शैलेश शुक्ला की तीन कविताएँ 3

  • शैलेश शुक्ला

एहसास होता है
चले आते हैं इन गलियों में अक्सर,
हम दीवानों की तरह
क्योंकि इस मिटटी में, अपना घर होने का ऐहसास होता है
तमाम साजों-सामान जोड़े हमने
ताकि खुश रह सकें शहर में
एसी की हवा में भी
पीपल याद आता है, मन उदास होता है
क्योंकि इस मिटटी में, अपना घर होने का ऐहसास होता है
रिश्ते तो बहुत बने शहर में, लेकिन
सबमे दूरियां है स्वार्थ की
दिल से मिटटी का रिश्ता
दिल के सबसे पास होता है
क्योंकि इस मिटटी में, अपना घर होने का ऐहसास होता है
बरसों शहर में रहकर भी
हम शहर के हो न सके
अपने गाँव, अपने कसबे में बिताया
हर लम्हा खास होता है
क्योंकि इस मिटटी में, अपना घर होने का ऐहसास होता है
शहर में, हम हैं या नहीं
ये सोचने की भी फुर्सत नहीं
गाँव में आकर ही
अपने होने का ऐहसास होता है
गुरु वंदना
मोबाइल सा हाल है, शिष्यों का सुन यार
गुरुमंत्र के सिम बिना, पड़ा रहे बेकार
अब तक था बिन ज्ञान के, जीवन में भटकाव
गुरु आशीष जब से मिला, तब से है ठहराव
पढ़ी कभी गीता नहीं, छुआ न कोइ वेद
गुरु-चरणों की धुल ने, खोल दिए सब भेद
गुरु चरणों की धुल बिन, और न कोई ठाँव
स्वर्ग-सरीखा सुख वहां, गुरु बसते जिस गाँव
शब्द सिखाये आपने, और शब्द प्रयोग
काव्य धरा बह चली, हुआ जो इनका योग
मीडिया
मीडिया के आजकल हैं ऐसे हालात
बिना लाभ कहते नहीं, ये कोइ भी बात
क्या कहें, क्या न कहें, कुछ भी कहा न जाए
दे दो पैसा हाथ में, कुछ भी लो कहलाय
कुछ लोगों का मीडिया, कुछ लोगों की बात
साठ-गाँठ के बाल चले, डोली औ’ बारात
चौथा खम्भा आजकल, बैठा बना महंत
जो भी देता दक्षिणा, उसको कहता संत
देख मीडिया का चलन, बुद्धि गई चकराय
सबसे ऊपर स्वार्थ है, देश भले जल जाए
(लेखक भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी में राजभाषा अधिकारी हैं)

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