डॉ. सविता सिंह की कहानी - ईर्ष्या 3

  • डॉ. सविता सिंह

29 साल पहले की बात है सपना की उम्र भी 29 साल की ही थी ।दो छोटे -छोटे बच्चों की जिम्मेदारी और नौकरी के लिए घर से कदम बाहर उसने निकाले थे ।किस्मत भी कैसे खेल खेलती है !जिसे 20 साल तक कभी घर से बाहर नहीं भेजा गया, सहेज कर रखा गया ,उसी को आज नौकरी करने के लिए बाहर निकलना पड़ा ।बड़ी मजेदार बात यह है कि सपना को विश्वास था कि वह जहां भी जाएगी उसे नौकरी देने से कोई इनकार नहीं करेगा ।पता नहीं यह विश्वास कहां से आया ?लेकिन था और कई जगह जब उसने साक्षात्कार दिया शिक्षिका के पद के लिए तो उसे समझ में भी आ गया था कि वहाँ उसका होने वाला नहीं है ,क्योंकि पहले से ही सदस्यों का चुनाव हो चुका है ।यदि ऐसा ना होता तो शिक्षिका के पद के लिए भला कोई नर्सरी कक्षा वाले प्रश्न क्यों पूछता ?फिर भी उसने हार नहीं मानी और तमाम साक्षात्कार दे चुकने के बाद जब एक जगह महाविद्यालय में प्रवक्ता के पद पर रिक्त स्थान का आवेदन पत्र उसने भरा तब 16 लोग एक कक्ष में बैठे थे और उनके बीच में सपना साक्षात्कार के लिए तैयार थी ।बड़ा जोश था क्योंकि वह एयर फोर्स स्कूल में छोटी कक्षाओं को पढ़ा भी रही थी  और चाहत थी बड़े बच्चों को पढ़ाने की ।इसीलिए किस्मत आजमाने चली गई थी ।पुणे विद्यापीठ के हिंदी विभाग के अध्यक्ष ने तकरीबन 55 मिनट तक उसकी मनचाही विधा पर बोलने को कहा और उसने विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखित शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की जीवनी आवारा मसीहा पर जमकर बात की लेकिन उसी संस्था के अध्यक्ष ने एक प्रश्न बीच में ही दाग दिया….”अच्छा तो अब आप यह बताइए कि खुशवंत सिंह ने किसकी जीवनी को रसीदी टिकट कहा है ?”सपना को बिल्कुल भी आभास नहीं था उस ने तपाक से कहा ,”सर मुझे नहीं पता है!” बड़ी देर से उसकी हिंदी, उसके तौर तरीके अध्यक्ष महोदय देख रहे थे ,काफी प्रभावित थे इसलिए उन्हें एक प्रश्न का उत्तर न देने पर बात अखरी नहीं ।उन्होंने तुरंत कहा ,ठीक है लेकिन पढ़ लीजिएगा ,अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट। फिर क्या था !सपना का चुनाव हो गया और उसके बाद उसने अमृता प्रीतम की कोई भी किताब बिना पढ़े नहीं छोड़ी और परिणाम यह निकला कि बड़े-बड़े खत उसने अमृता प्रीतम जी को लिख डाले ।न जाने क्या कशिश थी उसके पत्रों में कि अमृता जी भी बिना उत्तर दिए ना रह पायीं और उन्होंने लिखा, “एक्नॉलेज योर  इंटरेस्ट टुवार्ड्स द बुक” ।अब क्या था ,सपना दिन दूनी रात चौगुनी मेहनत करने लगी और अपनी नौकरी में जान डालकर पढ़ाने लगी। चारों ओर उसकी तारीफ होने लगी ।उसे हौसला मिलने लगा और वह खूब मेहनत से अपने कार्य में तल्लीन हो गई ।अमृता की एक पुस्तक में उसने पढ़ा था कि जब इमरोज़ स्कूटर चला रहे थे तो अमृता पीछे बैठी हुई थीं,आकाशवाणी से घर जा रही थीं। अपनी उंगली से उन्होंने इमरोज की पीठ पर साहिर लिख दिया और इमरोज़ लिखते हैं कि आज भी पीठ पर वह घाव साहिर  का वैसे ही ताजा बना हुआ है ।
सपना अपनी नौकरी के साथ -साथ पढ़ाई में भी तल्लीन थी क्योंकि उसका विवाह स्नातक करके ही हो गया था ।उसने डबल एम.ए.,एम .फिल., पीएच .डी .सब कुछ नौकरी के दौरान ही किया। ऐसे में ढेरों संगोष्ठियों में भी हिस्सा लिया और अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए वह बिना किसी बात की परवाह किए दौड़ती रही। एक बार अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में उसकी मुलाकात एक ऐसे सज्जन से हुई जिसे ना उसने कभी पढ़ा था, ना देखा था। लेकिन जब उसने उनका वक्तव्य सुना तो बिना प्रभावित हुए ना रह सकी ।पता नहीं कुछ लोग जादुई व्यक्तित्व रखते हैं शायद ,इसीलिए सपना भी उनसे प्रभावित हुए बिना ना रह सकी।उम्र के 50 वें पड़ाव पर उसने अनुभव किया एक व्यक्तित्व में जितने गुणों को होना चाहिए उसे लगता था वह सभी गुण उस वक्ता में मौजूद थे ।