Friday, April 17, 2026
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प्रो. किरण खन्ना की दो कविताएँ

1 – हाँ, मैं तुम्हे स्वीकार  करूँगा
हाँ.. मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा।
सपनों ने जब  पंख पसारे।
अपने मन में निश्चय धारे
नीड़ से निकली गौरैया तुम
भोली-भाली सी चिड़िया तुम
नहीं किसी साज़िश से वाक़िफ
अपनी धुन में मस्त-व्यस्त तुम
बच न सकीं हवसी आंखों से
ढल न सकी वहशी साँचों में
आग की वह तेजाबी बारिश
जिंदा लाश बना गयी तुमको
गिरी बिजलियां अपमानों की
ग्रहण लग गया चांद से मुख को
पिघल गए हैं सारे सपने
सुन्न हुए माँ बाप बेचारे
होली, राखी और दीवाली
हुई बेरंगी,  फीकी खाली
घोर निराशा गहन हताशा
मत होने दो इसको हावी
उठो…न अब तुम अश्रु बहाओ
फिर आशा का दीप जलाओ
सब सपने साकार करूँगा
हाँ … मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा
हाँ .. मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा
हरा, गुलाबी, लाल या पीला
हर रंग भर दूगां जीवन में
तुम अपना संघर्ष न छोड़ो
साथ मै दूँगा सुख में, दुःख में।
नियति ने जो श्राप देदिया
उसे वरदान बनाना होगा,
किस्मत की यह क्रूर चुनौती
चंडी बन भिड़ जाना होगा।
जिसने राह में काँटे बोये
काल उसका बन जाना होगा
ख़ुद को तपा कर कठोर बना कर
वहशी को सबक सिखाना होगा।
आओ करो ऐलान जंग का
मैं तेरा हथियार बनूँगा
डर मत तेरी जीत है निश्चित
हाँ.. मै तुम्हें स्वीकार करूँगा।
हाँ मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा। 
तुम ही रंभा तुम ही उर्वशी
मेनका भी तो झांसी भी तुम
तुम ही रज़िया तुम सावित्री
सीता भी तुम काली भी तुम
तुम यशोधरा तुम्हीं उर्मिला
पद्मावती का जौहर हो तुम
भस्म करो भस्मासुर सारे
शक्ति शिव का गौरव हो तुम
जो इज़्ज़त के नाम पर मारे
छीन दुपट्टा तार करे जो
तेरे तन से मनमानी कर
अस्मत पर तेरी वार करे जो
टुकड़े-टुकड़े कर के उसके
जीत अपना महाभारत ख़ुद ही
मांग शिवा से जीत का वर और
रण में दिखा दे ताकत ख़ुद की
मत मोहताज बन मोमबत्ती की
तेरी तलवार की धार बनूंगा
हाँ मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा
हाँ मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा। 
झील नहीं समुद्र बनो अब
मैला करने का कोई सोचे
लहरों से उसे बहा ले जाओ
हिरण नहीं सिंहनी बनो अब
हाथ कोई आंचल तक पहुँचे
इससे पहले मार गिराओ
नवयुग को प्रतीक्षा तुम्हारी
फिर से नाद भरो जीवन में
फिर से कोई बेटी न उजड़े
ऐसा तेज भरो तन-मन में
बीते रात तो कोई अंधेरे
दिन होने से रोक पाते
लाखों पतझड़ एक बसंत
के रंग कभी भी चुरा न पाते
आओ हाथ दो मेरे हाथ में
मैं तेरा शृंगार करूँगा
हाँ मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा।
हाँ मैं तुम्हें स्वीकार करूँगा।
2. विकसित भारत : पंच प्रण 
नवभारत निर्माण करेंगे
पंचप्रणों से प्राण भरेंगे।
भारत होगा विकसित राष्ट्र
विश्व गुरु हैं.. सिद्ध करेंगे।
तकनीकी, यांत्रिकी, विज्ञान, वाणिज्य
हर क्षेत्र मे होगा हमारा साम्राज्य
हर गांव नगर सब शहर हों उन्नत
विश्व चकित हो और नतमस्तक
प्रथम प्रण ऐसे करें सम्पन्न
भारत मां करो स्वीकार समर्पण।
सोच गुलामी वाली छोड़ें
बल बुद्धि से नाता जोड़ें
परम वैभव, संस्कार और शुचिता
सब से हो भाई-बहन सा रिश्ता
द्वितीय प्रण करें ऐसे सम्पन्न
भारत मां करो स्वीकार समर्पण।
अपनी संस्कृति करें आत्मसात
सुसंस्कृत विकसित हो नव प्रभात
भारत की गरिमा को बढ़ाएं
अपनी धरोहर को अपनाएं
तीसरा प्रण करें ऐसे सम्पन्न
भारत मां करो स्वीकार समर्पण।
एक हैं हम एक राष्ट्र हमारा
विश्वबंधुत्व अभीष्ट हमारा
भेद-भाव की तोड़कर कारा
प्रेम की पावन बहेगी धारा
चौथा प्रण करें ऐसे सम्पन्न
भारत मां करो स्वीकार समर्पण।
अपने दायित्व को सभी निभाएं
प्रगति के पथ पर कदम बढ़ायें
कर्तव्य हो सब का परम धर्म
सब निःस्वार्थ करें अपना कर्म
पंचम प्रण ऐसे हो सम्पन्न
भारत मां करो स्वीकार नमन
पंचप्रण का करें सभी अनुशीलन
भारत मां करो स्वीकार नमन।
डॉ. किरण खन्ना
डॉ. किरण खन्ना
एसोसिएट प्रोफेसर, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ‌डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर (पंजाब) ईमेलः [email protected]
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