उघड़ रही थी उजड़ रही थी,
कतरा-कतरा धूप जिन्दगी ।
टूट रही थी जुड़ते-जुड़ते,
टुकड़ा-टुकड़ा हुई जिन्दगी ।
मजबूती की डोर से टूटी,
कच्चे धागे जैसी जिन्दगी ।
फिर भी बांधे हुए बावली,
रेशा-रेशा रेशम डोर जिन्दगी ।
घुन खाई लकड़ी के जैसी,
मिट्टी खोखल रेत जिन्दगी ।
प्यासी धरती बारिश जैसी,
भीनी महक मदहोश जिन्दगी ।
रुई के फाहे के जैसी,
कोमल नरम सफ़ेद जिन्दगी ।
खाकर चोट विश्वास पर अपने,
सरल से कठिन बनी जिन्दगी ।
फिर भी अनुभव के धागे से,
स्वेटर जैसी बुनी जिन्दगी ।।


प्रिय रॉबी जी एक हृदय स्पर्शी कविता आपकी रेशा रेशा
जिस प्रकार मजबूत डोर से बंधी पतंग किसी की डोर काट देने पर एक कच्चे धागे सी टूटकर जमीन पर गिर पड़ती है इस प्रकार जिंदगी में अनहोनी कभी जिंदगी को टुकड़ा टुकड़ा कर देती है हमें यकीन नहीं कर पाते हे और रेशा रेशा जोड़कर फिर से जिंदगी को बंधने की नाकाम कोशिश करते हे
अंततः विश्वास पर ठोकर खाकर हकीकत को अपनाते हुए अनुभव के धागों से जिंदगी को एक स्वेटर की तरह बुनकर सार्थक रूप दे देते हे।
स्वेटर जैसी बुनी जिंदगी
सार्थक एवं ह्रदय गति को स्पर्श कर लेने वाली कविता।बौद्ध धर्म के अनुसार मानव जीवन मे सर्वत्र दुख है।इस दुःख की निवृत्ति का एक उपाय मध्यम मार्ग ही है।आप की यह कविता जीवन के दुखों की सार्थकता एवं उससे निवृत्ति का मार्ग दोनों को सही अर्थों में प्रस्तुत करती है। जीवन में मोक्ष प्राप्ति ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।यह कविता जीवन के बहुविध पक्षों का उल्लेख करते हुए जीवन के सुख ,दुख , शोक , संताप एवम उससे बाहर निकलकर जीवन को संवारने के भाव व्यक्त करती है।मैं आप को हृदय से शुभकामना प्रेषित करता हूँ।इसी तरह भविष्य में आप जीवन के यथार्थ रूप को अपनी कविता के माध्यम से समाज के समक्ष प्रस्तुत करते रहें।अनंत शुभकामनाएं एवम मंगलकामना।
Dr SHIVAM KR MISHRA
ASSISTANT PROFESSOR, RAJA MAHENDRA PRATAP SINGH STATE UNIVERSITY , ALIGARH , UTTAR PRADESH.
धन्यवाद मैडम
बहुत ही सार्थक और सहज रचना है।