औरत ब्रह्मा की देन है
वैसे तो हम सभी ही है
पर कहते है ब्रह्मा भी ना समझा पाया उसे
इसी लिए तो बेचारा शायद अकेला ही रह गया
सुंदरता भी है, ज़रूरी भी है
बिन साथी के ज़िंदगी अधूरी है
पर कुछ ख़ास ही है
फ़ैसला भी करना चाहती है
गलती भी करती है
कोई बात नहीं सबसे होती है
पर मानती नहीं
प्यार भी करती है
पर जताती नहीं ,
चाहती है ख़ुद ही समझो
हम तो सबकी बात समझते हैं
सबको प्यार करने लगेंगे
पर नाराज़गी तो उन्हें ही होगी,
ज़िद भी करती है कोई बात नहीं
सह लेंगे पर कहती है
मैं नहीं करती, मैं तो सहन शील हूँ
पता नहीं वो है या मैं हूँ
नज़ाकत भी है
पर बदन में
ज़ुबान में नहीं
प्यार की चाह करती है
पर साथ नहीं देती बढ़ाने में
बंधती तो है बंधन मै
पर बंधन में रहती नहीं
वादे तो करती है
पर निभाती नहीं
हक़ तो रखती है
पर बोझ नहीं
आशा करती है
हर चीज़ की
कुछ कहती है
कुछ नहीं कहती
पर नाराज़ रहती है
इच्छा जो पूरी ना हुई
सही तो कहती है
ईश्वर स्वरूप माना है
बिन कहे सब जानो
बिन कहे सब समझो
गलती ना करो
हमेशा हर जगह रहो
हाज़िर रहो पर दिखो नहीं
जब चाहूँ। दिख जाओ आ जाओ
औरत है अपना वजूद रखती
रखना भी चाहिये
पर यह जो दोहरी छाया है
इस जहां में
इक बाक़ी सब के लिए
और एक जिसको अपनाती है
उसके लिए।
बेचारा करे भी तो क्या करे
वो भी ब्रह्मा की देन है
यह भी ब्रह्मा की देन है
डॉ.सी.एम.भगत डॉ. सी.एम. भगत की कविता - औरत 3
(MD BHAGAT HOSPITAL)

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