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बर्मिंघम से डॉ. कृष्ण कन्हैया की कविता – अनाथ

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अपनी संस्कृति को
ओछा बताकर
गोरों को समृद्ध,
ऊँचा दिखाकर
कुछ ऐसे लोग हैं-
जो अपने आप को
कौवों की जमात में
हंस बताते हैं !
और
विदेशी तर्ज़ पर
हुँआ-हुँआ कर
रँगे सियार- सा
घने जंगलों से
भगाये जाते हैं
आधुनिक छद्म वेश
तज नहीं पाते
अपनी संस्कृति
परख नहीं पाते
दोनों परिवेशों में
लताड़े जाते हैं
कहीं नकारे,
कहीं दुत्कारे जाते हैं।
परिस्थितियों में सामंजस्य
बिठा नहीं पाते हैं लोग !
इसीलिये तो-
“अनाथ” कहाते हैं लोग!!

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