Friday, April 17, 2026
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डॉ स्वदेश भटनागर की कविताएँ

वसंत : तीन मनोदिशाएँ

(1)

फ़रवरी और मार्च के
प्रत्येक रविवार से लेकर शनिवार तक
वसंत से भूरा-पूरा
एक बाग़ीचा हो जाती हो तुम
मगर
हाथ में छुरी-काँटा लेकर
तुम्हें घेरकर चारों तरफ से
यह पतझर क्यों बैठा है।
(2)
अबके वसंत में
ऐसा कुछ हो जाए कि
मेरी ज़िन्दगी बदल जाए
कहीं से भी कोई कितना ही गुणा करें मुझमें या
मुझमें ही जोड़ दे मुझको या
घटा दे क्रमशः मुझको मुझमे से
मगर
हर बार मेरी देह में दूर तक
वसंत ही बचा रहे
मेरी ज़िन्दगी
मेरी कहलाए
और साथ में
कुछ ऐसा हो जाए
मेरी ज़िन्दगी को
वसंत पर मालिक़ाना हक मिल जाए
वसंत के पारदर्शी कपड़े पहनते ही
मेरे जिस्म का सारा लोहा
वसंत के चुंबक की ओर दौड़ने लगे
भीतर जाने वाली साँस का पता
बाहर आने वाली साँस को न चले
क्योंकि परछाई चटकने का डर
मुझे सदैव बना रहता है
(3)
साहित्य के दृष्टिकोण से
वसंत की
एक स्वीकृत परिभाषा यह भी है कि
यह समूचे जंगल को
मरीचिकाओं से भर देता है
झूँठ को सुंदर कर देता है
ख़ुशबू से भरे बौराय पत्थर तक
हर शै का ग़लत उच्चारण करने लगते हैं
पहाड़ झुक जाते हैं
जंगल के कानून हो जाते हैं मानवीय
गणितीय स्पष्टता के साथ
वसंत जटिल भी होता है
भीतर से भरा भी
इस फैले हुए वसंत को
समझने के लिए समझना
मुश्किल हो जाता है
मेरे जिस्म के निर्वात में
एक बासंती-क्षण
अपने केंद्र पर
सुलझ रहा है
उलझ रहा है
यह प्रेम है

पूस
रक्त में घुलकर
स्पन्दित कर रहा है मुझे
यह कैसा ज्वार है

माघ
अपनी साँसों से मेरी साँसों में
बाँध रहा है मुझे
यह कैसा रचाव है
फागुन
मेरे हृदय में धड़कने लगा है
घड़ी की तरह
रंग-बिरंगी ध्वनियों का
यह कैसा छिड़काव है
अतीत, वर्तमान, भविष्य
मेरे जिस्म के शून्य में महकने के लिए
हृदय के अक्षांश पर
छटपटाने लगे हैं
फगुनाहट के उन्मादी-कणों के बीच
कोयल के पञ्चम स्वर में
तुम्हारे प्यार के हज़ारों इंद्रधनुष
खिल गए हैं मुझमें
बिना समझे ही
यह बात समझ गया हूँ मैं
दो के बीच की व्यथा
कुर्सी और टेबल के बीच
संबोधि से भरा एक रिक्त स्थान है
अतीत और भविष्य के बीच
एक ख़ामोशी है
गुटरगूँ कर रही है कबूतर की तरह
जीवन और मृत्यु के बीच
साँस का एक पौधा है
जिसके पत्ते आधे हरे, आधे पीले हैं
भीड़ और तन्हाई के बीच
मन का एक मज़ार है
मन्नते बाँध रहे हैं जिस पर लोग
मेरे और तुम्हारे बीच
एक चुंबन है
जो मरा-मरा जपते-जपते
राम हो गया है
बीच की इन रिक्तियों को
बीज भाव से भर कर
एक ही दिन में दो तारीखों की तरह
व्यतीत हो रहा हूँ मैं
प्रमाण-पत्र

मेरा होना
पंच तत्वों से बनी
एक चलती-फिरती माँस की कब्र
होना भर नहीं

न मेरा होना
मेरे नाम के हिज़्ज़ो का शोरभर है
मेरे होने का अर्थ
विराट का पुर्ज़ा होना है
या
मेरा होना
मेरे विचारों का एक वर्तुल है जो
लैला से ला इलाहा इल्लाल्लाह तक जाता है
ला इलाहा इल्लाल्लाह से लैला तक
मेरा होना
सब कुछ मिलने के बाद के सूनेपन का
एक सब्ज़ हस्ताक्षर है
जिसकी गत्यात्मकता की छाँव में
समूची कायनात साँस लेती है
मेरे हस्ताक्षर का अस्तित्व
एक प्रमाण-पत्र है
जिसे महाचेतना ने मुझे
मेरे जीवित रहने के उपलक्ष्य में दिया है
यह प्रमाण-पत्र
मेरे जीवित रहने से भी ज़्यादा ज़रूरी है
प्रमाण-पत्र का बोध मुझसे टकराकर
सुगंधित तो हो जाता है
मगर फूल कहीं नहीं दिखाई देता
सारांश

