभी,बुध चंद्र थे उनके तात।
कृष्ण पक्ष की रात्रि में, फैला था अंधकार,
तम में था डूबा हुआ कंस का कारागार,
द्वार यकायक खुल गए,टूटी सब जंजीर,
कृष्ण रूप में जन्में तब श्री हरि के अवतार।
द्वार खुले,लीला रची,टूटा कंस का जाल,
काल गति प्रबल हुई,जो लिखी थी कंस के भाल,
कान्हा को वसुदेव ने,पहुंचाया नंद के द्वार,
जन्म दात्री देवकी,उसे रही यशोदा पाल।
ज्ञात हुआ सब कंस को,हुआ क्रोध से लाल,
शिशु कान्हा के वध हेतु,भेजे दैत्य विशाल,
लीलाधर की लीला के आगे,दैत्य हुए लाचार,
उनका फैला जाल था,बना उन्हीं का काल।
ग्वाल-बाल संग वन में खेले, गैया संग प्रेम अपार,
बंसी की धुन,झूमां उपवन, अद्भुत प्रेम प्रसार,
प्रेम-रस बरसात बंधी,अटूट प्रेम की डोर,
प्रेममयी जंगल हुआ,किया राधा ने श्रृंगार।
राधा रानी गोरी थी,और कन्हैया श्याम,
ऐसा रास रचाया,पड़ गया,रास रचैया नाम,
प्रेम प्रदर्शन से राधा के,कृष्ण बहुत अभिभूत,
पहले अपने नाम से,दिया राधा नाम को मान।
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, दिया गीता का उपदेश,
ढाल बने तुम धर्म की,अधर्म रहा न शेष,
युगांतर से गीता ज्ञान का,करते सब सम्मान,
कर्म प्रधानता मूल है,यही है मंत्र अशेष।
कृष्ण तुम्हारी लीलाओं का, मूल है अपरंपार,
धर्म-कर्म की वेदी पर,टिका है ये संसार,
तुम ही पूर्णब्रह्म हो,सर्वत्र हो तुम हे श्रेष्ठ,
वैकुंठनाथ,हे जगन्नाथ, है नमन तुम्हें शत बार।

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