Friday, April 17, 2026
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डॉ. प्रणव भारती की कविताएँ

1
आर्द्रता से होकर चौकन्नी देखा
उत्तुंग हिमालय की चोटी पुकार रही थी
उसने बंद किए अपने नेत्र
क्या और क्यों के भाव सिमटने लगे
मनोमस्तिष्क में !
पवन के वेग की हलचल को
समझते हुए
वह खड़ी रही
ताकते हुए
निर्मिमेष दृष्टि से —-
एक समर्पण का भाव ओढ़े!
जीवन और कुछ नहीं
एक समर्पण भर
इस कगार पर आकर
वह हिंडोले से बाहर निकलने की
चेष्टा कर रही थी !!
2
छलनी में से निकल गए
नन्हे-नन्हे कंकर-धूल-मिट्टी
लगा,सब साफ़ हो चुका है
अब केवल शुभ,शुभ्र भर
फिर भी
कुछ तो था
जो अटक रहा था
भीतर कहीं
एक चट्टान सी बना
ओह ! यह क्या?
चेतना हुई कुछ जागृत
पूरी की पूरी अभेद्य दीवार
खड़ी थी उसके सामने
न जाने ,कब से धूल,मिट्टी ,छोटे कंकर
एक पक्की दीवार बना चुके थे
जिसे
किसी भी छलनी से छानना
मुश्किल ही नहीं
असंभव था
उसने सोचा और
साथ ही अनेकों प्रश्नों की
सिलसिलेवार पंक्ति
उसके समक्ष
ठठाने लगी—–
एक और प्रश्न
उग आया —-अब?
3
आँखों के आकाश में उभरे
चमकते आँसू
पिरोते,एक माला
थर्राने लगे
कुछ कहने ,कुछ सुनाने लगे
संभवत:
बीहड़ में
उगने लगे थे
काँटों के साथ
कुछ कोमल पत्ते
क्या यह एक नई
शुरुआत थी?
4
उसने कहा था वह प्यार करता है
उसने भी स्वीकार किया था
प्यार होने,न होने की संभावनाओं के बीच
पसरने लगा एक जंगल
अचानक ही
उबलते सैलाब में
बहने लगा था सब कुछ
क्यों?कैसे?
कोई उत्तर न था
परिणाम स्वरूप
यही सतही लगा
नाटकीय प्यार का पटाक्षेप
बेहतर है
सन्नाटों को
बना लेना
अपना दोस्त
और अब
सन्नाटों से
हो गया है
गहरा प्यार !!
डॉ. प्रणव भारती
डॉ. प्रणव भारती
हिंदी में एम.ए ,पी. एचडी. बारह वर्ष की उम्र से ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. अबतक कई उपन्यास. कहानी और कविता विधा की पुस्तकें प्रकाशित. अहमदाबाद में निवास. संपर्क - [email protected]
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4 टिप्पणी

  1. प्रणव भारती जी की रचनाओं ने बहुत से प्रश्न समक्ष लाकर खड़े कर दिए है । हिचकोले खाते जीवन का बीहड़ जंगल में से गुज़रने का अहसास करवाती कविताओं ने मन मोह लिया ।
    हार्दिक बधाई पुरवाई में छपने की
    मधु गुप्ता

  2. आदरणीय प्रणव जी चारों कविताएं अत्यधिक गहराई लिए हुए,कविताओं में अनेक बिंब हैं, हर पाठक का आपकी कविताओं को
    आत्मसात करने का अलग अलग दृष्टिकोण होगा।

    आपकी पहली कविता में
    कवयित्री स्वयं एक हिमाच्छादित प्रदेश में खड़ी होकर एक हिमालय के शिखर को निहारते हुए मौसम की आर्द्रता को महसूस कर रही है, उसके नेत्र स्वतः बंद से हो गए हैं लगता है की हिमालय उसे पुकार रहा है , समर्पण भाव से भरी हुई सोचती है कि जीवन कुछ भी नहीं।
    अंततः प्रकृति में ही विलीन होना है

    दूसरी कविता में
    जिंदगी जब ढलान पर होती है तो लगता है कि अब हम निवृत हो चुके जिंदगी के कंकड़ पत्थर निकल चुके यानी की अपने कर्तव्यों से इति श्री कर चुके लेकिन फिर भी कभी कुछ अटकता चुभता सा हे
    ध्यान से देखने पर पाते हैं कि वह कंकर पत्थर मिलकर एक पहाड़ सा बन गए हैं, और रास्ता रोके हुए हैं, विभिन्न रूपों में, प्रश्न दर प्रश्न फिर उगते चले आ रहे हैं।जीवन का एक दर्शन

