अनु राठी की तीन कविताएँ 3
  • अनु राठी

1. वो ही गुरु कहलाये
“परेशानी में मन भटके
जब हिम्मत पस्त हो जाये
धूमिल हो सब रास्ते
परिस्थितिया हमे भटकाए
ऐसे में
नई राह दिखा
घोर अंधियारे जीवन मे
जो  प्रकाश ज्योति फैलाये
वो ही गुरु कहलाये…
जब जब शंशय में हो शिष्य
उसको नया आयाम दे
थक जाए जब चलते चलते
एक उत्साह और जान दे
अज्ञानता में ज्ञान का
जो दीप प्रज्वलित करवाये
वो ही गुरु कहलाये
ना अहंकार हुआ
कभी ज्ञान का
सरल सत्य का पाठ पढ़ाता
हो शिष्य का नाम जगत में
जिसके हृदय में बस यही
बात बस जाए
वो ही गुरु कहलाये
नर से नारायण तक की
जो पहचान हमे कराता
अच्छा बुरा है क्या
जो दुलार प्यार से समझाए
वो ही गुरु कहलाये
देखते में साधारण
किन्तु
असाधारण व्यक्तित्व जिनका
जिनके मार्गदर्शन से हम
एक एक पग बढ़ाये
धीरज धैर्य के पाठ से
जो दुख को सुख में
परिवर्तित करवाये
वो ही गुरु कहलाये
उच्च शिखर पर देख
शिष्य को
मन्द मन्द मुस्काए
द्वेष जलन की ना हो भावना
और मन प्रफुल्लित हो जाये
वो ही गुरु कहलाये …..
2. हां, कुछ लापरवाह बनना है मुझे
दो कदम धीरे धीरे ही सही
पर चलना है मुझे
अपनी दबी हसरतो में
रंग भरना है मुझे
हर परिधान
हर रंगों में
संवरना है मुझे
है फ़िक्र जमाने की
लेकिन
कुछ लापरवाह बनना है मुझे
हर इक रिश्ते को
दिल में संजोया मैंने
उन अपनों से
अपनों को
चुनना है मुझे
हाँ अब कुछ लापरवाह
बनना है मुझे
बीते हुए बसन्त बताते हैं
मेरे उम्र के पड़ाव को
थोड़ी और थम जा
ए जिंदगी
फिर से छोटा बच्चा
बनना है मुझे
3. मुझे आसमान दो
मैं जमीं हूँ
मुझे आसमान दो
मेरे सपनों को एक उड़ान दो
थक चुकी हूं जमीं पर रेंग रेंग कर
मेरे पँखो को परवाज दो
रंगों से लबरेज है मन की
गहराइयाँ
बस एक अदद मुझे कैनवास दो

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