Tuesday, June 9, 2026
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गुरदीप सिंह सोहल की कविताएँ

(1)
आदमी रोज डरता रहा है।
आदमी रोज मरता रहा है।
मौत का कुछ पता नहीं।
आदमी रोज हरता रहा है।
हर पल हर जगह सामना।
आदमी रोज करता रहा है।
मौत आ जाने की आहट में।
आदमी रोज झरता रहा है।
सोहल का तन मिट जाएगा।
आदमी रोज घिरता रहा है।
(2)
जनता पी रही है जाम मिलता है।
जनता जी रही है जाम मिलता है।।
बाजार बंद है ठेका खुल रहा है।
पानी वानी नहीं जाम मिलता है।।
काम नहीं दाम नहीं खर्चे काफी है।
दाम मिलता नहीं जाम मिलता है।।
जेब खाली फिर भी मन करता है।
कोई तो ढूंढो यार जाम मिलता है।।
दिमाग खाली है पेट भी खाली है।
धाम मिलता नहीं जाम मिलता है।।
खाली दिमाग शैतान बन रहा है।
काम जगाना है जाम मिलता है।।
सड़क पे ट्रैफिक है बहुत गड्ढे हैं।
साइड नहीं मिली जाम मिलता है।।
फाटक बंद पड़ा है रेल आती नहीं।
कोई रुकता नहीं जाम मिलता है।।
पैट्रोल मंहगा बिजली झटका मारे।
कूलर चलता नहीं जाम मिलता है।।
कोरोना ने किस किस को मारा।
हिसाब करो सब इंतजाम लगता है।।
पैसा कमाया कहां लग गया सारा।
पूछ मत पूछेगा इल्जाम मिलता है।।
खरबूजा बन गई जनता बेचारी।
उस्तरे संग बंदर हज्जाम मिलता है।।
देश में जाम है जाम में देश गिरा है।
आगाज कहीं न अंजाम मिलता है।।
ठण्डा मिलता है सोडा मिलता है।
बोतल मिलती है जाम मिलता है।
मैदान में खिलाड़ी बहुत हैं खेलते।
बाॅल मिल कर भी जाम मिलता है।
सोहल जिंदगी में सब कुछ जाम है।
ये जाम कभी वो जाम मिलता है।।
(3)
अब तो राम नाम जप रे बंदे।
बेकार तेरी जिंदगानी जा रही है।
जिंदगी पल पल खत्म होगी।
बेकार तेरी जवानी जा रही है।
अब पछताय कुछ न होत है।
बेकार तेरी कहानी जा रही है।
बहुत भटक लिया जन्मों में।
बेकार तेरी रुहानी जा रही है।
तन भेंट हो रहा है कर्मों के।
बेकार तेरी कुर्बानी जा रही है।
सोहल की जिंदगी सपना है।
बेकार तेरी नादानी जा रही ह
(4)
पढ़ लिख कर ज्ञानवान हो गया है।
बंदा आजकल समझदार हो गया है।
सबके मुद्दों को सुलझा देता है।
बंदा आजकल मुख्तार हो गया है।
समाज में सबका नेतृत्व करता है।
बंदा आजकल सरदार हो गया है।
जो दिखता है वो बिकने लगता है।
गंदा आजकल व्यापार हो गया है।
हर बात में कला दिखाई देती है।
बंदा आजकल कलाकार हो गया है।
सोहल हर चीज को तोल लेता है।
बंदा आजकल असरदार हो गया है।
(5)
घर से चले थे सब मंजिल की ओर।
साथी घटते रहे कारवां मिटता गया।
कुछ कमजोर थे कुछ निराशावादी।
साथी मरते रहे कारवां मिटता गया।
कोई गिर गया कोई चल न सका।
साथी कटते रहे कारवां मिटता गया।
कोई खो गया कोई दिगभ्रमित हुआ।
साथी छंटते रहे कारवां मिटता गया।
खेलने वाले सब जीत नहीं पाते।
साथी तकते रहे कारवां मिटता गया।
मंजिल तक केवल एक पहुंच पाता।
साथी छूटते रहे कारवा मिटता गया।
एक कण से ही सब संभव होता है।
साथी टूटते रहे कारवां मिटता गया।
एक जुट होना होगा सब को सोहल।
साथी पटते रहे कारवां मिटता गया।
गुरदीप सिंह सोहल
Retd AAO PWD
हनुमानगढ़ जंक्शन
राजस्थान
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2 टिप्पणी

