होमकविताफागुन विशेष : महिमा श्री की कविता - अनुबंधों के दिन हैं... कविता फागुन विशेष : महिमा श्री की कविता – अनुबंधों के दिन हैं आये By Editor March 23, 2019 0 398 Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp महिमा श्री अनुबंधों के दिन हैं आये रंगों के दिन हैं आये भूल के अपने राग-द्वेष को गलबहियों के दिन हैं आये तू क्यों रुठा-रुठा सा है क्या कुछ टूटा-टूटा सा है। नाहक इतना शोक मनाये ! पतझड़ के दिन गये बावरें चमन का हर रंग बुला रहा है। टेसू फिर खिला खिला रहा है। नीला—पीला रंग–रंगीला फागुन लगता छैल-छबीला आ.. अंतरघट तक तुझे भीगो दूं ! हिय के सारे संताप मैं हर लूँ शिव सा चलो हम धूनी रमाये प्रीत के रंग में यूं रंग जाये अनुबंधों के दिन हैं आये फागुन है सबसे नशीला कहाँ मौसम ऐसा सजीला धर्म-जाति के भेद भुलाये अंनुबंधों के दिन हैं आये इंद्रधनुषी सपनों का मेला पंचम सुर में गाये कोकिला कुह कुह कर सब कह जाये अनुबंधो के दिन हैं आये.. Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp पिछला लेखडॉ. सविता सिंह की कहानी – ईर्ष्याअगला लेखशैलेश शुक्ला की तीन कविताएँ Editor RELATED ARTICLES कविता गुरदीप सिंह सोहल की पांच रचनाएं August 8, 2026 कविता डॉ नीलिमा पाण्डेय रचित गीतिका August 8, 2026 कविता सन्तोष खन्ना की कविता ‘तलाश’ August 8, 2026 कोई जवाब दें जवाब कैंसिल करें टिप्पणी: कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें! नाम:* कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें ईमेल:* आपने एक गलत ईमेल पता दर्ज किया है! कृपया अपना ईमेल पता यहाँ दर्ज करें वेबसाइट: Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment. Δ This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed. Most Popular कविताएँ बोधमिता की November 26, 2018 कहानीः ‘तीर-ए-नीमकश’ – (प्रितपाल कौर) August 5, 2018 आशुतोष कुमार की ग़ज़लें June 1, 2024 अपनी बात…… April 6, 2018 और अधिक लोड करें Latest हिंदी सिनेमा… विश्वसनीयता का अभाव! August 15, 2026 संगीत वीडियो ‘मन जन गण मन गाएगा’ लोकार्पित August 8, 2026 ज्योत्सना सिंह की लघुकथा- मैनहोल August 8, 2026 भारत में आरक्षण व्यवस्था: ऐतिहासिक आवश्यकता, समकालीन चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा August 8, 2026 और अधिक लोड करें