    तीसरी कविता कवयित्री लिखती है की आंखों में उभर आए अश्रु की मोती सी माला के शब्द फिर कुछ कहने लगे हैं, कुछ सुनाने लगे हैं आंखों के इस बीहड़ वन में दुखद यादों के साथ कुछ कोमल पत्ते भी दिखाई दे रहे हैं यह शायद आशा के नए मोती हैं
    बहुत सुंदर

    अंतिम कविता
    उसने कहा था प्यार करता है,स्वीकार भी कर लिया, मगर संभावनाएं वही,हो भी सकता था, और नहीं भी हो सकता था,इसी झंझावत में एक विचार सैलाब की तरह बहने लगा कसौटी पर, उत्तर नहीं मिला ,लगा सब सतही बनावटी ,अंततः प्यार का पटाक्षेप कर दिया
    बेहतर लगा सन्नाटो को दोस्त बना लेना।

    मानवीय उद्गारों की उत्तम प्रस्तुति डॉक्टर प्रणव भारती जी।
    कुन्ती

  3. प्रणव भारती जी! आपकी कविताएँ पढ़ीं।कविताएँ छायावाद के समीप लगीं। बहुत सहजता से समझने लायक नहीं लगीं। एक भ्रम है!एक उलझन है!!जिसमें कवि-मन घिरा हुआ है।
    कभी-कभी ऐसा होता है कि मनुष्य भीड़ में रहकर भी अकेला रहता है। और कुछ लोगों की ऐसी प्रवृत्ति रहती है कि अकेले रहकर भी वह अकेले नहींं होते। कुछ इसी तरह की नकारात्मकता इस कविता में हमें महसूस हुई। छायावाद वाद और रहस्यवाद सा महसूस हो रहा है पर हम समझ‌ नहीं पा रहे। कुल मिलाकर एक बात समझ में आई की कवि- मन इतना अधिक व्याकुल है कि वह स्थिर नहीं है।अनिर्णय की स्थिति में है ,असमंजस की स्थिति में है। और अपने आप को ऐसे मोड़ पर पाती हैं जहाँ से उसे कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई नहीं दे रहा।
    हमने सभी कविताओं को लगभग चार-चार बार पढ़ा लेकिन इससे अधिक हम और नहीं समझ पाए बल्कि हमने कुंती जी की टिप्पणी भी पढ़ी है। पर उसके बावजूद भी जो हमारे अपने विचार हैं उनमें कोई परिवर्तन हमें महसूस नहीं हुआ। अगर ऐसा ही है तब तो कोई बात नहीं लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो आप अपनी कविताओं को बेहतर समझा पाएंँगी। सादर

  4. डॉ प्रणव भारती की चार कविताएं पुरवाई के इस अंक में प्रकाशित हुई हैं। ये चारों कविताएं उन्होंने अलग-अलग भावभूमि पर लिखी है। सभी कविताओं का मूल कथ्य आत्म परिष्कार ही है। ‘उसने कहा था वह प्यार करता है ‘ कविता में प्यार को दोनों स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन इस स्वीकृति के बीच प्यार हां और न के बीच फंसकर संभावनाओं में तब्दील होने लगता है। प्यार का रास्ता बहुत संकरा होता है जबकि संभावनाओं का आंगन अतिविस्तृत। विस्तृत मैदान में जंगल का उगना तय है। और जंगल के बीच प्यार का पौधा पनप ही नहीं सकता है। उबलते सैलाब में तो उसकी दुर्दशा निश्चित है।
    अस्थिर चित्त , बहुत कुछ पाने की आकांक्षा, अनिर्णय की स्थिति ये कुछ कारक ऐसे हैं जो जीवन को मथते रहते हैं। इस मंथन में बहुत कुछ टूटता-फूटता रहता है। यही टूटन मनोवृत्तियों को घातक बना देती है।
    ‘छलनी में से निकल गए नन्हे नन्हे कंकर’ कविता में आत्मशोध पर आधारित है। जीवन में जो भी बुरी चीजें हैं उनको छानकर बाहर कर दिया है। लगता है कि अब सब कुछ शुभ और शुभ्र है।
    मानव की प्रवृत्ति हमेशा अच्छे को प्राप्त करना और बुरे को बाहर करने की रहती है। वह ताजिंदगी इसी में उलझा रहता है। वह सोचता है कि मैंने यह सब कर लिया है। अब मेरे भीतर कुछ नहीं बचा है। किंतु उसका यह सोचना फिजूल था। जीवन भर कंकर पत्थर छानता रहा पर चट्टान तो छानने में न आ पाएगी। असंयत मन की यह सबसे बड़ी विडंबना है । कवयित्री जी को बहुत बहुत बधाई । आपको नववर्ष की भी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

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