पापा …
कहाँ चले गए आप ?
हमें छोड़ कर
नन्हा अबोध बच्चा हूँ ना मैं ..

हो जाता था हर्षित, मुदित
पा स्नेहिल कोमल स्पर्श ,
शीश  पर आपका ।
विशाल सिंहासन सी गोद में बैठ
बन जाता था में राजकुमार ।

गुंजित होती है पापा
आज भी वह कर्णप्रिय पुकार ऽऽऽ
और मैं दौड़ पड़ता हूँ ,आँगन में बाहर ,
छत पर चढ़ जाता हूँ
और बगिया में ..
पकड़ कर मुख्य द्वार की सलाख़ें
खोजता हूँ दूर तक ,
तुम्हें, पापा ।

बन जाते हैं टिमटिमाते तारे ,
विस्तृत नभ पर –
औरों के पापा ,
जो चले जाते है ।

और मेरे पापा ?
बन गए हैं मनमोहक ,
अनुपम  नीलांबर पर
चमचमाते चाँदी के ओजपूर्ण ,
आलौकिक ,
श्वेत  गोल चंद्रमा ,
पूर्णिमा का चंद्रमा ।

अपनी स्नेहसिक्त ,
शुभ्र ज्योत्सना से
करते हैं मुझे सराबोर ,
अपनी  आशीषों से ।

और मैं ?
आत्मविभोर हो
निहारता हूँ ,
एकटक तुम्हें ,
पापा …

फिर से लुप्त हो जाते हैं ,
शनैः शनैः ,
पाने को
परमात्मा का सानिध्य ।
उस अंतरिक्ष में
कहीं दूर ।

बह चलती है अश्रु
धारा तब  आँखों से ,
खींचती  हुई मुखमंडल,
पर धूमिल रेखा …

देख मुझे शोकातुर
पुनः लौट आते हैं वह,
बढ़ते हुए
एक -एक कदम ।
भर लाते  हैं अमृत घट ,
चाँदनीका ,
उँडेल देते हैं मुझ पर ,
आनंद का मधुर रस ।

फिर – फिर मुस्कुराते हैं ।
सौम्य, शांत, मेरे पापा ।
चंद्रमा,
पूर्णिमा का चंद्रमा ।

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