है थका हुआ शहर मेरा
सुकूँ भरी एक रात हो,
शोर के पहरों से छुप कर
ख़ामोशियों  से बात हो l
उजालों के लिबास से
कुछ देर तो मुहं मोड़ लूँ,
हो चांदनी से गुफ़्तगू
शब-ए चुनर मैं ओढ़ लूँ l
पानी ही पानी है, फिर भी
हर नदी में प्यास है,
दीदार-ए-चांद की उसे भी
हर रोज़ ही तो आस है l
महफ़िल-ए-शब सज ज़रा
और चांदनी का रक़्स हो,
इतरा रही हो हर नदी
उसमें चांद का जो अक्स हो l
कोई सिरफिरी ठंडी हवा
पत्तों को आके चूम ले,
नशे में जैसे चूर हो
ये शज़र कभी तो झूम ले l
कुछ ख्वाबों को दिन में ढूंढते
सब चैन मेरा खो गया,
शब से ज़रा मिली नज़र
मैं थक कर के फिर से सो गया l
उजालों के अपने ऐब हैं
कुछ देर से आना सहर,
चांद यूँ ही खिला रहे
ऐ रात तू ज़रा ठहर
ऐ रात तू ज़रा ठहर l
नेहा वर्तिका एक कवयित्री , लेखिका और टैरो कार्ड रीडर हैं l ये स्विट्ज़रलैंड में रहती हैं और मूल रूप से लखनऊ की रहने वाली हैं l इनके कवितायेँ और लेख अलग अलग पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं और ये फेसबुक पर लाइव पोएट्री शोज़ में भी सक्रिय हैं l वर्तमान में ये पूर्ण रूप से साहित्य को समर्पित हैं और स्वयं की पहचान एक कवयित्री के रूप में बनाना चाहती हैं l मार्च २०२२ में इन्हे साहित्य में सक्रियता और योगदान के लिए 'स्वयं सिद्धा' सम्मान से भी सम्मानित किया गया l संपर्क - nvertika@gmail.com

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