रचनाकार ने बनाई थी
कितनी पवित्र, खूबसूरत, अप्रतिम रचना
कितना प्रसन्न था वह
अपनी रची दुनिया को देखकर
पर क्या हाल कर दिया इंसान ने
उस उत्कृष्ट रचना को रौंद कर.
आकाश गंगा में हर रोज
चांद तारों की महफिल सजती
सप्तऋषि मंडल भी हाजिर होते
कुछ सितारे जगमगाते
कुछ टिमटिमाते, कुछ मद्धम होकर भी मुस्कुराते
रोज आनंद का माहौल होता.
मानव ने फैलाया भयंकर प्रदूषण
अब तारों से भरा आकाश
कहीं नजर ही नहीं आता
अकेले रह गए चांद सूरज
भूले भटके नजर आ जाते
मंगल ,शुक्र, गुरु या शनि.
ऊंचे पर्वत बने थे देश के रक्षक
पर सैर के बहाने
उनमें भी लगा दिया कचरे का अंबार
शुद्ध, पावन हवा को कर दिया दूषित
हे मानव क्यों हो गया
तुम्हारा मन इतना प्रदूषित.
शुद्ध पावन नदियों का
किया तुमने बुरा हाल
गंगा मैली, जमुना काली करके
बाकी नदियों को भी किया बेहाल
कारखानों का रासायनिक कूड़ा
शहरों की गंदगी
जले अधजले शव
नदियों की भेंट चढ़ाते गए
स्वच्छ सुंदर जल को
विषाक्त बनाते गए.
घने जंगल ऊंचे देवदार
बने थे प्रकृति के संरक्षक
तुम तो उन्हें भी मिटाते गए
बन करके उनके भक्षक
सीमेंट कंक्रीट के जंगल बिछाकर
अपनी प्रगति दिखा रहे
प्रकृति का संतुलन बिगाड़ कर
विनाश को न्यौता दे रहे.
कब समझोगे मानव तुम
तुम्हारे आतंक, अत्याचार , दुष्कर्मों से
प्रकृति थक गई है
अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप,सुनामी
तुम्हें चेतावनी दे रही है
अपनी खतरनाक हरकतों
गुनाहों से बाज आओ
प्रकृति के कोप से
संसार के विनाश को बचाओ.
आदरणीय नरेन्द्र कौर जी?
पर्यावरण प्रदूषण से प्रकृति को जो नुकसान पहुँचाया जा रहा है उस और संकेत करती, सचेत करती, आगाह करती, आपकी बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
कब समझोगे मानव तुम
तुम्हारे आतंक, अत्याचार , दुष्कर्मों से
प्रकृति थक गई है
अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप,सुनामी
तुम्हें चेतावनी दे रही है
अपनी खतरनाक हरकतों
गुनाहों से बाज आओ
प्रकृति के कोप से
संसार के विनाश को बचाओ.
बहुत खूबसूरत और मानिखेज़
शब्द और विचारों से सजी रचना ।
बधाई हो
हार्दिक आभार आपका सूर्यकांत जी
आदरणीय नरेन्द्र कौर जी?
पर्यावरण प्रदूषण से प्रकृति को जो नुकसान पहुँचाया जा रहा है उस और संकेत करती, सचेत करती, आगाह करती, आपकी बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
कब समझोगे मानव तुम
तुम्हारे आतंक, अत्याचार , दुष्कर्मों से
प्रकृति थक गई है
अकाल, अतिवृष्टि, भूकंप,सुनामी
तुम्हें चेतावनी दे रही है
अपनी खतरनाक हरकतों
गुनाहों से बाज आओ
प्रकृति के कोप से
संसार के विनाश को बचाओ.
हार्दिक आभार आपका नीलिमा जी
बहुत सुन्दर प्रस्तुति किंतु क्या मानवीय विकास को अनदेखा करना चाहिए?
हार्दिक आभार विजय जी।विकास तो जरूरी है पर विकास के नाम पर पर्यावरण को प्रदूषित करना भी तो अनुचित है।