दीवार पर टंगी तस्वीर
दीवार का सारांश होती है

उड़ती चिड़िया के पंख
सारांश होते हैं आकाश का
वृक्ष के फल-फूल-पत्तियाँ
सारांश होती है पृथ्वी का
सागर का महाकाव्यीय विन्यास
नदी की व्याख्या का सारांश होता है
एक पन्ने पर लिखे दो शब्दों के
बीच की छूटी जगह
सारांश होती है कोरे काग़ज़ का
देह की आत्मकथा के अंत में
लगाए गए पूर्ण विराम का
सारांश होती है मृत्यु
और
मृत्यु सारांश होती है
ईश्वर के ख़ुशबू भरे स्पर्श का
जिस्म का जुग़राफ़िया

यदि तुम
आषाढ़ की पहली बूँद हो
मेरी पलकों के मरुस्थल पर गिरो

यदि तुम
आँसू का क़तरा हो
मेरे हृदय पर गिरो
जो नमक से बना हुआ है
मेरा जिस्म भी
मोम से बना है
यदि तुम
दूर तक फैली धूप ही धूप हो
मैं पिघलकर लय होना चाहता हूँ तुममें
फूल पर बैठा हुआ
ये जो तितली का एक जोड़ा है न
यह मेरे ख़्वाबों से टूटकर बना है
जैसे
मैं बन गया हूँ
तुम्हारे एक बोसे की ख़ुशबू से छूटकर
मेरे जिस्म का जुग़राफ़िया
वहाँ भी टूटा है
जहाँ मैं पत्थर नहीं था
डॉ० स्वदेश भटनागर
पिता का नाम – स्व० श्री हरनारायन भटनागर
जन्म – 18 दिसम्बर 1954, आगरा (उ०प्र०)
शिक्षा – एम.ए.(हिन्दी,अंग्रेजी,दर्शनशास्त्र) पीएच.डी.,
(दर्शनशास्त्र) आगरा यूनीवर्सिटी, आगरा.
सृजन – ग़ज़ल दोहे, नज्में,कतआत एवं गद्य कविताएँ
सम्मान – ‘अक्षर शिल्पी’,“एवं माहिर-ए-अदब”,‘सम्मान’
अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य
“स्मृति प्रतिष्ठा पुरुस्कार”,“काव्य महारथी
सम्मान” एवं ‘अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच थाईलैन्ड,
कम्बोडिया, वियतनाम द्वारा साहित्य श्री पुरुस्कार से सम्मानित.
प्रकाशन – “काव्या”, ‘अर्बाबे. कल‘म’, ‘सुमन सौरभ’,
‘नई ग़ज़ल’, ‘गुफ्तगू’, ‘शेष’, ‘सम्बोधन’, ‘लफ़्ज़’, ‘ग़ज़ल के बहाने’,
‘अहा जिदगी’, ‘दस्तावेज’, ‘संवदिया,’ ‘बुलन्द प्रवाह’, मानस पत्रिका,
अदम्य पत्रिका ,उद्गम पत्रिका, ‘समकालीन अभिव्यक्ति’, ‘आधारशिला
. साहित्यम’,‘2020 की नुमाइंदा ग़ज़लें’,’संवेद’,’समकालीन भारतीय साहित्य’
(साहित्यिक अकादमी की त्रैमासिक पत्रिका)
‘ख्वाहिशों की रोशनी में’,‘वागर्थ’ (भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका)
‘अक्षर’, ‘पुष्पगंधा’, ‘सोचविचार’, ‘पूर्वापर’, ‘अनुकृति’, ‘प्रेरणा’, ‘अनुनाद’ . .. व्यंजना,(बेव पत्रिका) अभिनव प्रयास, दोआबा,सुसंभाव्य एवं “वर्तमान .. .. साहित्य”, हरिगंधा (हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका),हिंदी अकादमी .. दिल्ली की पत्रिका अग्निमान, आदि.
देश विदेश की प्रतिष्ठित एवं नामचीन पत्रिकाओं में प्रकाशित,अग्निमान, . . इसके अतिरिक्त कई पुस्तकों की समीक्षा का प्रकाशन,
‘तीन कविता संग्रह’ प्रकाशित एक प्रेस में
आकाशवाणी रामपुर से रचनाओं का नियमित प्रसारण
संम्पर्क – निकट कैलटन स्कूल, लाईनपार, मुरादाबाद (उ०प्र०) – 244001
– -7983639799, 9760929503 |
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