Monday, June 17, 2024
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कमला नरवरिया की कविता – उपेक्षिता

कॉलेज की बाउंड्री
के बाहर बैठी रहने वाली
वह उपेक्षिता
जाने किस अपराध के लिए
अपनो द्वारा निष्कासित कर दी गई है
आए दिन सुनती रहती हूं
उससे जुड़ी अनगिनत मनगढंत कहानियां
पर कभी उससे सच पूछने
का साहस नही बटोर पाई
एक अदद छत
और पेट की भूख के लिए संघर्ष करती
वह उपेक्षिता
आए दिन बन जाती है
हवस के भूखे भेड़ियों का शिकार
अपनी तार तार होती अस्मत
को देख कर
बदहवास की हालत में
मन ही मन बडबडाती हुई
वह कोसती है उन दरिंदो
और अपनी बेवसी और दरिद्रता को
कॉलेज की बाउंड्री के
उस पार
चमचमाती कारो से
आने वाले
नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले
तथाकथित उच्च शिक्षित कहे
जाने वाले  प्राणियों को भी
नही दिखाई देती है उसकी वेदना
उस उपेक्षिता को
देख कर एक बात
तो समझ मे आई
हम कितना भी
सभ्य होने का ढोंग रच ले
लेकिन हम आज भी
उस आदिम युग में जी रहे है
जहां स्त्री पुरुष के लिए
महज एक देहभर है
कमला नरवरिया
कमला नरवरिया
संपर्क - skamla830@gmail.com
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