जंगल में जन्मी
बढ़ती रही
झाड़ियों में खिली
जंगली गुलाब सी
भूरी गिलहरी सी
फुदकती रहती मैं
बियाबां में
यहाँ से वहाँ
दलदल किनारे खड़े
बेरी के पेड़ से
चुन-चुन कर खाए बेर मैंने
और तुम्हें पता है कि
मैं हुई वैसी ही स्वादिष्ट
कर्णफूल, कमरबंद और
मांग का टीका
सब बनाती फूलों से
और एक दिन फँसी ऐसे
तुम्हारे प्यार में
जैसे फंदे में फँसती है लोमड़ी
घर-बार छोड़
लिए 10 बकरियाँ और कुछ मुर्गियाँ
आ गई तुम्हारे घर
अगले ही दिन चमक उठा
आम और महुए की छाँव में बना
हमारा आशियाना
दोपहर खेत जोत लौटे तुम
और कलेवा खाकर
उस लिपे घर में तुमने
मुझपर बारिश कर दी थी
ख़ुशियों की
चाहे तुम थे कितने बलवान्
चिड़ई-चुनमुन सब गवाह हैं
मैं भोर में तुमसे पहली उठती
चाहे जमते अपनी बात पर
चट्टान की तरह
पिघला देती झट
चंद आँसू से

सुनो, कुछ सनकी से थे तुम
बस एक रंग था तुममें
जंगली प्रेम का
जब जलती मोटे आटे की रोटी
गुस्से में तुम कुत्सित शब्द थूकते
फ़िर तुरंत ठंढा होकर
उतावलेपन में ख़ूब प्यार करते
हाँ, मेला-मड़ई भी जब साथ ले जाते
मैं सचमुच निहाल हो जाती

सुनो, आज यंत्रवत जाती हूँ
नदी पर नहाने भी
पेड़ों की फुनगियों से
चिड़ई-चुनमुन भी
तुम्हें बुलाते रहते हैं
रात-दिन भौंकता नहीं
रोता है शेरू
दिन भर खटकर निष्प्राण है देह
चिबुक, गला, पेट
कोई नहीं स्पंदन
गोपनीय भी नहीं है नींद का रास्ता
पर हाँ, अबकी अकेली रात
तुम सबसे अधिक याद आते हो।
राष्ट्रवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाषा-विज्ञानी एवं बेस्टसेलर लेखक; विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। संप्रति – डिप्टी कमांडेंट, आईटीबीपी संपर्क - kamalkeekalam@gmail.com

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