अब क्या था! दिल की अपनी एक जुबान होती है जिसे कोई नहीं समझ पाता। लेकिन जिस दिल को जिस से कहना है वह समझ लेता है ।बस ऐसा ही कुछ हुआ और इस बार न जाने क्यों सपना संजीदा हो कर घर लौटी थी। उसे लगा कि ऐसे ही साथी की तलाश ताउम्र उसे थी पर मिला नहीं और आज जब मिला तो उसका साथ संभव नहीं! धीरे -धीरे बातचीत के दौरान सपना को पता चला कि एक आकर्षण उसके प्रति भी उन सज्जन को था ।लेकिन जितनी स्वतंत्रता अपनी बात व्यक्त करने  में उसे थी ,सपना ना कह पाई !होते करते धीरे -धीरे प्यार का इजहार तो हो गया लेकिन सपना महसूस करती कि उसकी हालत अमृता और साहिर जैसी थी ।अमृता को बहुत अधिक पढ़ लेने के बाद हर वक्त उसके मन में ऐसा एहसास बन गया था कि मानो वह स्वयं अमृता और इमरोज की तलाश में सदा जीवन बिताती रही। अब क्या था ,यह सज्जन तो उसके लिए किसी इमरोज से कम न थे ।मन भी कितना चंचल होता है ।सपना साकार होता नजर आया लेकिन सपना ने अपने सपनों को कभी जाहिर नहीं किया ,क्योंकि वह जानती है कि कोई भी पुरुष कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो एकाकी जीवन कभी बिताता नहीं!           जबकि नारी की बिल्कुल विपरीत स्थिति होती है। वह तब तक किसी के साथ नहीं जुड़ती ,जब तक इस बात की गवाही उसे ना मिल जाए कि वह केवल उसका है ।एक बार उसने जिक्र भी किया था कि आपके पास अच्छे- अच्छे साथी होंगे मेरी क्या अहमियत? तब उसे जवाब मिला था ,पुरुष की निगाहें हमेशा नए साथी की तलाश में रहती हैं। जबकि नारी एक साथी को पाकर वहीं रुक जाना चाहती है ।कितना सच कहा था !आज भी इस सच्चाई को सपना भुला नहीं पाई और सोचती रह गई कि वास्तव में पुरुष को नए रिश्तो में अगर इतनी रुचि है तो मैं क्यों बताऊं कि मुझे तुम पसंद हो ?फिर क्या था !बस व्यावहारिक बातों में ही सपना के दिन कटने लगे और सपना यह तलाश करने लगी कि वह कौन है ?जो उस व्यक्ति के नजदीक है जिसे वह चाहता है ?आखिर एक दिन राज खुल ही गया! वह व्यक्ति जहां रहता था ,वहीं पर एक उच्च पदासीन नारी का जिक्र अक्सर उस व्यक्ति की बातों में होता रहा और धीरे -धीरे सपना को यह विश्वास हो गया कि हो ना हो यही वह चरित्र है जिसके लिए वह अपनी बेचैनी समस्त संसार को दिखा देता है। कोई जान पाए  या ना जान पाए लेकिन प्यार करने वाले बराबर जान जाते हैं कि कौन किस से प्यार करता है ?अब क्या था ,सपना महसूस करने लगी कि अच्छा हुआ अपने प्यार का इजहार उसने नहीं किया !क्योंकि आज भी इमरोज़ की पीठ पर जो घाव ताजा़ है, उसी तरह का घाव सपना के दिलो-दिमाग पर छाया रहता ।प्यार बड़ा स्वार्थी होता है। वह किसी और को अपने प्रेमी के साथ बर्दाश्त नहीं कर पाता ।कितना भी समय आधुनिक क्यों ना हो जाए  ,पर  नारी ह्रदय आज भी अपने प्रेमी के साथ किसी का नाम लेना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। क्या है यह प्रेम ?क्यों होती है ऐसी ईर्ष्या? कोई समझ सका है इसे?शायद बहुत अपना कहने की ख्वाहिश में   ऐसी  ईर्ष्या जन्म लेती है ।लेकिन पुरुष इस बात को नहीं जान पाते। नारी हर काल में इस बात से वाकिफ रहती है कि इमरोज़ की पीठ पर घाव बहुत पीड़ा दे रहा होगा ।लेकिन कोई इमरोज़ यह नहीं जान पाता कि अमृता के दिल पर भी वही गुजरती है जो उसे नागवार गुजरता है। प्यार में ऐसी ईर्ष्या कोई नई बात नहीं है लेकिन वास्तव में इस घाव से बड़ा कोई घाव नहीं और इसकी दवा भी संभव नहीं। न जाने कितने युगों तक साहिर का घाव इमरोज़ की पीठ पर जन्म लेता रहेगा और अमृता यह जान भी ना पाएगी कि वह कितना दुख देता है ।काश ,सपना के इमरोज़ को भी इस घाव का एहसास हो जाता तो शायद सपना आज उस दर्द में जीवन ना बिताती।रात के दो बज चुके थे सपना को दूर से एक गीत की आवाज़ सुनाई दे रही थी,शायद कोई और भी था जिसे रात के सन्नाटे में किसी की याद आ रही थी और गाना धीरे-धीरे हवा में बहते -बहते सपना की नसों में गीत घुलने लगा था…चाँद को क्या मालूम चाहता है उसे कोई चकोर….।

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