भोर के सूर्य की
मैंने जब-जब अभिवंदना की
तब-तब आशीष-स्वरूप
मेरी झोली में
आ गिरीं
कुछ स्वर्णिम-रश्मियाँ
गोद हुई उजली निखर गई
रौशनी कण-कण में बिखर गई
दिन जगमगाता हुआ
प्रकाश-गीत गाता हुआ
झूमा औ नाचा
यकायक
संध्या-प्रस्थान पर
तम से भय खाता हुआ
मन थर्राता हुआ
और फिर
मेरे अंतस् में उगा एक सूर्य
शनैः-शनैः असंख्य रश्मि-पुंज
खिलखिलाने लगे हैं
अँधेरे अब मुझसे भय खाने लगे हैं।

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