आलोक कुमार मिश्रा की कविताएँ 3
  • आलोक कुमार मिश्रा

1- तुम न होतीं तो क्या होता
सोचता हूँ
तुम न होतीं तो क्या होता
रात होती दिन होता
बस इनके बीच
सुबह न होती
साँझ न होता
बेतरतीब जूझते मेरे मन में
विचार होते
योजनाएँ होतीं
लाखों उधेड़बुन चलते
बस आराम न होता
मैं लिखता बहुत कुछ
शांति से
पर लिखने को
पता नहीं क्या होता
नौकरी चलती रहती
तनख्वाह मिलती रहती
खर्च भी होता
पर इनका मकसद
क्या होता
उफ ! सच में
क्या होता?
2- प्रेम
जब प्रेम के बारे में सोचा था
पहली दफा
हो गया था लाल
जैसे कोई गुलाब।
जब पड़ा था प्रेम में पहली बार
क्या कहूँ,
दुनिया हो गई थी
निहायत खूबसूरत।
बज पड़े थे मृदंग
कण-कण और रोम-रोम में।
आज जब प्रेम में
डूबते-उतराते
निकल आया हूँ बहुत दूर
तब प्रेम बनकर आकाशगंगा
बहते हुये समस्त ब्रह्मांड से
उतर आई है
मेरे छोटे से हृदय में।
आज मैं और प्रेम
हो गये हैं एकमय।
3- आँखों की मशाल
अपनी बेटी को
सिखा रहा हूँ आँख मारना
जिससे वो एक झटके में ही
ध्वस्त कर दे उसे घेरने वाली
मर्दवादी किलेबंदी
उसे सिखा रहा हूँ आँखें मटकाना
कि वो देख सके तीन सौ साठ डिग्री
और भेद सके
चक्रव्यूह के सारे द्वार
उससे कह रहा हूँ कि वो
सोये तो खुली आँखों से
जिससे जान सके
कि अंधेरे में किस तरह
बेखटके चले आते हैं
दिन के कुछ देवता बनकर शैतान
उसकी आँखों के अंदर
मैं बना रहा हूँ एक सुरक्षा द्वार
जिसे पार करने से पहले
देनी हो हर किसी को परीक्षा
मैं उसकी आँखों में जला रहा हूँ
एक मशाल
जो जले और जला भी सके।
4- आशीर्वचन
जब छाई होती है निराशा
तब भी जा चुका होता है
अंधेरे का आधा पखवाड़ा
कुछ बीत चुका होता है
पतझड़ का अंधड़
उतरकर बैठ चुका होता है
हृदय की घाटी में
एक शांत कोहराम
अपने ही ओर आ रहा
आकाश से भीमकाय उल्कापिंड
देख मुँद चुकी होती हैं आँखें
अपने लोग ही बदल चुके होते हैं
अंजान चेहरों में
दिशायें भाग रही होती हैं
दूर हाथ छुड़ा कर
और हम खुद से भी
फिर भी यह तय होता है कि
यह सब शाश्वत नहीं
उम्मीद बनकर दिमाग में
कौंधा एक चेहरा
अनायास याद आया
एक विचार
खुली खिड़की से घर में
घुस आई बंसती हवा
काँधे पर महसूस हुआ
एक स्नेहिल स्पर्श या
हाथ लगी पिता की
संघर्ष भरी डायरी
सबकुछ कर देती है
व्यवस्थित और
जाती हुई निराशा दे जाती है
‘खुश रहो, बढ़ते रहो’ का आशीर्वचन।
5- हे मेरे उपदेशक
हे मेरे उपदेशक
हे ज्ञानदाता
स्वघोषित स्वयंभू
स्वयं में विधाता
कुछ मुझे सुनो तो
दूँ तुम्हें बता
कि तुममें भरी हुई है
सर्वकोटि मूर्खता।
6- क्या करें
वृक्ष की जलती चिता को
यज्ञ कहकर हंस पड़े वो
पक्षियों का आस टूटा
रो रहा जंगल समूचा …क्या करें
उफ! नदी को मात् कहकर
सोखते जलधार अक्सर
और खेतों के किनारे
रह गये तकते बेचारे…क्या करें
ये हवा है या जहर है
टूटता कैसा कहर है
किसके माथे दोष दें
काम कुछ का,सब सहें…क्या करें
भूमि के हृदय में रोपे बीज जो
बीज न थे,थे मगर बारूद वो
वह फसल पकने को है…क्या करें
अब धरा फटने को है…क्या करें।
7-देखना एक दिन
देखना एक दिन मैं
सिर्फ चलूंगा नहीं
बल्कि बहूँगा नदी की तरह
समेटते हुये आसपास को
छोड़ते हुये अपने आप को।
देखना एक दिन
उठूँगा मैं
हिमालय से भी ऊँचा
इसलिये नहीं कि
ऊँचाई कोई बेहतरीन चीज है
बल्कि इसलिये कि देख सकूँगा
हर एक को वहाँ से
और दे सकूँगा
आशीष निर्भयता का।
देखना एक दिन
रचूँगा मैं
कविताओं की एक ऐसी किताब
जिसमें सिर्फ मेरा नहीं
सबका अंश होगा।
देखना एक दिन
मैं दिखूंगा कहीं नहीं
फिर भी महूसस किया जाऊँगा
हवा में, गंध में, याद में, बदलाव में।
8- झूठ का महत्व
सच की महिमा
बहुत गाई गयी है
और नकारा गया है
झूठ के महत्व को
पर सच यही है कि
एक झूठ ने अब तक
चलाये रखी है दुनिया
बढ़ाये रखा है वंश बेल
क्योंकि
प्रसव की अनंत पीड़ा
हस्तांतरित नहीं की
किसी पीढ़ी की औरतों ने
अगली पीढ़ी की औरतों तक
उन्होंने हमेशा महज मातृत्व के
सुख को बयां किया।

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