1- सेवानिवृत्ति
सेवानिवृत्ति के पैसों में से मधु और सुरेश ने अपने मकान में कुछ पुनर्निर्माण करवाया और नये सिरे से पूरा घर सजाया। फिर घर में एक छोटी सी दावत रखी जिसमें बेटी-दामाद, बेटा-बहू, मधु और सुरेश के भाई-बहन के परिवार ही आमंत्रित थे। सालों साल जिस घर में रहे थे, बच्चे उसका नया रूप देखकर आश्चर्यचकित रह गए! बिटिया बोली “मम्मा! ये हैंडीक्राफ्ट और न्यू स्टाइल का फ्यूज़न किससे डिज़ाइन करवाया? बहुत प्यारा लग रहा है! आर्किटेक्ट से मिलवाना भई ,अब तो हम भी उसी से काम करवाएँगे!”
मधु और सुरेश ने मुस्कुराते हुए एक-दूसरे की ओर देखा। फिर मधु ने कहा “हम दोनों ने अपनी अपनी पसंद और सपने को मिक्स एंड मैच करके सब डिज़ाइन किया है।”
“आप?आप दोनों ने? आपकी अपनी-अपनी पसंद और सपने! मतलब हमें तो कभी पता ही नहीं चला कि आप दोनों की पसंद और सपने ऐसे है!” अब बेटे ने चौंकते हुए कहा!
“हाँ! क्योंकि तब हमारी पसंद और सपने तुम दोनों का सुंदर और सुरक्षित भविष्य था! जब वो पूरा हो गया तो अब इसकी बारी आई!” सुरेश ने बेटे के कंधे थपथपाते हुए मुस्कुराहट बिखेरी।
दोनों बच्चों की आँखों में नमी और दिल में अजीब सी टीस उठने लगी!
2- उपहार
दिवाली के आसपास शहर में कई सारी सेल और प्रर्दशनियाँ लगती हैं। बहुत सस्ते दामों में कपड़े और अन्य घरेलू सामान वहाँ मिलते हैं। निम्न आय वर्ग के लिए ये बहुत काम की होती हैं। लावण्या को वहां से खूब सारे सामान के साथ बाहर आते देखकर उधर से गुज़र रही कुमुद आश्चर्यचकित रह गई। वो लपककर लावण्या के पास पहुँची और अपना सारा अचरज उंडेलते हुए बोली “अरे लावण्या! तुम यहाँ से शॉपिंग कर रही हो?”
लावण्या हँसी “हाँ कुमुद! कुछ बाँटने का सामान लेने आई थी!”
“तुम यहाँ से सामान लेकर बाँटती हो?” कुमुद ने कुछ हिकारत से कहा! “मैं तो सबको अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से ही चीज़ें देती हूं। हमारे ड्राइवर और नौकर चाकर साल भर इंतज़ार करते हैं हमारे गिफ्ट का!” उन्होंने गर्दन कुछ टेढ़ी करके शान बघारी।
“अच्छी बात है कुमुद! पर तुम्हीं ने बताया था ना पिछले साल कि तुम्हारे दिए हुए महंगे कपड़े उनके बच्चे दिन-रात लटकाए रहते हैं तो तुम्हें बुरा लगता है! तुम्हें पता है वो ऐसा क्यों करते हैं? दरअसल वो अपनी बस्ती में असहज महसूस करते हैं और उन्हें जल्दी से जल्दी पुराने करने की कोशिश करते हैं कुमुद ताकि अपने आसपास के माहौल में सहजता महसूस करें! तुम बताओ क्या फायदा ऐसे महंगे कपड़ों का जो मन भर कर पहने भी नहीं जा सकें!” लावण्या ने सामान गाड़ी में रखते हुए मुस्कुराते हुए आगे कहा “ये कपड़े और ज़रूरत का सामान पाकर उन्हें जो खुशी होती है वो अपने माहौल से जोड़े रखती है इसलिए यही इनके लिए उपयुक्त है।”
कुमुद की टेढ़ी गर्दन कुछ झुक सी गई।
3- विडंबना
“पापा पहले से तो बदल गये हैं ना मम्मी! फिर आप क्यों पुरानी बातों को दिल से लगाए बैठे हो? हमें कहते हो कि जो हो गया उसे छोड़ो और आगे की प्लानिंग करो और खुद से कुछ छूटता ही नहीं!” निक्कू कुछ खीजते हुए माँ को समझाने की कोशिश करने लगा।
“मैं पुरानी बातें लेकर नहीं बैठी! पर उनसे जो जीवन स्थाई रूप से प्रभावित हुआ उसे बदलना संभव नहीं है! बीस बरस जो मैंने घुट घुट कर और रो रोकर निकाले हैं उनका हिसाब कौन करेगा! मैं अपने मन में प्रेम, अपनेपन, सम्मान और अनुशासन जैसे गुण या यूँ कहूँ कि संस्कार लेकर आई थी उसे इन सब पर खर्च करती रही। और खाली होते जा रहे मेरे मन में,दिल में क्या भरा गया? गुस्सा, अविश्वास, अपशब्द, अपमान, पीड़ा का ज़हर! तो अब बीस साल में हमारे भीतर वही है जो हमें मिला! मैं ज़हरीली लगती हूं और तुम्हारे पापा अमृत लगते हैं तुम्हें!”
रिंकू की आवाज़ भर्राने लगी।
“पर हमारा क्या कुसूर है मम्मी? बचपन में पापा का गुस्सा देखा और अब आपकी चिड़चिड़ाहट झेल रहे हैं! जब इतने कष्ट थे तो बच्चे पैदा ही नहीं करने चाहिए थे आपको। या हमें लेकर अलग हो जातीं! या अब जब सब ठीक है तो शांति से रहो।
स्तब्ध रह गई रिंकू! नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली तो भई हाजी तो वही कहलाएगी ना!
मतलब अब भी समझौता उसे ही करना है!

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