Friday, April 17, 2026
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रुचि सिंह की कविता – संघर्ष

जो करते हैं संघर्ष,
उनमें न जाने क्या बात होती है।
ना होता है दिन, उनके लिए,
और, न कोई रात होती है।
तपन की आंच पर सुलगा पसीना,
जब निखरता है,
किसी का स्वप्न आकर यूं,
धरा पर तब संवरता है,
धड़कती धड़कनों में,
हौसलों की बरसात होती है..
जो करते है संघर्ष,
उनमें ना जाने क्या बात होती है।
ना बैठे ताकते रहते जो,
नदिया और नालों को,
ना ही जो दोष देते जग को ,
और उसके खयालों को,
बढ़ाकर हाथ लाते,
खींच गंगा को धरा पर जो…
उन्हीं से सृष्टि और सृष्टा की,
नियति साकार होती है…
जो करते हैं संघर्ष,
उनमें ना जाने क्या बात होती है।।
जो नजरें हैं,
नजारे है और नजरिए भी,
जो कश्ती है, तो नदिया है,
और किनारे भी,
फंसे मजधार भी जो,
उफ़ ना करते, सब्र रखते हैं,
उन्हीं से हौसलों की,
ये दुनिया आबाद होती है।
जो करते हैं संघर्ष,
उनमें न जाने क्या बात होती है।
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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय रुचि सिंह जी , संघर्ष करने वालों की हौसला आफज़ाई पर जितना लिखा जाए , कम है! बधाई इतनी प्यारी रचना के लिये , स्नेह भी !

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