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इंदु बैराठ की कविता – कैसे अपनों की पहचान करूँ

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ढूंढू बिना स्वार्थ का वो रिश्ता, जिससे अपनी बात करूँ !
पहन मुखौटा घूम रहे सब, कैसे अपनों की पहचान करूँ !
कपट भरी इस दुनिया में ,किसका मैं विश्वास करूँ !
किससे कहूँ व्यथा अपनी,किस पर अब मैं आस करूँ !
दो धारी तलवार यहाँ सब ,किससे मन की बात करूँ !
छलने बैठा हर कोई यहाँ किससे निज एहसास करूँ!
मैं तो हर क्षण हर पग नई नीति का आभास करूँ !
खाती हर रोज हूँ धोखे ,फिर भी नित नया प्रयास करूँ !
किससे कहूँ व्यथा अपनी किस पर विश्वास करूँ
नहीं कोई ऐसा ,जिसे मैं अंतर्मन संवाद करूँ !
रोज  टूटता ह्रदय है मेरा , कैसे मैं ये घाव भरूँ !
इस क्षत विक्षत हुये ह्रदय से, कैसे आगे पाँव धरूँ !
ख़ुद को देती ढाँढस, ख़ुद से ही बस आस करूँ !
किससे कहूँ व्यथा मैं अपनी, किस पर मैं विश्वास करूँ !

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