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त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कविता – हम भी परहित करना सीखें

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सूरज अपनी नव-किरणों से
बिखरा देता जग में लाली ।
बूँदों के  मोती बिखराकर
बादल फैलाता  हरियाली ।।
धरती के उपकार असीमित
सबको दाना पानी देती ।
अपने आंचल के आश्रय में
सबके सारे दुःख हर लेती ।।
उपवन सदा सुगंध लुटाकर
सबकी सांसें सुरभित करता ।
खग-कुल मिलकर गीत सुनाता
सबके मन में खुशियां  भरता ।।
हम भी परहित करना सीखें,
मिलकर  सब पर नेह लुटायें ।
औरों के दुःख दर्द मिटाकर
इस धरती को स्वर्ग बनायें ।।
त्रिलोक सिंह ठकुरेला समकालीन छंद-आधारित कविता के चर्चित नाम हैं. चार पुस्तकें प्रकाशित. आधा दर्जन पुस्तकों का संपादन. अनेक सम्मानों से सम्मानित. संपर्क - trilokthakurela@gmail.com

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