रंजन ज़ैदी की कविता - अंधेरों से मत डरो 1
  • रंजन ज़ैदी

अंधेरों से मत डरो !
यातनाओं की अंधी गुफ़ा  का सिरा
धूप  के दरवाज़े पर खुलता है
मुहाने के उसपार सूरज है
सूरज के पास किरणों की पगडंडियाँ हैं
पगडंडियों पर क़दमताल करती हवाएं दोस्ती के इंतज़ार में हैं.
अंधेरों से मत डरो !
बहादुर, पहाड़ों को भी फाड़ दिया करते हैं
शाहीन हवाओं को भी चीर दिया करते हैं.
ज़लज़ला बनकर पहाड़ों को बिखेर दिया करते हैं.
गुफाओं में बैठकर कृषि-क्रांति ला देते हैं
तुम होमो-सेपियंस संभावनाओं के क्षितिज तलाश लेते  हैं.
अंधेरों से मत डरो !
मनुष्य आक्रामकता का प्रतीक है
आक्रामक असैनिक नौकरशाह तलवार नहीं उठाते
अच्छे लोहे से कीलें भी नहीं बनाते
न ही शराबघरों में युद्ध लड़ने का अभ्यास करते हैं
टिकाऊ साम्राज्य तो अयोग्य ऑगस्टस ने भी खड़ा कर लिया था.
अंधेरों से मत डरो !
तुम्हारे पास एशिआ का आर्थिक पावरहाउस है.
यूरोपीय पूंजवाद में कभी नहीं था
कोलम्बस का संघर्ष क्यों भूलते हो?
फर्डिनांड और महारानी इज़ाबेला ऋणी हैं
स्पेन की अमेरिका पर विजय का सारथी कौन था? सोचो तो सही!

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