  1. आदरणीय गुरदीप सिंह सोहल सर!
    आपकी पाँचों कविताएँ(कुछ गजल जैसी लगी लेकिन ऊपर कविताएँ लिखा है) बहुत असरदार लगीं। दम है कविताओं में।
    आपकी पहली कविता में आदमी की स्थिति को बताया गया है की आदमी हर स्थिति में नुकसान में है।
    यह कविता कवि-मन का दुख है इंसान के दुख के प्रति। ऐसा लगा कि आखिरी ही सही, लेकिन एक पद में उस कमजोरी से बाहर निकलने की बात कही होती तो शायद कविता और अधिक सार्थक हो जाती।

    दूसरी कविता में आज की समय में नशे की प्रभाव को दर्शाया गया है। यह कविता वर्तमान की बहुत गंभीर विषय को इंगित करती है। स्थितियाँ जैसे चाहे जैसी हों, पैसा हो न हो, पेट भरे ना भरे। हमें याद है कई जगह कोरोना के समय में भी शराब के ठेके खुले हुए थे। लोग गाजर मूली की तरह कोरोना की धार से मर रहे थे पैसा पास में नहीं था, भोजन पास में नहीं होता,लेकिन लोगों को नशे की लत ठेके पर ले जाती थी। अंग 2 लाइन में खड़े रहते।
    आपकी यह कविता बहुत अधिक प्रभावित कर गई सारे नशा मुक्ति केंद्र फेल हैं।सरकार को इस बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सबसे अधिक पैसा इसी से मिलता है। जनता मरती रहे यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। लाभ का सौदा इंसानियत से कहीं ऊपर होता है सरकार की नजर में। कुछ पंक्तियां जो बहुत अधिक प्रभावित कर गई ं-

    जेब खाली फिर भी मन करता है।
    कोई तो ढूंढो यार जाम मिलता है।।

    दिमाग खाली है पेट भी खाली है।
    धाम मिलता नहीं जाम मिलता है।।

    सड़क पे ट्रैफिक है बहुत गड्ढे हैं।
    साइड नहीं मिली जाम मिलता है।।

    फाटक बंद पड़ा है रेल आती नहीं।
    कोई रुकता नहीं जाम मिलता है।।

    पैट्रोल मंहगा बिजली झटका मारे।
    कूलर चलता नहीं जाम मिलता है।।

    पैसा कमाया कहां लग गया सारा।

    देश में जाम है जाम में देश गिरा है।
    आगाज कहीं न अंजाम मिलता है।।

    सोहल जिंदगी में सब कुछ जाम है।
    ये जाम कभी वो जाम मिलता है।।

    तीसरी कविता
    किसी कविता भक्ति पद की तरह जो सचेत करती है। जिंदगी के अंत में काम से काम ईश्वर को याद कर लिया जाए।
    चौथी कविता में हल्का सा व्यंग महसूस हुआ अपनी चालाकी से इंसान कहाँ-कहाँ पहुँच जाता है!
    पाँचवी कविता में ‘कारवाँ मिटता रहा’ के माध्यम से बताया है कि किन-किन कमियों के कारण और किस तरह से लोगों का साथ छूटता रहा और एक-एक कर साथ छूऊ रहा।कारवाँ रूप में सब साथ चल रहे थे धीरे-धीरे कम होते गये।

    (5)
    घर से चले थे सब मंजिल की ओर।
    साथी घटते रहे कारवां मिटता गया।

    कुछ कमजोर थे कुछ निराशावादी।
    साथी मरते रहे कारवां मिटता गया।

    कोई गिर गया कोई चल न सका।
    साथी कटते रहे कारवां मिटता गया।

    कोई खो गया कोई दिगभ्रमित हुआ।
    साथी छंटते रहे कारवां मिटता गया।

    सभी कविताएँ अच्छी लगीं। बेहतरीन कविताओं के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।

  2. आपका हार्दिक धन्यवाद । आपने मुझे असरदार लिखने की प्रेरना दी है ।

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