Tuesday, June 9, 2026
होमकवितामनवीन कौर की कविता - मेरे पापा

मनवीन कौर की कविता – मेरे पापा

पापा …
कहाँ चले गए आप ?
हमें छोड़ कर
नन्हा अबोध बच्चा हूँ ना मैं ..

हो जाता था हर्षित, मुदित
पा स्नेहिल कोमल स्पर्श ,
शीश  पर आपका ।
विशाल सिंहासन सी गोद में बैठ
बन जाता था में राजकुमार ।

गुंजित होती है पापा
आज भी वह कर्णप्रिय पुकार ऽऽऽ
और मैं दौड़ पड़ता हूँ ,आँगन में बाहर ,
छत पर चढ़ जाता हूँ
और बगिया में ..
पकड़ कर मुख्य द्वार की सलाख़ें
खोजता हूँ दूर तक ,
तुम्हें, पापा ।

बन जाते हैं टिमटिमाते तारे ,
विस्तृत नभ पर –
औरों के पापा ,
जो चले जाते है ।

और मेरे पापा ?
बन गए हैं मनमोहक ,
अनुपम  नीलांबर पर
चमचमाते चाँदी के ओजपूर्ण ,
आलौकिक ,
श्वेत  गोल चंद्रमा ,
पूर्णिमा का चंद्रमा ।

अपनी स्नेहसिक्त ,
शुभ्र ज्योत्सना से
करते हैं मुझे सराबोर ,
अपनी  आशीषों से ।

और मैं ?
आत्मविभोर हो
निहारता हूँ ,
एकटक तुम्हें ,
पापा …

फिर से लुप्त हो जाते हैं ,
शनैः शनैः ,
पाने को
परमात्मा का सानिध्य ।
उस अंतरिक्ष में
कहीं दूर ।

बह चलती है अश्रु
धारा तब  आँखों से ,
खींचती  हुई मुखमंडल,
पर धूमिल रेखा …

देख मुझे शोकातुर
पुनः लौट आते हैं वह,
बढ़ते हुए
एक -एक कदम ।
भर लाते  हैं अमृत घट ,
चाँदनीका ,
उँडेल देते हैं मुझ पर ,
आनंद का मधुर रस ।

फिर – फिर मुस्कुराते हैं ।
सौम्य, शांत, मेरे पापा ।
चंद्रमा,
पूर्णिमा का चंद्रमा ।

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest