Friday, April 17, 2026
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डॉ. सुमन शर्मा की दो कविताएँ

[1] – रक्षाबंधन
यह धागा नहीं,
ना कोई बंधन,
है सूत्र रक्षा का
यह तो प्यार है।
नेह तिलक है
ये संस्कार है,
स्नेह बंधन का
स्वीकार है।
राखी भाई-बहन
का त्यौहार है।
बहुत दूर जा
बसा तू भाई,
आती याद तेरी
सूनी कलाई।
कैसे मैं आऊँ
तुझे कैसे बताऊँ?
ख़ैर तेरी मैं
रोज़ मनाऊँ।
अबके बरस
परदेस से आना,
आकर राखी
हाथों बँधवाना।
बाँध कर राखी
कलाई सजाना,
रक्षा सूत्र की
रीत निभाना,
नेह तिलक
माथे लगवाना।
बहन को अपनी
न कभी भुलाना।
राखी भाई-बहन
के स्नेह बंधन,
का त्यौहार।
[2] – सावन की बहार
मन मेघ मल्हार बन गाता है,
मौसम सावन बन आता है।
अंबर का प्यार बनकर फुहार,
हरित धरा कर जाता है।
प्रकृति सजती सोलह शृंगार,
मन वीणा के बजते तार,
उड़ उड़कर मंद बयारों से,
मही का आँचल लहराता है।
कोयल की सुनकर मधुर तान,
मोर बने मन गाता गान,
देख वसुधा की सुन्दरता,
चाँद कहीं छिप जाता है।
अधर धरे बंसी कन्हैया,
धुन कोई मधुर सुनाता है
संग राधा के झूल हिंडोल,
कान्हा मन को लुभाता है।
खिल उठता है जन मन,
जब झूम झूम आता सावन,
मेंहदी,पायल,कंगन की छन छन,
ये तीज त्यौहार ले आता है।
मन मेघ मल्हार बन गाता है,
मौसम सावन बन आता है।
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