फागुन विशेष : महिमा श्री की कविता - अनुबंधों के दिन हैं आये 3

  • महिमा श्री

अनुबंधों के दिन हैं आये

रंगों के दिन हैं आये

भूल के अपने राग-द्वेष को

गलबहियों के दिन हैं आये

तू क्यों रुठा-रुठा सा है

क्या कुछ  टूटा-टूटा सा है।

नाहक इतना शोक मनाये !

पतझड़ के दिन गये बावरें

चमन का हर रंग बुला रहा है।

टेसू फिर खिला खिला रहा है।

नीला—पीला रंग–रंगीला

फागुन लगता छैल-छबीला

आ.. अंतरघट तक तुझे भीगो दूं !

हिय के सारे संताप मैं हर लूँ

शिव सा चलो हम धूनी रमाये

प्रीत के रंग में यूं रंग जाये

अनुबंधों के दिन हैं आये

फागुन है सबसे नशीला

कहाँ मौसम ऐसा सजीला

धर्म-जाति के भेद भुलाये

अंनुबंधों के दिन हैं आये

इंद्रधनुषी सपनों का मेला

पंचम सुर में गाये कोकिला

कुह कुह कर सब कह जाये

अनुबंधो के दिन हैं आये..

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