आदरणीय गुरदीप सिंह सोहल सर!
आपकी पाँचों कविताएँ(कुछ गजल जैसी लगी लेकिन ऊपर कविताएँ लिखा है) बहुत असरदार लगीं। दम है कविताओं में।
आपकी पहली कविता में आदमी की स्थिति को बताया गया है की आदमी हर स्थिति में नुकसान में है।
यह कविता कवि-मन का दुख है इंसान के दुख के प्रति। ऐसा लगा कि आखिरी ही सही, लेकिन एक पद में उस कमजोरी से बाहर निकलने की बात कही होती तो शायद कविता और अधिक सार्थक हो जाती।
दूसरी कविता में आज की समय में नशे की प्रभाव को दर्शाया गया है। यह कविता वर्तमान की बहुत गंभीर विषय को इंगित करती है। स्थितियाँ जैसे चाहे जैसी हों, पैसा हो न हो, पेट भरे ना भरे। हमें याद है कई जगह कोरोना के समय में भी शराब के ठेके खुले हुए थे। लोग गाजर मूली की तरह कोरोना की धार से मर रहे थे पैसा पास में नहीं था, भोजन पास में नहीं होता,लेकिन लोगों को नशे की लत ठेके पर ले जाती थी। अंग 2 लाइन में खड़े रहते।
आपकी यह कविता बहुत अधिक प्रभावित कर गई सारे नशा मुक्ति केंद्र फेल हैं।सरकार को इस बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सबसे अधिक पैसा इसी से मिलता है। जनता मरती रहे यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। लाभ का सौदा इंसानियत से कहीं ऊपर होता है सरकार की नजर में। कुछ पंक्तियां जो बहुत अधिक प्रभावित कर गई ं-
जेब खाली फिर भी मन करता है।
कोई तो ढूंढो यार जाम मिलता है।।
दिमाग खाली है पेट भी खाली है।
धाम मिलता नहीं जाम मिलता है।।
सड़क पे ट्रैफिक है बहुत गड्ढे हैं।
साइड नहीं मिली जाम मिलता है।।
फाटक बंद पड़ा है रेल आती नहीं।
कोई रुकता नहीं जाम मिलता है।।
देश में जाम है जाम में देश गिरा है।
आगाज कहीं न अंजाम मिलता है।।
सोहल जिंदगी में सब कुछ जाम है।
ये जाम कभी वो जाम मिलता है।।
तीसरी कविता
किसी कविता भक्ति पद की तरह जो सचेत करती है। जिंदगी के अंत में काम से काम ईश्वर को याद कर लिया जाए।
चौथी कविता में हल्का सा व्यंग महसूस हुआ अपनी चालाकी से इंसान कहाँ-कहाँ पहुँच जाता है!
पाँचवी कविता में ‘कारवाँ मिटता रहा’ के माध्यम से बताया है कि किन-किन कमियों के कारण और किस तरह से लोगों का साथ छूटता रहा और एक-एक कर साथ छूऊ रहा।कारवाँ रूप में सब साथ चल रहे थे धीरे-धीरे कम होते गये।
(5)
घर से चले थे सब मंजिल की ओर।
साथी घटते रहे कारवां मिटता गया।
कुछ कमजोर थे कुछ निराशावादी।
साथी मरते रहे कारवां मिटता गया।
कोई गिर गया कोई चल न सका।
साथी कटते रहे कारवां मिटता गया।
कोई खो गया कोई दिगभ्रमित हुआ।
साथी छंटते रहे कारवां मिटता गया।
सभी कविताएँ अच्छी लगीं। बेहतरीन कविताओं के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।
आदरणीय गुरदीप सिंह सोहल सर!
आपकी पाँचों कविताएँ(कुछ गजल जैसी लगी लेकिन ऊपर कविताएँ लिखा है) बहुत असरदार लगीं। दम है कविताओं में।
आपकी पहली कविता में आदमी की स्थिति को बताया गया है की आदमी हर स्थिति में नुकसान में है।
यह कविता कवि-मन का दुख है इंसान के दुख के प्रति। ऐसा लगा कि आखिरी ही सही, लेकिन एक पद में उस कमजोरी से बाहर निकलने की बात कही होती तो शायद कविता और अधिक सार्थक हो जाती।
दूसरी कविता में आज की समय में नशे की प्रभाव को दर्शाया गया है। यह कविता वर्तमान की बहुत गंभीर विषय को इंगित करती है। स्थितियाँ जैसे चाहे जैसी हों, पैसा हो न हो, पेट भरे ना भरे। हमें याद है कई जगह कोरोना के समय में भी शराब के ठेके खुले हुए थे। लोग गाजर मूली की तरह कोरोना की धार से मर रहे थे पैसा पास में नहीं था, भोजन पास में नहीं होता,लेकिन लोगों को नशे की लत ठेके पर ले जाती थी। अंग 2 लाइन में खड़े रहते।
आपकी यह कविता बहुत अधिक प्रभावित कर गई सारे नशा मुक्ति केंद्र फेल हैं।सरकार को इस बुराई से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सबसे अधिक पैसा इसी से मिलता है। जनता मरती रहे यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। लाभ का सौदा इंसानियत से कहीं ऊपर होता है सरकार की नजर में। कुछ पंक्तियां जो बहुत अधिक प्रभावित कर गई ं-
जेब खाली फिर भी मन करता है।
कोई तो ढूंढो यार जाम मिलता है।।
दिमाग खाली है पेट भी खाली है।
धाम मिलता नहीं जाम मिलता है।।
सड़क पे ट्रैफिक है बहुत गड्ढे हैं।
साइड नहीं मिली जाम मिलता है।।
फाटक बंद पड़ा है रेल आती नहीं।
कोई रुकता नहीं जाम मिलता है।।
पैट्रोल मंहगा बिजली झटका मारे।
कूलर चलता नहीं जाम मिलता है।।
पैसा कमाया कहां लग गया सारा।
देश में जाम है जाम में देश गिरा है।
आगाज कहीं न अंजाम मिलता है।।
सोहल जिंदगी में सब कुछ जाम है।
ये जाम कभी वो जाम मिलता है।।
तीसरी कविता
किसी कविता भक्ति पद की तरह जो सचेत करती है। जिंदगी के अंत में काम से काम ईश्वर को याद कर लिया जाए।
चौथी कविता में हल्का सा व्यंग महसूस हुआ अपनी चालाकी से इंसान कहाँ-कहाँ पहुँच जाता है!
पाँचवी कविता में ‘कारवाँ मिटता रहा’ के माध्यम से बताया है कि किन-किन कमियों के कारण और किस तरह से लोगों का साथ छूटता रहा और एक-एक कर साथ छूऊ रहा।कारवाँ रूप में सब साथ चल रहे थे धीरे-धीरे कम होते गये।
(5)
घर से चले थे सब मंजिल की ओर।
साथी घटते रहे कारवां मिटता गया।
कुछ कमजोर थे कुछ निराशावादी।
साथी मरते रहे कारवां मिटता गया।
कोई गिर गया कोई चल न सका।
साथी कटते रहे कारवां मिटता गया।
कोई खो गया कोई दिगभ्रमित हुआ।
साथी छंटते रहे कारवां मिटता गया।
सभी कविताएँ अच्छी लगीं। बेहतरीन कविताओं के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई।
आपका हार्दिक धन्यवाद । आपने मुझे असरदार लिखने की प्रेरना दी है ।