Tuesday, May 28, 2024
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आभा खरे की दो कविताएँ

1- ख़ुदगर्ज़

जब-जब !
पाती हूँ ख़ुद को
आधी-अधूरी
बुझी और थकी सी
तब-तब !
कुछ यादें ले जाती है
वापस ,वहीं
तुम्हारे उस मकान में
जहाँ ,
न जाने कितनी छूट गयी हूँ मैं
और कितनी बिखरी सी पड़ी हूँ
यहाँ-वहाँ
इधर-उधर …!!

यूँ तो !
चलते वक़्त
समेटा था मैंने भी
बहुत कुछ
लेकिन नहीं जानती थी
कि !
अधिक से अधिक
तुमसे जुड़ी यादों
और
तुम संग बिताये पलों को
समेटने की जद्दोज़हद में
कितना खुद को छोड़े जा रही हूँ …!!
इस छूटने और समेटने को हमने
अपनी-अपनी सुविधा और ख़ुदगर्ज़ी के चलते
दे दिया था नाम मजबूरियों का
लेकिन !
न तो तुम समझ पाये
और न ही मैं समझ पायी
कि
दरअसल ….ये मजबूरियाँ
महज़ मजबूरी न होकर
इक सज़ा थीं
सपनों के उस आशियाँ के लिये
जिसे हमने मिलकर कभी
घर बनाया था ….!!!

2- जाल

वो बहेलिया था
जन्म से नहीं मानसिकता से
जाल बिछाना उसकी जरूरत है
या फ़ितरत ,
या शायद कुंठित कामनाओं का जरिया मात्र
क्या है , नहीं मालूम

सुनो स्त्री !
इस बार तुम्हारी बारी है
जाल में फँसने की
और तुम फँस भी गयी
लेकिन तुम उसे जन्नत समझ
ख़ुश होती रहीं
कुछ दिन तुमने जाल की सैर की
बहेलिये की शान में कसीदे पढ़े
उसे दुनिया का सबसे शानदार शख्स बताया
और फिर
जैसे ही उसने तुमपर अपना हक़ समझ
झपट्टा मारा
उसकी कुत्सित सोच के लिजलिजेपन ने अपना दबाव बनाना चाहा
तब तुम्हे एहसास हुआ कि
ये रूमानियत से सरसब्ज़ सैरग़ाह नहीं है ,
महीन फ़रेब से बुना जाल है
अब तुम चीख़ती हो , चिल्लाती हो
पूरी ताक़त से , ख़ुद में निहित अंतः शक्ति के
नुकीले दांतों से जाल काटती हो और
किसी तरह बाहर निकल आती हो
रोती हो और अवसाद से घिर जाती हो
फिर चेतती हो कि
बहेलिये को सजा मिलनी चाहिए…
और तब शुरू होती है क़वायद ….उसकी फ़ितरत की बखिया उधेड़ने की
इस उधड़न में तुम्हारे हाथों के साथ-साथ मन भी लहुलुहान होता है
लेकिन बहेलिया तो बहेलिया है
उसकी फ़ितरत जगजाहिर होने से …उसे कोई फ़रक नहीं पड़ता
वो कुटिल मुस्कान लिए चल देता है …कहीं और जाल बिछाने को
समय बीतता है
तुम्हारे आहत मन पर
वक़्त ,और कुछ अभिन्न अपनों का प्यार
मरहम रखता है
सब कुछ भुला दिया गया है
अब सब ठीक है
लेकिन एक प्रश्न है
जो खदबदाता है ….स्त्रीत्व की आँच पर
कि !
बेशक ईश्वर ने स्त्री को कमजोर बनाया हो
लेकिन एक अनूठी शक्ति से लैस भी किया है
वो जान लेती है
पुरुष की मीठी बातों में छुपी कुटिलता
आँखों में चमकती लोलुपता
और स्पर्श में कुंठित इरादों की लिजलिजाहट
फिर वो क्या था ????
जिसने तुम्हें इतना कमज़ोर कर दिया था
बहेलिये का रंग-रूप ?
शरीर सौष्ठव ?
ओहदा ?
रूपया पैसा ?
वो क्या था ?
जिसकी वजह से जाल तुम्हे जन्नत लगा था ???
हो सके तो जवाब देना !!!!!
आभा खरे
आभा खरे
संपर्क - khareabha05@gmail.com
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